Thursday, October 1, 2026

ऋषिकेश मुखर्जी : मानव अंतर्मन के कुशल चितेरे

 ऋषिकेश मुखर्जी : मानव अंतर्मन के कुशल चितेरे


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ऋषिकेश मुखर्जी : जयंती

आलेख : डॉ. साकेत सहाय

कुछ फिल्मकार फिल्में बनाते हैं, कुछ अपने समय को दर्ज करते हैं और कुछ ऐसे होते हैं, जो मनुष्य को उसकी पूरी संवेदना के साथ परदे पर उतार देते हैं। ऋषिकेश मुखर्जी इसी विरल परंपरा के फिल्मकार थे। उन्होंने भारतीय सिनेमा को चकाचौंध से अलग एक ऐसी दुनिया दी, जिसमें आम आदमी के सुख-दुःख, रिश्तों की गर्माहट और जीवन की छोटी-बड़ी विडंबनाएँ सहजता से दिखाई देती थीं। उनकी फिल्में देखते हुए लगता है कि परदे पर कोई कहानी नहीं, हमारा अपना जीवन घटित हो रहा है।

जयंती पर ऋषि दा को याद करना उस सिनेमा को याद करना है, जिसने बिना शोर किए दर्शकों के मन में स्थायी जगह बनाई। उनका अनुशासन कठोर था, लेकिन कलाकार की प्रतिभा पर उनकी दृष्टि उतनी ही गहरी। बड़े से बड़े सितारे भी उनके साथ काम करना अपना सौभाग्य समझते थे।

‘आनंद’ की कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है, जिसे पता है कि उसके जीवन की घड़ियाँ सीमित हैं, फिर भी वह हर पल को पूरी जीवंतता से जीता है। उसके सामने डॉ. भास्कर है, जो जीवन को तर्क और चिकित्सा की दृष्टि से देखने का अभ्यस्त है। आनंद के साथ उसका संबंध धीरे-धीरे उसे बदलता है। यहाँ कथा मृत्यु की ओर बढ़ती है, लेकिन फिल्म का भाव जीवन की ओर खुलता है। ऋषि दा मृत्यु को भावुकता का अंतिम बिंदु न बनाकर यह प्रश्न उठाते हैं कि कम समय में भी जीवन को अर्थपूर्ण कैसे बनाया जाए। आनंद की जीवंतता और भास्कर का परिवर्तन इसी विचार को मानवीय गहराई देते हैं।

‘सत्यकाम’ में एक आदर्शवादी युवक सत्यप्रिय उस सामाजिक व्यवस्था से टकराता है, जहाँ सिद्धांतों की कीमत अक्सर समझौते से चुकानी पड़ती है। वह ईमानदारी को केवल निजी गुण नहीं, जीवन का आधार मानता है; लेकिन परिस्थितियाँ बार-बार उसके विश्वास की परीक्षा लेती हैं। फिल्म की शक्ति इस संघर्ष में है कि सत्यप्रिय न तो परिस्थितियों के सामने सहजता से झुकता है, न उसके आदर्शों को सरल समाधान मिलता है। इसीलिए ‘सत्यकाम’ व्यक्ति की कहानी से आगे बढ़कर आदर्श और व्यवहार, नैतिकता और सामाजिक यथार्थ के बीच तनाव की कहानी बन जाती है।

‘अभिमान’ में कहानी एक दांपत्य से शुरू होती है। गायक सुबीर और प्रतिभाशाली उमा के रिश्ते में प्रेम है, लेकिन उमा की सफलता के साथ समीकरण बदलने लगते हैं। जिस प्रतिभा को सुबीर ने कभी सराहा था, वही सफलता उसके भीतर असुरक्षा पैदा करने लगती है। ऋषि दा इस परिवर्तन को अचानक नहीं दिखाते; छोटे-छोटे व्यवहार, मौन और दूरी के माध्यम से रिश्ते में बढ़ती दरार को रचते हैं। यही वजह है कि फिल्म केवल पति के अहं की कहानी नहीं रह जाती, बल्कि प्रेम में बराबरी, सफलता की साझेदारी और पुरुष-स्त्री संबंधों में छिपी असुरक्षाओं को भी सामने लाती है।

‘गुड्डी’ में एक किशोरी फिल्मी सितारों की दुनिया से इतना प्रभावित है कि उसे पर्दे का संसार वास्तविक जीवन से अधिक आकर्षक लगता है। कहानी उसके इसी मोह और फिर वास्तविकता से परिचय की यात्रा है। ऋषि दा उसके आकर्षण का मजाक नहीं बनाते; वे समझते हैं कि किशोर मन के लिए कल्पना और आदर्श कितने शक्तिशाली होते हैं। जब पर्दे के पीछे का यथार्थ सामने आता है, तो गुड्डी का मोहभंग केवल निराशा नहीं, परिपक्वता की शुरुआत बन जाता है। इसीलिए फिल्म सिनेमा के आकर्षण के साथ-साथ उम्र के उस पड़ाव को भी समझती है, जहाँ मन कल्पना से यथार्थ की ओर बढ़ता है।

‘मिली’ में बीमारी से जूझती मिली का जीवंत स्वभाव और भीतर से टूटे हुए शेखर का अकेलापन एक-दूसरे के सामने आता है। मिली जानती है कि उसका जीवन अनिश्चित है, फिर भी वह जीवन से प्रेम करना नहीं छोड़ती। शेखर इसके विपरीत जीते हुए भी भीतर से जीवन से कट चुका है। दोनों का मिलना कहानी को एक गहरे मानवीय अर्थ तक ले जाता है—कभी-कभी जीवन की ऊर्जा परिस्थितियों से नहीं, मनुष्य के भीतर से आती है। मिली की बीमारी फिल्म को करुण बनाती है, लेकिन उसकी जीवंतता उसे निराशा की फिल्म नहीं बनने देती।

ऋषिकेश मुखर्जी की विशेषता केवल गंभीर विषयों तक सीमित नहीं थी। ‘बावर्ची’, ‘चुपके-चुपके’ और ‘गोलमाल’ में उन्होंने हास्य के जरिए उसी मध्यवर्गीय जीवन को देखा, जिसे उनकी गंभीर फिल्मों में संवेदना के साथ देखा गया था। ‘बावर्ची’ में एक बिखरे हुए परिवार में एक साधारण-सा व्यक्ति आत्मीयता लौटा देता है; कहानी के बहाने फिल्म यह बताती है कि परिवार केवल एक छत के नीचे रहने का नाम नहीं। ‘चुपके-चुपके’ में भाषा, पहचान और सामाजिक औपचारिकताएँ हास्य पैदा करती हैं, जबकि ‘गोलमाल’ में नौकरी और सामाजिक प्रतिष्ठा के दबाव के बीच अपनी पहचान बनाए रखने की विडंबना सामने आती है। यहाँ हास्य केवल हँसाता नहीं, मध्यवर्गीय जीवन की आदतों और बनावटी गंभीरताओं को हल्के हाथ से खोलता है।

यही ऋषिकेश मुखर्जी के सिनेमा की असली व्यापकता है। ‘आनंद’ में मृत्यु के बीच जीवन है, ‘सत्यकाम’ में आदर्श और यथार्थ का संघर्ष, ‘अभिमान’ में रिश्ते और अहं का द्वंद्व, ‘गुड्डी’ में कल्पना और यथार्थ का अंतर, ‘मिली’ में बीमारी के बीच जीवन की जिजीविषा और उनकी हास्य फिल्मों में रोजमर्रा के जीवन की विसंगतियाँ। विषय बदलते रहे, लेकिन उनकी दृष्टि का केंद्र नहीं बदला—वह था मनुष्य।

वे अपने पात्रों को न पूरी तरह आदर्श बनाते थे, न खलनायक। उनकी कमजोरियों के पीछे भी कोई मानवीय कारण होता था और उनकी अच्छाइयों में भी जीवन की जटिलता। शायद यही कारण है कि ऋषिकेश मुखर्जी के चरित्र केवल फिल्म की कहानी पूरी होने तक हमारे साथ नहीं रहते, बल्कि उसके बाद भी हमारे भीतर कुछ छोड़ जाते हैं।

ऋषिकेश मुखर्जी का सिनेमा इसलिए याद नहीं रहता कि उसने हमें केवल अच्छी कहानियाँ दीं; वह इसलिए याद रहता है कि उसने हमें अपने आसपास के लोगों को थोड़ा अधिक समझना और अपने भीतर के मनुष्य को थोड़ा अधिक पहचानना सिखाया। उनके पात्र चले गए, उनकी कहानियाँ समाप्त हो गईं, पर उनकी संवेदना आज भी हमारे साथ चलती है।

ऋषि दा का जाना एक फिल्मकार का जाना था, लेकिन उनका सिनेमा आज भी जीवन के पर्दे पर चलता हुआ वह दृश्य है, जिसमें हमें बार-बार अपना चेहरा दिखाई देता है। यही किसी रचनाकार की सबसे गहरी स्मृति है—वह स्वयं अनुपस्थित होकर भी हमारी संवेदना में उपस्थित रहे।

ऋषि दा को विनम्र स्मरण।

डॉ. साकेत सहाय ©️

Tuesday, September 29, 2026

एआई कैमरे का गजब कारनामा....!

 एआई कैमरे का गजब!



पीठ पर टंगे गिटार को समझा ‘सवारी’, बिना हेलमेट बताकर काट दिया ₹500 रुपए का चालान!  आईटी नगरी बेंगलूरु की यह घटना केवल यंत्र बुद्धि यानी एआई की गलती भर नहीं, बल्कि तकनीक पर अंधे भरोसे और जवाबदेही का गंभीर सवाल भी उठाती है। घटना यह है कि भारत की सिलिकॉन वैली कहे जाने वाले बेंगलुरु में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से सुसज्जित उच्च तकनीक वाले ट्रैफिक कैमरों का एक बेहद हैरान कर देने वाला और हास्यास्पद कारनामा सामने आया है। सड़क पर अकेले सफर कर रहे सौविक दत्ता के पीछे टंगे गिटार को ‘कैमरे ने ‘बिना हेलमेट पीछे बैठा दूसरा इंसान (पिलियन राइडर)’?समझ लिया। हद तो तब हो गई जब सिस्टम ने यह भी निष्कर्ष निकाल लिया कि उस कथित ‘इंसान’ ने सिर पर हेलमेट नहीं पहना है, और सीधे ₹500 रुपये का ट्रैफिक चालान काटकर घर भेज दिया।

बेंगलुरु के रहने वाले सौविक दत्ता अपनी पत्नी के नाम पंजीकृत स्कूटी पर पूरी तरह नियम मानते हुए हेलमेट पहनकर अकेले जा रहे थे। उनकी पीठ पर सिर्फ एक गिटार टंगा हुआ था। कुछ दिन बाद जब उनके मोबाइल पर चालान का मैसेज आया, तो वह सिर पकड़कर बैठ गए। चालान में नियम उल्लंघन की वजह ‘पीछे बैठी सवारी का बिना हेलमेट होना’ दर्ज थी। यानी जिस बाइक पर सिर्फ एक इंसान सवार था, कैमरे की नजर में वहां गिटार ही दूसरा इंसान बनकर नियमों की धज्जियां उड़ा रहा था।

इस अजब चालान से परेशान होकर सौविक ने पूरी घटना और चालान की कॉपी सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए बेंगलुरु ट्रैफिक पुलिस को टैग किया। उन्होंने पूरी स्थिति साफ करते हुए जुर्माना रद्द करने की अपील की। पोस्ट सामने आते ही इंटरनेट पर मीम्स और तंज की बाढ़ आ गई। यूजर्स ने सवाल उठाया कि शहर में लाखों-करोड़ों की लागत से लगाए गए स्मार्ट सिस्टम अगर गिटार और इंसान के बीच का फर्क नहीं पहचान सकते, तो फिर इंसानी जांच (मैनुअल वेरिफिकेशन) के बिना सीधे चालान कैसे जारी किए जा रहे हैं।

इसी के साथ एआई के अंधे जुर्माने पर भी बहस छिड़ गई ।  विशेषज्ञों के अनुसार एआई कैमरे इमेज प्रोसेसिंग और पैटर्न के आधार पर फैसला लेते हैं। गिटार के कवर और उसकी लंबाई-चौड़ाई को सिस्टम ने बाइक पर बैठे दूसरे शख्स का आकार मान लिया और रंग व पैटर्न न मिलने पर उसे बिना हेलमेट मानकर पेनल्टी लगा दी। इस घटना का स्पष्ट संदेश यह है कि मशीन कितनी भी एडवांस क्यों न हो, अंतिम मुहर लगाने से पहले इंसानी समीक्षा बेहद जरूरी है, वरना बेकसूर नागरिकों को बिना किसी गलती के दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ेंगे।

गलती गिटार की नहीं, तकनीक की भी नहीं। गलती तब गंभीर होती है, जब तकनीक के निष्कर्ष को सत्य मानकर इंसानी सत्यापन की आवश्यकता ही समाप्त कर दी जाए। एआई व्यवस्था को तेज, पारदर्शी और प्रभावी बना सकता है; लेकिन एआई की पहचान अंतिम सत्य नहीं हो सकती।  कल गिटार की जगह कोई बैग, सामान या कोई अन्य वस्तु भी ‘सवारी’ बन सकती है। सवाल यह नहीं कि एआई से गलती क्यों हुई—सवाल यह है कि गलत AI निर्णय की जिम्मेदारी कौन लेगा?

कहा जा सकता है कि तकनीक निर्णय में सहायक हो, परंतु निर्णायक की भूमिका नहीं निभाए।  भला, मशीन की गलती का खामियाजा इंसान क्यों भुगतेगा? कह सकते हैं -“माना कि एआई की आँखें तेज हैं, लेकिन विवेक अभी इंसान के पास है!😊

स्रोत-समाचार पत्रों में प्रकाशित । 

— डॉ. साकेत सहाय 

✍️ लेखक

Monday, September 14, 2026

हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

 आप सभी को हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!🙏

विचार-


हिंदी की लड़ाई आज केवल कार्यालय की फाइलों में नहीं, बल्कि घर, स्कूल, बाजार, रोजगार और सामाजिक प्रतिष्ठा के मैदान में लड़ी जानी है।  हिंदी को केवल मंच पर सम्मान, कार्यालय में पुरस्कार और हिंदी दिवस पर आयोजन-गतिविधियां-मिष्ठान नहीं चाहिए; बल्कि उसे काम की भाषा, ज्ञान की भाषा, तकनीक की भाषा और अवसर की भाषा बनाने पर निरंतर ज़ोर देना होगा। जिस भाषा में रोज़गार और उन्नति का भरोसा नहीं दिखेगा, नई पीढ़ी उससे भावनात्मक रूप से जुड़ी होने के बावजूद व्यवहार में उससे कोसो दूर होती जाएगी।

ऐसे में जवाबदेही आवश्यक है; पुरस्कार एक साधन हैं, परंतु लक्ष्य नहीं। यह चिर सत्य है हिंदी की शक्ति केवल “दंड” से नहीं, दक्षता, अवसर, तकनीकी सामर्थ्य, आर्थिक उपयोगिता और सामाजिक आत्मविश्वास से बनेगी। हिंदी को किसी भारतीय भाषा से युद्ध करना नहीं है; बल्कि उसे तो भारतीय भाषाओं के साथ खड़े होकर अंग्रेज़ी के अनावश्यक वर्चस्व का विकल्प बनना है और इसमें हिंदी की सामूहिकता जरूरी है जो दुर्भाग्य से मंचों या सजावटी भाषणों तक ही दिख रही है ।  हिंदी के प्रयोग वृद्धि का सबसे प्रभावी हथियार लड़ाई, चिंता, शोक, या निराशा नही है । बल्कि संवैधानिक शक्ति , सामूहिक प्रयासों से उसे सक्षम बनाना है कि लोग उसे छोड़ना ही न चाहें जैसे स्वाधीनता आंदोलन के दौरान हिंदी सबकी चहेती थी या आज फ़िल्मी गानों, बाज़ार की भाषा या चुनावी सभाओं में  है । हिंदी दिवस का वास्तविक संकल्प - हिंदी को ऐसी सक्षम, उपयोगी और अवसर देने वाली भाषा बनाएँ कि उसे अपनाना भावना भर नहीं, स्वाभाविक व्यवहार और भविष्य का विकल्प बन जाए।

जय हिंद! जय हिंदी!! जय नागरी!!! 🇮🇳

— डॉ. साकेत  सहाय

हैदराबाद 

१४.०९.२०२६

#साकेत_विचार

युवा पीढ़ी का हिंदी के प्रति दायित्व

 




Wednesday, September 2, 2026

तकनीक के साथ, शिक्षक के हाथ

 तकनीक के साथ, शिक्षक के हाथ…

अहा! जिंदगी, सितंबर, २६ अंक





-डॉ साकेत सहाय 

पत्र-पत्रिकाओं और सोशल मीडिया के माध्यम से लिखना मेरे लिए लंबे समय से अभिव्यक्ति का एक प्रिय माध्यम रहा है। अपनी प्रकाशित रचनाएँ समय-समय पर आप सभी से साझा करता रहा हूँ। लेखन के प्रति अनुराग बचपन से ही रहा है। उन दिनों ‘अहा! जिंदगी’ अपने तेवर, विषय-वस्तु और रोचक एवं ज्ञानवर्द्धक सामग्री के लिए एक अलग पहचान रखती थी। मन में कभी इच्छा रही होगी कि इस पत्रिका में भी लिखूँ, लेकिन वह संयोग कभी नहीं बना। इसलिए मुझे विशेष प्रसन्नता हुई, जब एक दिन LinkedIn पर इस पत्रिका की उप संपादक सुश्री प्रज्ञा प्रिया जी ने शिक्षक दिवस के अवसर पर एक आलेख लिखने के लिए मैसेंजर के माध्यम से मुझसे संपर्क किया। सच कहूँ तो अच्छा लगा कि उन्होंने मुझे इस योग्य समझा।  युवा, विनम्र, मितभाषी और सुरुचिपूर्ण लेखनी की धनी प्रज्ञा जी के प्रस्ताव पर मैंने ‘अहा! जिंदगी’ के सितंबर 2026 अंक के ‘अहा विशेष—प्यारे मास्टरजी’ के लिए लिखने का दायित्व स्वीकार किया और ‘तकनीक के साथ, शिक्षक के हाथ’ जैसे आज के बेहद प्रासंगिक विषय पर कलम चलाने का साहस किया।  आज डिजिटल युग ने शिक्षा के तौर-तरीकों को भले ही बदल दिया है, लेकिन शिक्षक की भूमिका समाप्त नहीं हुई है; बल्कि वह पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। तकनीक जानकारी दे सकती है, संसाधन उपलब्ध करा सकती है, सीखने की गति बढ़ा सकती है—लेकिन संस्कार, संवेदना, विवेक और सही दिशा देने का काम शिक्षक ही करता है। इसलिए आज सवाल ‘तकनीक बनाम शिक्षक’ का नहीं, बल्कि ‘तकनीक और शिक्षक’ के सार्थक समन्वय का है।  जब तकनीक ज्ञान का माध्यम बने और शिक्षक उस ज्ञान को दिशा दे, तभी शिक्षा वास्तव में सशक्त, सार्थक और मानवीय बनती है।

अत: यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि 

“तकनीक के साथ, शिक्षक के हाथ—यही भविष्य की शिक्षा का संतुलित मंत्र है।”

लेख कैसा बन पड़ा है, यह तो आप सभी पाठक ही बताएँगे। प्रकाशित रचना आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है। आपकी प्रतिक्रिया और आलोचना दोनों का इंतज़ार रहेगा। 🙏


#तकनीक #शिक्षा #शिक्षक #DigitalEducation #शिक्षाकाभविष्य #अहाजिंदगी #प्यारेमास्टरजी #साकेत_विचार

Monday, August 31, 2026

हिंदी चाहिए… हिंदी का सम्मान नहीं!

 हिंदी चाहिए… हिंदी का सम्मान नहीं!





जब बाजार चाहिए—हिंदी याद आती है।

जब वोट चाहिए—हिंदी याद आती है।

जब जनता तक पहुँचना हो—हिंदी याद आती है। जब विज्ञापन बेचना हो—हिंदी याद आती है। लेकिन जब प्रतिष्ठा देने की बात आती है—हिंदी अचानक पिछड़ी हो जाती है!

यही तो हमारी भाषायी विडंबना है।

अंग्रेज़ी के समर्थक हिंदी के करोड़ों लोगों तक पहुँचने के लिए हिंदी का सहारा लेते हैं। हिंदी की ताकत से अपना बाजार बनाते हैं और फिर उसी हिंदी को ज्ञान, रोजगार, प्रशासन और प्रतिष्ठा के प्रश्न पर पीछे खड़ा कर देते हैं। उनके लिए ‘हिंदी का दोहन स्वीकार्य है,

हिंदी का सम्मान असुविधाजनक है!

आजादी के बाद नेताओं ने हिंदी के नाम पर भाषण दिए, हिंदी के नाम पर राजनीति की, अभिनेताओं ने हिंदी के बाजार से प्रसिद्धि पाई, पत्रकारों ने हिंदी के पाठकों से अपना कारोबार खड़ा किया और प्रशासकों ने हिंदी के नाम पर योजनाएँ बनाईं।  लेकिन जब हिंदी को वास्तविक अधिकार, अवसर और प्रतिष्ठा देने की बात आई तो बहाने भी आए और विशेषण भी—कभी हिंदी पिछड़ी बताई गई, कभी विभाजनकारी, कभी ‘खिचड़ी’, तो कभी केवल आम आदमी और सेवकों की भाषा!

कमाल यह है कि हिंदी की कमाई सबको चाहिए, लेकिन हिंदी की गरिमा सबको नहीं चाहिए।  उत्तर हो या दक्षिण, पूरब हो या पश्चिम—हिंदी के विशाल बाजार से लाभ उठाने में किसी को संकोच नहीं। मगर हिंदी को बराबरी का सम्मान देने की बारी आते ही भाषा का प्रश्न राजनीति, क्षेत्र और पहचान की दीवारों में उलझा दिया जाता है।

यहाँ एक बात स्पष्ट कर देना जरूरी है—

मैं अंग्रेज़ी का विरोधी नहीं हूँ।

मैं किसी भी भारतीय भाषा का विरोधी नहीं हूँ। मैं हिंदी को किसी भाषा के ऊपर बैठाने की माँग भी नहीं कर रहा। मैं केवल इतना पूछ रहा हूँ— जिस हिंदी से आपको बाजार मिलता है, क्या उसी हिंदी को सम्मान नहीं मिलना चाहिए? जिस हिंदी से आप करोड़ों लोगों तक पहुँचते हैं, क्या उसी हिंदी में ज्ञान और प्रशासन नहीं पहुँच सकता?

जिस हिंदी से आप अपना संदेश बेचते हैं, क्या उसी हिंदी में भारत का भविष्य गढ़ने का विश्वास नहीं है? समस्या अंग्रेज़ी नहीं है।  समस्या अंग्रेज़ी की गुलामी वाली मानसिकता है। दुनिया की कोई भी विकसित सभ्यता अपनी भाषा को बाजार में बेचकर और व्यवस्था में ठुकराकर महान नहीं बनी। हमें अंग्रेज़ी सीखनी चाहिए—जरूर सीखनी चाहिए। दुनिया से जुड़ना चाहिए—पूरी शक्ति से जुड़ना चाहिए।

लेकिन अपनी भाषाओं को हीन समझकर नहीं। बहुभाषिकता भारत की शक्ति तभी बनेगी, जब भारतीय भाषाएँ एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी नहीं, सहयात्री बनेंगी।

हिंदी को तमिल से लड़ाने की जरूरत नहीं।

हिंदी को तेलुगु से लड़ाने की जरूरत नहीं।

हिंदी को बंगला, मराठी, कन्नड़, मलयालम, असमिया या किसी अन्य भारतीय भाषा के विरुद्ध खड़ा करने की जरूरत नहीं।

भारतीय भाषाओं के बीच संघर्ष नहीं, अंग्रेज़ी-प्रधान मानसिकता से मुक्ति का संवाद चाहिए। और अंत में उन लोगों से एक विनम्र प्रश्न— हिंदी का इस्तेमाल करना बंद मत कीजिए। बस उसका इस्तेमाल करने के बाद उसे भूलिए मत।

क्योंकि हिंदी केवल विज्ञापन का बाजार नहीं है। केवल चुनाव का भाषण नहीं है और  केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है।

हिंदी भारत के करोड़ों लोगों की आवाज़ है।

और आवाज़ का इस्तेमाल नहीं किया जाता—आवाज़ का सम्मान किया जाता है।

ईश्वर हमें इतनी सद्बुद्धि दे कि हम अपनी भाषाओं को उपयोग की वस्तु नहीं, राष्ट्र की जीवंत शक्ति समझ सकें।

फिर भी मुझे कोई चिंता नहीं।

जब तक भारत है, जब तक भारत की मिट्टी है,

जब तक इस मिट्टी में लोकजीवन की साँस है—

हिंदी कण-कण में विद्यमान रहेगी।


जय हिंद।

जय हिंदी। 🇮🇳


#साकेत_विचार

डॉ. साकेत सहाय

Monday, August 24, 2026

संस्कृत, संस्कार, समाज और राज

 संस्कृत, संस्कार, समाज और राज 




प्रस्तुत कथा मूलतः शक्ति, नेतृत्व, उकसावे और राजनीतिक बुद्धिमत्ता के बीच अंतर को रेखांकित करती है।  इस कथा का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि हर चुनौती का उत्तर लड़कर देना आवश्यक नहीं होता। गधा शेर को बार-बार उकसाता है, लेकिन शेर यह समझता है कि उससे भिड़ना वास्तव में गधे को महत्व देना होगा। वह अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के बजाय अपने कर्तव्य पर केंद्रित रहता है।

आइए, पहले कथा का पठन करते हैं- 

किसी जंगल में एक गधा रहता था। उसने बाकी जीवों से कहना आरंभ कर दिया कि, शेर एक अच्छा राजा नहीं है। उसमें कोई दम नहीं है। संकट काल में वह तुम्हारी मदद नहीं कर पाएगा। अतः तुम सब लोग मुझे अपना राजा मान लो। इसपर जंगल के सभी जीव हंसने लगे।

गधा अपने आप को बलशाली दिखाने के लिए सुरक्षित अंतर से शेर को गालियां बकने लगा। उस पर भिन्न-भिन्न प्रकार के आरोप लगाने लगा। गधा शेर को आह्वान करने लगा कि, अगर आप में साहस है, तो मुझसे लड़कर दिखाओ।

कुशल कामकाजी शेर ने गधे की तरफ बिल्कुल ध्यान ही नही दिया और निष्ठापूर्वक अपना काम करता रहा।  थक-हारकर गधा वापस चला गया और फिर बाकी जीवों को बताने लगा कि, शेर तो बिल्कुल कमजोर है। मैंने उसे इतनी गालियां दीं, आह्वान किया, परंतु वह चुपचाप सुनता रहा।

बकरी, खरगोश जैसे कुछ जीव, जो गधे के उपकार को मानते थे, क्योंकि गधा उन्हें भोजन के लिए हरि घास के मैदानों का पता बताता था, वे गधे की हां में हां मिलाने लगे। गधे के जाने के बाद शेर के महामंत्री हाथी ने उससे पूछा :- महाराज! वो गधा आपको इतनी गालियां बकता रहा, आपको लड़ने के लिए आह्वान करता रहा, फिर भी आप चुप क्यों रहे ? आप चाहते, तो पंजे के मात्र एक वार से ही उसका काम समाप्त कर सकते थे। अथवा मुझे आदेश दे देते, तो मैं क्षण भर में उसकी चटनी बना देता। इससे जंगल आपकी धाक भी कायम रहती।

शेर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया :- गजराज! इसके तीन कारण हैं।

प्रथम कारण :- अगर मैं अथवा आप गधे से लड़ते, तो अन्य जीव यह कहते कि, हमारा राजा तो तानाशाह है। भला गधे जैसे निरीह जीव से भी कोई बुद्धिमान लड़ता है ?

द्वितीय कारण :-  लड़ाई में गधा मर जाता, तो उसकी माँ, परिवार वाले और मूर्ख भक्तगण उसे शहीद बता कर बाकी जीवों की सहानुभूति अर्जित करके उन्हें हमारे विरुद्ध विद्रोह के लिए उकसाते।

तृतीय कारण :- गधे के परिवार को वास्तव लाभ मिलता देख कई अन्य जीव भी शहीद बनने की जुगाड में लग जाते।

मैं उस गधे के अथवा उसके सखाओं के कारण जंगल का राजा अर्थात वनराज नहीं हूं।

“नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।

विक्रमार्जितसत्त्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥”

अर्थात् सिंह का जंगल में कोई राज्याभिषेक नहीं होता; उसके पराक्रम और सामर्थ्य के कारण वह स्वयं ही पशुओं का राजा बन जाता है।

टिप्पणी :- 

कथा के सामाजिक-राजनीतिक संकेत विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं:

* उकसावे में आकर प्रतिक्रिया देना हमेशा बुद्धिमानी नहीं है। कभी-कभी प्रतिद्वंद्वी की सबसे बड़ी ताकत उसकी अपनी शक्ति नहीं, बल्कि आपको प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर करना होती है। गधा कुछ जीवों की हाँ में हाँ पाकर स्वयं को राजा समझने लगता है, जबकि शेर का नेतृत्व उसके व्यवहार, क्षमता और जिम्मेदारी से स्थापित है। इसलिए कथा को किसी विशेष व्यक्ति, दल या वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति से जोड़ना आवश्यक नहीं है। 

इसे व्यापक रूप से “शोर मचाने वाले और वास्तव में नेतृत्व करने वाले के अंतर” की कहानी के रूप में भी पढ़ा जा सकता है और शायद इसका सबसे व्यावहारिक निष्कर्ष यही है: जिसे अपनी क्षमता पर विश्वास होता है, वह हर भौंकने वाले को जवाब देना अपनी जिम्मेदारी नहीं समझता।


इस कथा का सामाजिक-राजनैतिक अर्थ लगाने के लिए आप पूर्णतः स्वतंत्र हैं।


-डा. साकेत सहाय

ऋषिकेश मुखर्जी : मानव अंतर्मन के कुशल चितेरे

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