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प्रतिमा तोड़ना असहिष्णुता का परिचायक
कोयलांचल के रानीगंज में महापंडित राहुल सांकृत्यायन की स्थापित प्रतिमा को तोड़े जाने की घटना प्रत्येक संवेदनशील नागरिक के लिए चिंता का विषय है। इस कृत्य की जितनी भी निंदा की जाए, वह कम है। सरकार और समाज दोनों को इस घटना का गंभीरता से संज्ञान लेते हुए सम्मानपूर्वक राहुल जी की प्रतिमा का पुनर्स्थापन सुनिश्चित करना चाहिए।
वर्ष 1994 में राहुल सांकृत्यायन की जन्मतिथि के अवसर पर रानीगंज में स्थापित की गई प्रतिमा को क्षति पहुंचाना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। राहुल सांकृत्यायन ने भारतीय साहित्य, इतिहास, दर्शन और संस्कृति के क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया। उन्होंने सैकड़ों पुस्तकों की रचना की, स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई, किसानों और मजदूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया तथा तिब्बत से दुर्लभ पांडुलिपियां लाकर भारतीय ज्ञान-संपदा को समृद्ध किया। ये बहुमूल्य पांडुलिपियां आज भी पटना संग्रहालय की धरोहर हैं। मेरी मातृभूमि सारण जिले से उनका गहरा जुड़ाव रहा। उन्होंने सारण की धरती पर किसान आंदोलन का नेतृत्व किया, लाठियां खाईं और जेल भी गए। वर्ष 1948 में गोपालगंज में आयोजित भोजपुरी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता की थी। सारण जिले के परसा स्थित परसागढ़ मठ में उन्होंने संन्यासी के रूप में भी समय बिताया।
वैचारिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन किसी महापुरुष की प्रतिमा को तोड़ना असहिष्णुता और सांस्कृतिक विरासत के प्रति अनादर का परिचायक है। ऐसे में यह जरूरी है कि राहुल सांकृत्यायन की प्रतिमा को अविलंब पुनः स्थापित किया जाए तथा ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं। ऐसी घटनाएँ देश और समाज के लिए घातक हैं ।
इस दुखद घटना के बीच एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि इसके बहाने राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रबल समर्थक राहुल सांकृत्यायन के सम्मान में वे लोग भी आवाज़ उठा रहे हैं, जो सामान्यतः हिंदी के आलोचक माने जाते हैं। यह स्वागतयोग्य है, क्योंकि साहित्यकार किसी एक विचारधारा, दल या वर्ग के नहीं होते; वे पूरे समाज की साझा धरोहर होते हैं। उनकी रचनाएँ मानवता और समाज के कल्याण के लिए होती हैं।
अपनी यायावरी के लिए प्रसिद्ध महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने अपने व्यापक अनुभवों से यह सिद्ध किया था कि भारत के विशाल भूभाग में शिक्षित-अशिक्षित, ग्रामीण-शहरी सभी किसी न किसी रूप में हिंदी को समझते हैं। उनका मानना था कि किसी राष्ट्र के लिए एक व्यापक संपर्क भाषा का होना राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करता है। वे यह भी कहते थे कि जब कोई समाज अपनी भाषा का सम्मान करना छोड़ देता है, तो उसके आत्मसम्मान और सांस्कृतिक गौरव पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
पश्चिम बंगाल में हिंदी के महान साहित्यकार की प्रतिमा को तोड़ा जाना संपूर्ण भारतीय ज्ञान परंपरा का निरादर है । राष्ट्रभाषा हिंदी और उससे जुड़े साहित्यकारों का सम्मान करना केवल एक भाषा का सम्मान करना नहीं, बल्कि भारतीय साहित्य, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा का सम्मान करना है। वही भाषा, साहित्य और संस्कृति जीवंत और जागृत रह सकती है, जो जनता की भावनाओं, विचारों और जीवन का सच्चा प्रतिनिधित्व करे।
आज भी हिंदी जानने वाला व्यक्ति देश के अधिकांश हिस्सों में सहजता से संवाद स्थापित कर सकता है। हिंदी की सबसे बड़ी विशेषता इसकी उदारता है। इसने कभी केवल विदेशी मूल होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया, बल्कि समय-समय पर विभिन्न भारतीय और विदेशी भाषाओं के शब्दों को अपनाकर स्वयं को समृद्ध बनाया है। यही समावेशी स्वभाव हिंदी को व्यापक और जीवंत बनाता है।
पश्चिम बंगाल में उनकी प्रतिमा का होना राष्ट्र के समावेशी स्वरूप को दर्शाता है और उसका तोड़ा जाना इसको क्षति पहुंचाना माना जा सकता है ।
भारतीय समाज, साहित्य और संस्कृति के विकास में भाषा और लेखकों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। इसलिए महापंडित राहुल सांकृत्यायन जैसी विभूतियों का सम्मान करना केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि भारत की बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत का सम्मान है।
आइए, हम सब भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध करने में अपना योगदान दें ।
धन्यवाद
डॉ साकेत सहाय
भाषा सेवी
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