Sunday, August 9, 2026

सौमिल का जन्मदिन और केक के बहाने हिंदी की बात-

सौमिल का जन्मदिन और केक के बहाने हिंदी की बात-



🎂 एक केक, एक नाम और एक छोटी-सी जिद… ❤️


कल बड़े बेटे सौमिल का जन्मदिन था। हर बार की तरह इस बार भी मन में यही विचार था कि केक पर उसका नाम हिंदी में ही लिखवाएँगे। आखिर नाम सिर्फ नाम नहीं होता, उसमें भाषा, अपनी मिट्टी और अपनी पहचान भी होती है। और हिंदी तो माँ भारती की अग्रगण्य वाणी है। ❤️🇮🇳

केक लेने पहुँचे हैदराबाद स्थित आयंगर बेकरी 🥯। 

केक पसंद करने के बाद दुकानदार से कहा—

“भाई, केक के ऊपर बच्चे का नाम हिंदी में लिखना है।” 

उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा और बोला—“हिंदी तो सिर्फ बोलने और सबको जोड़ने वाली भाषा है। आप फ़िज़ूल में लिखने की बात कर रहे हैं। दुनिया अंग्रेज़ी के पीछे भाग रही है और आप हिंदी लिखवाने की बात कर रहे हैं। हिंदी में लिखना आता भी नहीं… काफी साल हो गए, किसी ने माँगा ही नहीं।”

पत्नी से कहा तो उनका उत्साह भी कुछ खास नहीं दिखा। उन्होंने सहजता से कहा—

“यहाँ हिंदी में कौन लिखेगा? जैसा मिल रहा है, वैसा ही ठीक है…”

लेकिन हिंदी के प्रति मेरा जुनूनी मन इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं था। मैंने दुकानदार से कहा—

“मैं लिखकर देता हूँ। ख़राब हुआ तो नुकसान मेरा।”

दुकानदार ने कुछ सोचा। शायद उसे भी लगा कि कोशिश करने में क्या हर्ज है। उसने अपनी तरफ से प्रयास किया और आखिरकार केक पर बेटे का नाम हिंदी में लिख ही दिया। 😊

हर जन्मदिन की तरह इस बार भी केक पर बेटे का नाम हिंदी में चमक रहा था और उसे देखकर मेरे मन में एक अलग ही खुशी थी। ❤️

कुछ लोगों के लिए यह सिर्फ एक नाम होगा, लेकिन मेरे लिए यह केक पर नाम लिखवाने भर की बात नहीं थी। यह हैदराबाद में हिंदी के लिए एक छोटी-सी जगह बनाने की कोशिश थी—ऐसे समय में, जब अंग्रेज़ी धीरे-धीरे हमारे रोज़मर्रा के जीवन में अपनी जगह बढ़ाती जा रही है और इस छोटी-सी घटना ने एक बात फिर विश्वास के साथ महसूस कराई—

लोग हिंदी से प्रेम करते हैं, बस उस प्रेम पर हमारा विश्वास बढ़ाने की जरूरत है।

भाषा का सम्मान बड़े-बड़े मंचों से ही नहीं होता;

कभी-कभी वह बच्चे के जन्मदिन के केक पर लिखे उसके नाम से भी होता है। ❤️🎂🇮🇳

कभी-कभी छोटी-सी जिद ही बड़ी याद बन जाती है।

-डॉ साकेत सहाय 

 ०९.०८.२०२६

हैदराबाद

Saturday, August 8, 2026

राजभाषा की बात - हिंदी और हिंदीत

 राजभाषा की बात - हिंदी और हिंदीतर 



यह इस देश का कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि जिस नियम को संघ की राजभाषा नीति के समुचित क्रियान्वयन के लिए लागू किया गया था ताकि हिंदी के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों के प्रशासनिक हितों और भाषाई सुविधा का भी ध्यान रखा जाए।परंतु उसका दुरुपयोग कुछ स्वार्थी मानस जान-बूझकर कर रहे हैं ।  हिंदी या किसी भी भाषा के ज्ञान का अर्थ उसकी योग्यता और उसने वह भाषा कहाँ तक पढ़ी है इससे लगाया जाना चाहिए न कि केवल मातृभाषा के आधार पर ।  अब तेलंगाना में जन्मा कोई हिंदी भाषी केवल मातृभाषा के नाम पर हिंदी का जानकार नहीं हो सकता है वैसे ही जैसे बिहार या दिल्ली का कोई तमिल या मराठी भाषी व्यक्ति केवल मातृभाषा के नाम पर अहिन्दी भाषी नहीं हो सकता। राजभाषा नियमों में “हिंदी” और “हिंदीतर” शब्द इसलिए इस्तेमाल किए जाते हैं क्योंकि भारत में सभी राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में हिंदी का समान स्तर पर प्रयोग नहीं होता और यह संघ सरकार में पत्राचार को बढ़ावा देने के लिए लागू किया गया था । उदाहरण के लिए,  

* हिंदी को प्रथम राजभाषा के रूप में अपनाने वाले राज्य -क क्षेत्र 

* ⁠हिंदी को द्वितीय राजभाषा के रूप में अपनाने वाले राज्य -ख  क्षेत्र 

* ⁠जिन राज्यों ने हिंदी के बजाय अन्य भाषाओं को प्रथम राजभाषा के रूप में अपनाया है-ग  क्षेत्र 

तब से समंदर का पानी बहुत बह गया, फिर भी कुछ लोग हिंदी और हिंदीतर का प्रयोग निहित स्वार्थों की खातिर कर रहे हैं जो कि भारतीय जनमानस में “राष्ट्रभाषा” के व्यापक अर्थ में प्रयुक्त हिन्दी  भाव को कमजोर करने का एक षड्यंत्र है । उदाहरण के लिए अब कुछ महान अज्ञानी लोग साहित्यकार नरेन्द्र कोहली जी को हिंदीतर सिद्ध करने में लगे हुए हैं,हिंदी हितधारियों को इससे बचना चाहिए ।

पर यह करेगा कौन? क्योंकि ज्यादातर लोग तो इससे लाभ ही उठा रहे हैं । अब  कोई आदमी तमिल , तेलुगु भाषी है या मराठी भाषी जिन्होंने हिंदी को रोजगार, पठन -पाठन के कारण चुना है और वे हिंदी में निष्णात भी हैं पर लाभ की खातिर हिंदीतर भाषी बने फिरते हैं, क्या इसे एक प्रकार का जाति वाद या अल्पसंख्यकवाद नही माना जाएगा?

मुझे यह भी डर है कि जिस तरह भाषिक तुष्टिकरण के नाम पर प्रांतों का विभाजन किया गया और आठवीं अनुसूची में आने के नाम पर हिंदी को विभाजित किया जा रहा है कल को यदि भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया गया तो मैं भी हिंदीतर बन कर इठलाता फिरूँगा । पर यह सब दुर्भाग्य हिंदी के साथ ही है और देश में सब अंग्रेजी भाषी है कोई अंग्रेजीतर नहीं है । 

धन्यवाद 

जय हिंद! जय हिंदी!!

-डा.  साकेत सहाय 

भाषा-संचार अध्येता 

दिनांक: ०८/०८/२०२६

हैदराबाद

#साकेत_विचार

#राजभाषा

Wednesday, August 5, 2026

कविवर शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की जयंती पर विशेष





आज कविवर शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जी की जयंती है।  सुप्रसिद्ध कवि, पद्म भूषण से सम्मानित डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन जी की जयंती पर कोटि -कोटि नमन! हिंदी साहित्य में शिवमंगल सिंह सुमन एक प्रसिद्ध नाम है। हिंदी साहित्य में प्रगतिशील लेखन के अग्रणी कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ का जन्म 5 अगस्त, 1915 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में हुआ था।  स्वतंत्रता, देशभक्ति और स्वाभिमान पर सुमन जी के बोल काफी ओजस्वी रहे हैं। पराधीन राष्ट्र में जन्म लेने के बावजूद उनमें आत्मसम्मान और स्वतंत्रता जैसे मूल मानवीय मूल्यों में गहरी निष्ठा थी। वह वरदान मांगने वाली गुलाम चेतना नहीं थे बल्कि तूफानों की ओर भी नाव की पतवार घुमा देने वाले आजाद और साहसी नाविक थे। अन्याय के प्रति विद्रोह, निराशा के प्रति आक्रामकता और मानव क्षमताओं की महिमा बखानती शिवमंगल की कविताएं आज भी सोती हुई मनुष्यता के लिए जागरण का गीत हैं। वह मनुष्य को तूफानों से डरने नहीं बल्कि अपनी पतवार उसी ओर घुमा देने की प्रेरणा देने वाले कवि हैं।  उनका निधन 27 नवंबर, 2002 को हुआ। 'क्या हार में क्या जीत में। किंचित नहीं भयभीत में। कर्तव्य पथ पर जो मिले। यह भी सही- वह भी सही। वरदान मांगूंगा नहीं।' अक्सर सोशल मीडिया पर यह कविता भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी की रचना के रूप में दर्शायी जाती है लेकिन यह एक गलत तथ्य है, 'वरदान मांगूंगा नहीं' के लेखक अटल बिहारी वाजपेयी नहीं हैं बल्कि इसे हिंदी साहित्य के अप्रतिम रचनाकार शिवमंगल सिंह सुमन ने लिखा है। दरअसल ग्वालियर के जिस कॉलेज में शिवमंगल सिंह सुमन पढ़ाते थे, अटल बिहारी वाजपेयी वहीं पर पढ़ते थे। वाजपेयी जी ने भी स्वीकार किया है कि उनकी कविता पर शिवमंगल सिंह सुमन का स्पष्ट प्रभाव है।  उनकी जयंती पर उनकी रचित प्रसिद्ध कविता - 

 वरदान मांगूंगा नहीं.... 

यह हार एक विराम है

जीवन महासंग्राम है

तिल-तिल मिटूंगा पर दया की भीख मैं लूंगा नहीं

वरदान मांगूंगा नहीं।

स्मृति सुखद प्रहरों के लिए

अपने खंडहरों के लिए

यह जान लो मैं विश्व की संपत्ति चाहूंगा नहीं

वरदान मांगूंगा नहीं।

क्या हार में क्या जीत में

किंचित नहीं भयभीत मैं

संधर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही

वरदान मांगूंगा नहीं।

 लघुता न अब मेरी छुओ

तुम हो महान बने रहो

अपने हृदय की वेदना मैं व्यर्थ त्यागूंगा नहीं

वरदान मांगूंगा नहीं।

 चाहे हृदय को ताप दो

चाहे मुझे अभिशाप दो

कुछ भी करो कर्तव्य पथ से किंतु भागूंगा नहीं

वरदान मांगूंगा नहीं।

उनकी स्मृति को नमन करते हुए प्रस्तुत है उनकी रचित एक और कविता- 

गति प्रबल पैरों में भरी 

फिर क्यों रहूं दर दर खडा 

जब आज मेरे सामने 

है रास्ता इतना पडा 

जब तक न मंजिल पा सकूँ, 

तब तक मुझे न विराम है, 

चलना हमारा काम है। 

कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया 

कुछ बोझ अपना बँट गया 

अच्छा हुआ, तुम मिल गई 

कुछ रास्ता ही कट गया 

क्या राह में परिचय कहूँ, 

राही हमारा नाम है, 

चलना हमारा काम है। 

जीवन अपूर्ण लिए हुए 

पाता कभी खोता कभी 

आशा निराशा से घिरा, 

हँसता कभी रोता कभी 

गति-मति न हो अवरूद्ध, 

इसका ध्यान आठो याम है, 

चलना हमारा काम है। 

इस विशद विश्व-प्रहार में 

किसको नहीं बहना पडा 

सुख-दुख हमारी ही तरह, 

किसको नहीं सहना पडा 

फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ, 

मुझ पर विधाता वाम है, 

चलना हमारा काम है। 

मैं पूर्णता की खोज में 

दर-दर भटकता ही रहा 

प्रत्येक पग पर कुछ न कुछ 

रोडा अटकता ही रहा 

निराशा क्यों मुझे? 

जीवन इसी का नाम है, 

चलना हमारा काम है। 

साथ में चलते रहे 

कुछ बीच ही से फिर गए 

गति न जीवन की रूकी 

जो गिर गए सो गिर गए 

रहे हर दम, 

उसी की सफलता अभिराम है, 

चलना हमारा काम है। 

फकत यह जानता 

जो मिट गया वह जी गया

मूंदकर पलकें सहज 

दो घूँट हँसकर पी गया 

सुधा-मिक्ष्रित गरल, 

वह साकिया का जाम है, 

चलना हमारा काम है।

-शिवमंगल सिंह सुमन

-संकलन -@डॉ साकेत सहाय

Sunday, July 26, 2026

परीक्षा सुधार समिति

 परीक्षा विवाद के बीच सरकार द्वारा श्री नंदन नीलेकणी को दी गई बड़ी जिम्मेदारी! 



नीट परीक्षा व्यवस्था पर उठे सवालों के बीच केंद्र सरकार ने आज एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है । 

भारत की परीक्षा व्यवस्था में उचित सुधार के लिए सरकार ने देश के जाने-माने तकनीकी विशेषज्ञ, श्री नंदन नीलेकणी को नयी जिम्मेदारी सौंपी है, जिन्होंने देश के डिजिटल ढाँचे  को बदलने में क्रांतिकारी भूमिका निभाई है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने २६ जुलाई को यह घोषणा की कि श्री नंदन नीलेकणी के नेतृत्व में एक उच्चाधिकार प्राप्त कार्य समिति (हाई-पावर्ड टास्क फोर्स परीक्षा) परीक्षा सुधारों पर काम करेगी।  प्रधानमंत्री का लक्ष्य स्पष्ट है—

परीक्षा व्यवस्था ज्यादा भरोसेमंद हो, पारदर्शी हो और तकनीक का अधिकतम इस्तेमाल हो। यानी सवाल सिर्फ पेपर लीक रोकने का नहीं है। अब सवाल यह है कि क्या परीक्षा की पूरी प्रक्रिया को ही ऐसा बनाया जा सकता है कि गड़बड़ी की गुंजाइश न्यूनतम हो? जो कि तकनीक और नीति के उचित इस्तेमाल से आसान हो सकता है ।  घोषणा करते हुए श्री मोदी ने यह भी कहा कि विद्यार्थियों के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ कार्रवाई हो रही है, फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाए गए हैं और सख्त कानूनी प्रावधानों की दिशा में भी कदम उठाए जा रहे हैं और अब नजर नंदन नीलेकणी की टास्क फोर्स पर है।

सरकार के इस निर्णय से यह विश्वास जताया जा सकता है कि जिस व्यक्ति ने ‘आधार’ जैसे बड़े डिजिटल पहचान कार्यक्रम का नेतृत्व किया और इंफ़ोसिस के सह-संस्थापक के तौर पर तकनीक की दुनिया में अलग पहचान बनाई, उसकी विशेषज्ञता भारत की परीक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकती है। श्री नीलेकणी की भूमिका के बारे में कहा जा सकता है - कागज से डिजिटल तक…, पहचान से भुगतान तक…, और अब परीक्षा व्यवस्था तक। 


नंदन नीलेकणी के व्यापक अनुभव को देखते हुए यह कहा जा सकता है उनकी टेक्नोलॉजी वाली सोच भारत के करोड़ों छात्रों की परीक्षा-तंत्र पर खोए भरोसा को वापस लाने में सफल होगी यह तो भविष्य बताएगा । पर इतना जरूर कहा जा सकता है कि नीट परीक्षा-पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था को लेकर उठे विवादों के बीच सरकार का यह एक निर्णायक कदम  है । 


डा. साकेत सहाय

Saturday, July 25, 2026

27वां कारगिल विजय दिवस

 🇮🇳 कारगिल विजय दिवस — वीर शहीदों को शत्-शत् नमन! 🇮🇳

💐🙏 अमर रहें ! हमारे वीर सपूत! 🙏💐



26 जुलाई केवल एक तारीख नहीं, बल्कि भारत के शौर्य, साहस, त्याग और विजय का गौरवशाली प्रतीक है। 

आज जब देश 27वां कारगिल विजय दिवस मना रहा है, तब उन वीर जवानों की याद समस्त देशवासियों के हृदय को गर्व से भर देती है, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। वर्ष 1999 में कारगिल की दुर्गम पहाड़ियों पर भारतीय सैनिकों ने जिस अदम्य साहस और पराक्रम का परिचय दिया, वह भारतीय सैन्य इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों में सदैव अंकित रहेगा। ऑपरेशन विजय के दौरान हमारे वीर सैनिकों ने विपरीत परिस्थितियों में भी तिरंगे की आन, बान और शान के लिए संघर्ष किया और 26 जुलाई, 1999 को विजय का गौरव हासिल किया। 

मेरे लिए यह दिन व्यक्तिगत रूप से भी अत्यंत भावुक और गौरवपूर्ण है। मुझे गर्व है कि कारगिल युद्ध के समय मैंने भारतीय  वायु सेना में अपना योगदान दिया था ।  प्रशिक्षण के तुरंत बाद मेरी तैनाती पूर्वोत्तर भारत में हुई थी। उस दौर में वर्दी पहनकर राष्ट्र की सेवा करना मेरे जीवन का ऐसा अनुभव है, जिसे मैं सदैव गर्व और सम्मान के साथ याद रखूँगा ।  

आज उन सभी अमर शहीदों को विनम्र श्रद्धांजलि, जिन्होंने अपने आज का बलिदान देकर देश का हमारा कल सुरक्षित किया।  वीर सपूतों को समर्पित स्वरचित पंक्तियां-

देह बनी है भारत की मिट्टी से,

देह से आती है वतन की ख़ुशबू।

वतन के काम आए यह ख़ुशबू—

यह सपना है हर सैनिक का।

भारत की सीमाएँ सुरक्षित रहें,

माँ भारती का मस्तक सदा ऊँचा रहे—

यह संकल्प है हर सैनिक का।

जिन्होंने तिरंगे की शान के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए, उनके बलिदान को देश कभी नहीं भूलेगा। कारगिल के अमर शहीदों को शत्-शत् नमन! 💐 

🇮🇳 वन्दे मातरम्! जय हिंद! जय भारत!!! 🇮🇳

डॉ साकेत सहाय 

एयर वेटरन 

#साकेत_विचार

Sunday, July 19, 2026

प्रतिमा तोड़ना असहिष्णुता का परिचायक

 जागरूक लोग इसे अवश्य पढ़ें…


प्रतिमा तोड़ना असहिष्णुता का परिचायक




कोयलांचल के रानीगंज में महापंडित राहुल सांकृत्यायन की स्थापित प्रतिमा को तोड़े जाने की घटना प्रत्येक संवेदनशील नागरिक के लिए चिंता का विषय है। इस कृत्य की जितनी भी निंदा की जाए, वह कम है। सरकार और समाज दोनों को इस घटना का गंभीरता से संज्ञान लेते हुए सम्मानपूर्वक राहुल जी की प्रतिमा का पुनर्स्थापन सुनिश्चित करना चाहिए। 

वर्ष 1994 में राहुल सांकृत्यायन की जन्मतिथि के अवसर पर रानीगंज में स्थापित की गई प्रतिमा को क्षति पहुंचाना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।  राहुल सांकृत्यायन ने भारतीय साहित्य, इतिहास, दर्शन और संस्कृति के क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया। उन्होंने सैकड़ों पुस्तकों की रचना की, स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई, किसानों और मजदूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया तथा तिब्बत से दुर्लभ पांडुलिपियां लाकर भारतीय ज्ञान-संपदा को समृद्ध किया। ये बहुमूल्य पांडुलिपियां आज भी पटना संग्रहालय की धरोहर हैं। मेरी मातृभूमि सारण जिले से उनका गहरा जुड़ाव रहा। उन्होंने सारण की धरती पर किसान आंदोलन का नेतृत्व किया, लाठियां खाईं और जेल भी गए।  वर्ष 1948 में गोपालगंज में आयोजित भोजपुरी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता की थी। सारण जिले के परसा स्थित परसागढ़ मठ में उन्होंने संन्यासी के रूप में भी समय बिताया।


वैचारिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन किसी महापुरुष की प्रतिमा को तोड़ना असहिष्णुता और सांस्कृतिक विरासत के प्रति अनादर का परिचायक है।  ऐसे में यह जरूरी है कि राहुल सांकृत्यायन की प्रतिमा को अविलंब पुनः स्थापित किया जाए तथा ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं। ऐसी घटनाएँ देश और समाज के लिए घातक हैं । 

इस दुखद घटना के बीच एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि इसके बहाने राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रबल समर्थक राहुल सांकृत्यायन के सम्मान में वे लोग भी आवाज़ उठा रहे हैं, जो सामान्यतः हिंदी के आलोचक माने जाते हैं। यह स्वागतयोग्य है, क्योंकि साहित्यकार किसी एक विचारधारा, दल या वर्ग के नहीं होते; वे पूरे समाज की साझा धरोहर होते हैं। उनकी रचनाएँ मानवता और समाज के कल्याण के लिए होती हैं।

अपनी यायावरी के लिए प्रसिद्ध महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने अपने व्यापक अनुभवों से यह सिद्ध किया था कि भारत के विशाल भूभाग में शिक्षित-अशिक्षित, ग्रामीण-शहरी सभी किसी न किसी रूप में हिंदी को समझते हैं। उनका मानना था कि किसी राष्ट्र के लिए एक व्यापक संपर्क भाषा का होना राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करता है। वे यह भी कहते थे कि जब कोई समाज अपनी भाषा का सम्मान करना छोड़ देता है, तो उसके आत्मसम्मान और सांस्कृतिक गौरव पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।


पश्चिम बंगाल में हिंदी के महान साहित्यकार की प्रतिमा को तोड़ा जाना संपूर्ण भारतीय ज्ञान परंपरा का निरादर है । राष्ट्रभाषा हिंदी और उससे जुड़े साहित्यकारों का सम्मान करना केवल एक भाषा का सम्मान करना नहीं, बल्कि भारतीय साहित्य, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा का सम्मान करना है। वही भाषा, साहित्य और संस्कृति जीवंत और जागृत रह सकती है, जो जनता की भावनाओं, विचारों और जीवन का सच्चा प्रतिनिधित्व करे।


आज भी हिंदी जानने वाला व्यक्ति देश के अधिकांश हिस्सों में सहजता से संवाद स्थापित कर सकता है। हिंदी की सबसे बड़ी विशेषता इसकी उदारता है। इसने कभी केवल विदेशी मूल होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया, बल्कि समय-समय पर विभिन्न भारतीय और विदेशी भाषाओं के शब्दों को अपनाकर स्वयं को समृद्ध बनाया है। यही समावेशी स्वभाव हिंदी को व्यापक और जीवंत बनाता है।

पश्चिम बंगाल में उनकी प्रतिमा का होना राष्ट्र के समावेशी स्वरूप को दर्शाता है और उसका तोड़ा जाना इसको क्षति पहुंचाना माना जा सकता है । 


भारतीय समाज, साहित्य और संस्कृति के विकास में भाषा और लेखकों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। इसलिए महापंडित राहुल सांकृत्यायन जैसी विभूतियों का सम्मान करना केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि भारत की बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत का सम्मान है।


आइए, हम सब भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध करने में अपना योगदान दें । 


धन्यवाद 


डॉ साकेत सहाय 

भाषा  सेवी 

#साकेत_विचार

#राहुल_सांकृत्यायन

Sunday, July 5, 2026

भाषा और तकनीक -जिम्मेदार उपयोग जरूरी

 भाषा और तकनीक -जिम्मेदार उपयोग




आज कृत्रिम मेधा (AI ) हमारे जीवन और कार्यशैली का हिस्सा बन चुकी है। यह लेखन, अनुवाद, शोध और सूचना जुटाने में अत्यंत उपयोगी है, लेकिन यह मान लेना कि एआई कभी गलती नहीं करता, यह एक बड़ी भूल है। आज के युवाओं के लिए तो यह एक अनिवार्य उपयोग का विषय बनता जा रहा है, जो उनके मानसिक विकास में एक बड़ी बाधा सिद्ध हो रही है । 

मशीन भी कभी-कभी ऐसी त्रुटियाँ कर देता है जो पहली नज़र में सही प्रतीत होती हैं, लेकिन तथ्यात्मक या भाषाई दृष्टि से गलत होती है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न्यायालयों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से तैयार फर्जी न्यायिक संदर्भों के इस्तेमाल पर कड़ी नाराजगी जताई गई है। शीर्ष न्यायालय ने इसे न्यायिक प्रक्रिया के लिए गंभीर खतरा बताते हुए एनसीएलटी का एक फैसला रद्द कर दिया और राष्ट्रीय विधिक आयोग (बीसीआई) से नियम बनाने पर विचार करने को कहा। दरअसल, राष्ट्रीय कंपनी विधिक अधिकरण (NCLT) द्वारा न्यायिक निर्णयों में एआई गढ़े संदर्भ (Fake AI-generated citations) के उपयोग पर गंभीर आपत्ति व्यक्त की गई है ।  यह मामला न्यायिक चूक से अधिक गंभीर असावधानी का सूचक है जो हमें सावधान करता है कि तकनीक का उपयोग विवेक और सत्यापन के साथ ही किया जाना चाहिए। यह कहा जा सकता है कि  “एआई एक उत्कृष्ट सहायक है, अंतिम निर्णायक नहीं।” 

तकनीक और एआई के दौर में भी तथ्यों की जाँच, भाषा की शुद्धता और विषय का सही ज्ञान उतना ही जरूरी है जितना आज से पहले था ।  आज भी ज्ञान का प्रसार मनुष्य की ही जिम्मेदारी है। दैनिक कार्यजीवन से जुड़े इन दो वाक्यों को ही लें- 
शीर्षक वाक्य -

(
१.
पर्यटक बने परेशानी।

अर्थ— पर्यटक ही परेशानी बन गए। 

२.
पर्यटक बनें परेशानी।
अर्थ— पर्यटकों को चाहिए कि वे परेशानी बनें।

केवल ‘बने’ और ‘बनें’ के अंतर ने ही पूरे वाक्य का अर्थ और भाव बदल दिया। यही भाषा की शक्ति है।  आइए, हम सब तकनीक को अपनाएँ, लेकिन भाषा की गरिमा, तथ्य की प्रामाणिकता और अपने विवेक को कभी न छोड़ें। क्योंकि तकनीक गति दे सकती है, परंतु भाषा और विवेक स्पष्टता और विश्वसनीयता देती है।
-डॉ साकेत सहाय 
भाषा-संचार विशेषज्ञ 
#साकेत_विचार #तकनीक #ज्ञान #हिंदी

सौमिल का जन्मदिन और केक के बहाने हिंदी की बात-

सौमिल का जन्मदिन और केक के बहाने हिंदी की बात- 🎂 एक केक, एक नाम और एक छोटी-सी जिद… ❤️ कल बड़े बेटे सौमिल का जन्मदिन था। हर बार की तरह इस बा...