खिचड़ी का इतिहास काफी पुराना है। इतना कि वेद और पुराण में भी इसका वर्णन मिलता है। लेकिन सबसे पहले इसे बिहार प्रदेश के भागलपुर के कोहलग्राम ( आज का कहलगांव) में पकाने के प्रमाण मिलता हैं। कथा कुछ यूं है - ऋषि कोहल ने कोहलग्रम में तपस्या की थी और यह स्थान उनके सात्विक प्रभाव के कारण काफी वैभवशाली हो गया। इसकी मान्यता पहले काशी एवम् कैलाश के बराबर थी। फिर,ऋषि दुर्वासा ने यहां अपना आश्रम बनाया। पुराण कथाओं के अनुसार देव - असुर संग्राम दस हजार वर्षों तक चला और असुरों से लड़ते - लड़ते देवता कमजोर होने लगे। तो वे सभी दुर्वासा ऋषि के आश्रम में आए क्योंकि शिव भूमि होने के कारण वहां असुर प्रवेश नहीं कर सकते थे। उसी समय,देवताओं को तुरंत भोजन कराने के उद्देश्य से ऋषि दुर्वासा ने सभी अनाजों (दालों सहित) और सब्जियों को मिलाकर जल में पकाकर खिलाया था। सब कुछ मिश्रित होने के कारण इस व्यंजन का नाम खिचड़ी रखा गया और उस दिन संक्रांति भी थी। तब से ,संक्रांति के दिन खिचड़ी खाने की प्रथा चल पड़ी और आज भी यह व्यंजन अपनी पौष्टिकता में अव्वल बना हुआ है। संकलन एवं संशोधन-लेखक
हिंदी विश्व में भारतीय अस्मिता की पहचान है। हिंदी भारत की राजभाषा,राष्ट्रभाषा से आगे विश्वभाषा बनने की ओर अग्रसर है।
Saturday, January 22, 2022
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
स्वामी दयानंद सरस्वती
आज 12 फरवरी है। स्वामी दयानंद सरस्वती जयंती है। आर्य समाज के प्रवर्तक और प्रखर सुधारवादी संन्यासी स्वामी दयानंद सरस्वती आधुनिक भारत के महान्...
-
आज महान देशभक्त, भारतरत्न, भूतपूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की १२२ वीं जयंती है। भारत-पाक युद्ध में जय जवान! जय किसान! का उद्...
-
माननीय भारत गणराज्य के राष्ट्रपति माननीय प्रधानमंत्री, भारत माननीय मुख्यमंत्री, बिहार माननीय मुख्य सचिव, बिहार माननीय सांसद , सारण संसदी...
-
भारतीय डाक पत्तो प्रमुख आकर्षण रहे पिन कोड का युग अब नये रूप में आकार लेने को है । जी, हाँ अब आपके छ: अंकों के पिन कोड या डाक सूचकांक संख्य...
No comments:
Post a Comment