Thursday, April 23, 2026

विश्व पुस्तक दिवस पर विचार

 विश्व पुस्तक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ! बधाई!



साहित्य और लोक व्यवहार जीवन को जानने का सबसे बड़ा जरिया है । यह जीवन का कटु यथार्थ है कि हम अत्यधिक योग्यता से भय खाते हैं और उससे असुरक्षित महसूस करते हुए उसके रास्तों को छोटा करने का प्रयास करते हैं या किसी अयोग्य को डोर थमा देते हैं परंतु भूल जाते हैं कि बिगाड़ने वाले से बड़ा बनाने वाला होता है । जीवन की राह में नि: संदेह कुछ बिगाड़ने वाले हैं, रास्ते काटने वाले हैं, तो निश्चित ही कुछ बनाने वाले भी होंगे, राह बनाने वाले भी होंगे ही, इसलिए अपना काम करते रहिए । दुनिया है,  ऐसी ही थी, ऐसी ही रहेगी । जिसके भाग्य और पुरुषार्थ का जो है वह उसे मिल ही जाता है, सबकुछ केवल आपका नहीं हो  सकता। सबके अपने हिस्से हैं, सबका अपना आकाश और उस आकाश को पाने हेतु यत्न कीजिए । जो मिलना है वह मिलेगा । 

खूब पढ़िए, ✍️ लिखिए 

जीवन के सफ़र का आनंद लीजिए!

-डॉ साकेत सहाय

Wednesday, February 25, 2026

स्वामी दयानंद सरस्वती

आज 12 फरवरी है। स्वामी दयानंद सरस्वती जयंती है। आर्य समाज के प्रवर्तक और प्रखर सुधारवादी संन्यासी स्वामी दयानंद सरस्वती आधुनिक भारत के महान् चिंतक, धर्मवेत्ता, समाज सुधारक के रूप में चिर प्रतिष्ठित हैं । आर्य समाज" के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी, 1824 को काठियावाड़ (गुजरात) के टंकारा, मोरवी गाँव में हुआ था। उनके बचपन का नाम मूलशंकर था। वे सन्यासी थे और संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे । आप वेदांत के प्रभाव में आये तथा आत्मा और ब्रह्म की एकता को स्वीकार किया । स्वामीजी हिंदी के प्रबल समर्थक थे।  उनके शब्द थे- ‘मेरी आँखें तो उस दिन को देखने के लिए तरस रहीं हैं, जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब भारतीय एक भाषा को बोलने और समझने लग जायेंगे। ‘ पट्टाभि सीतारमैया का विचार था  कि गाँधी जी राष्ट्रपिता हैं, पर स्वामी दयानंद राष्ट्र-पितामह हैं। फ्रेञ्च लेखक रोमां रोला के अनुसार ‘स्वामी दयानंद राष्ट्रीय भावना और जन-जागृति को क्रियात्मक रुप देने में प्रयत्नशील थे।‘

भारत सरकार ने इनकी २००वीं जयंती को ज्ञान ज्योति पर्व के रूप में मनाया था । स्वामी दयानंद सरस्वती सनातन सभ्यता के महान ग्रंथ ‘वेदों की ओर लौटो’ का आह्वान किया। आप 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में सनातन पंथ के पुनरुद्धार आंदोलन के सबसे बड़े प्रणेता माने जाते हैं। ब्रिटिश सरकार द्वारा 1813 में चार्टर एक्ट लाए जाने के बाद ईसाई पादरियों ने पर्याप्त संख्या में भारत आना आरंभ कर दिया था। इन ईसाई धर्म प्रचारकों ने षडयंत्रपूर्वक सामाजिक कुरीतियों को हिंदू धर्म में सम्मिलित कर कठोर आघात पहुँचाए।  19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में कई सामाजिक व धार्मिक आंदोलन हुए। स्वामी दयानंद सरस्वती अपने गुरु मथुरा के स्वामी विरजानंद से वेदों का ज्ञान प्राप्त करके हिंदू धर्म सभ्यता और भाषा के प्रचार का कार्य आरंभ किया। आपने सत्यार्थ प्रकाश की रचना हिंदी में करके राष्ट्रभाषा को गौरव दिलाया। वर्ष 1875 में आपने आर्य समाज की स्थापना की। आर्य समाज ने हिंदू धर्म और समाज के सुधार हेतु कई महत्वपूर्ण कार्य किए। 

-डॉ साकेत सहाय

भाषा एवं संचार अध्येता 

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#साकेत_विचार

#हिन्दी

सरदार अजीत सिंह संधू

 आज महान भारतीय क्रांतिकारी और राष्ट्रवादी अजीत सिंह संधू (23 फरवरी 1881 – 15 अगस्त 1947) जी की जयंती है ।  भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान सरदार अजीत सिंह का जन्म 23 फरवरी 1881 को पंजाब के जालंधर के खटकड़ कलां गांव में हुआ था।  अजीत सिंह शहीद भगत सिंह के चाचा थे और उन्होंने भारत में ब्रिटिश शासन को चुनौती दी तथा औपनिवेशिक शासन की खुली आलोचना की और खुलकर विरोध भी किया। उन्हें राजनीतिक 'विद्रोही' घोषित कर दिया गया था। उनका अधिकांश जीवन जेल में बीता।  1906 ई. में लाला लाजपत राय जी के साथ ही साथ उन्हें भी देश निकाले का दण्ड दिया गया था।  पंजाब उपनिवेशीकरण अधिनियम (संशोधन) 1906 के नाम से जाने जाने वाले किसान विरोधी कानूनों के खिलाफ आंदोलनों को संगठित करने में अपनी भूमिका के लिए जाने जाते हैं। इनके बारे में कभी बाल गंगाधर तिलक ने कहा था  ये स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति बनने योग्य हैं  उस समय उनकी उम्र केवल 25 साल थी। 1909 में सरदार अजीत सिंह अपना घर-बार छोड़ कर देश सेवा के लिए विदेश यात्रा पर निकल चुके थे, उस समय उनकी उम्र 28 वर्ष की थी।  इरान के रास्ते तुर्की, जर्मनी, ब्राजील, स्विट्जरलैंड, इटली, जापान आदि देशों में रहकर उन्होंने क्रांति का बीज बोया और  आजाद हिन्द फौज की स्थापना की। नेताजी को हिटलर और मुसोलिनी से मिलाया। मुसोलिनी तो उनके व्यक्तित्व के मुरीद थे। इन दिनों में उन्होंने 40 भाषाओं पर अधिकार प्राप्त कर ली थी। रोम रेडियो को तो उन्होंने नया नाम दे दिया था, 'आजाद हिन्द रेडियो' तथा इसके माध्यम से क्रांति का प्रचार प्रसार किया। मार्च 1947 में वे भारत वापस लौटे। भारत लौटने पर पत्नी ने पहचान के लिए कई सवाल पूछे, जिनका सही जवाब मिलने के बाद भी उनकी पत्नी को विश्वास नही। इतनी भाषाओं के ज्ञानी हो चुके थे सरदार, कि उन्हें पहचानना बहुत ही मुश्किल था। 

भारत के विभाजन से वे इतने व्यथित थे कि 15 अगस्त 1947 के सुबह 4 बजे उन्होंने अपने पूरे परिवार को जगाया और ‘जय हिन्द’  कह कर इस संसार से विदा ले ली।  

नमन! उनके त्याग को 🙏

#साकेत_विचार #इतिहास #भारतीय_स्वाधीनता_आंदोलन

शब्द विचार-केरलम

 शब्द  विचार

आज का शब्द है- केरलम – 

केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद केरल को अब केरलम के नाम से जाना जाएगा । राज्य की विधानसभा पहले ही आधिकारिक रिकॉर्ड में राज्य के नाम को बदलने का प्रस्ताव पारित कर चुकी है। 

मलयालम भाषा में 'केरा' का अर्थ है 'नारियल का पेड़' और 'अलम' का अर्थ है 'भूमि' । इस प्रकार केरलम का अर्थ हुआ ‘नारियल के पेड़ों की भूमि।  यह नाम केरल की भौगोलिक पृष्ठ भूमि को दर्शाता है।

अनेक भाषाविदों का मानना है कि 'केरलम' की उत्पत्ति प्राचीन शब्द 'चेर-अलम' से हुई है। 'चेर'  का अर्थ है गाद, कीचड़ या वह गीली मिट्टी जो नदियों और समुद्र के संगम पर बनती है।

अलम' का अर्थ है क्षेत्र या स्थान।

इस प्रकार, 'केरलम' का अर्थ है "आर्द्रभूमि या दलदली मिट्टी वाली भूमि"। यह उन बैकवाटर्स और लैगून का सटीक वर्णन है जो केरल की जीवनरेखा हैं। 'केरलम' का संबंध सीधे तौर पर यहाँ की जल-पारिस्थितिकी से मिलता है।


वैज्ञानिक संदर्भ: केरल विश्‍वविद्यालय में प्रकाशित शोध पत्र "Coastal wetlands of Kerala: Origin and evolution" स्पष्ट करता है कि इस क्षेत्र का निर्माण समुद्र के पीछे हटने और नदियों द्वारा जमा की गई गाद से हुआ है। यहीं से इसका नाम  'चेर' (कीचड़) को वैज्ञानिक आधार देता है।

#केरलम 

#साकेत_विचार

Friday, February 13, 2026

आकाशवाणी हैदराबाद में रिकॉर्डिंग

 आज विश्व रेडियो दिवस है। अब यह एक स्थापित तथ्य है कि संचार के शक्तिशाली और कम लागत वाले संचार उपकरण के रूप में रेडियो सर्वाधिक लोकप्रिय संचार साधन है ।  रेडियो ने विशेष रूप से दूरस्थ समुदायों और समाज के कमजोर वर्गों निरक्षर, विकलांग व्यक्ति, महिलाएं, युवा और आर्थिक रूप से वंचित समूहों तक ज्ञान-विज्ञान, मनोरंजन एवं जागरूकता पहलों के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है ।  आज भारत का राष्ट्रीय प्रसारक और प्रमुख सार्वजनिक सेवा प्रसारक आकाशवाणी (ऑल इंडिया रेडियो (एआईआर), विश्व के सबसे बड़े प्रसारण संगठनों में से एक है। इसकी घरेलू सेवा में देश भर में 400 से अधिक स्टेशन शामिल हैं, जो भारत के लगभग 92 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र और कुल जनसंख्या के 99.19 प्रतिशत तक पहुंचते हैं। आकाशवाणी 23 भाषाओं और 146 बोलियों में कार्यक्रम प्रसारित करता है, जो देश की समृद्ध भाषाई विविधता को दर्शाता है।  यह सुखद संयोग है कि इस अवसर पर अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस (21 फरवरी) पर प्रसारण के निमित्त विशेष परिचर्चा ‘भाषा की मर्यादा’ कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग के लिए विषय विशेषज्ञ के रूप में आकाशवाणी, हैदराबाद (AIR) जाने का अवसर मिला। इस अवसर पर विषय विशेषज्ञ के रूप में हिन्दी के विद्वान स्नेहमयी व्यवहार के धनी प्रो. ऋषभदेव शर्मा जी का भी  सान्निध्य मिला । कार्यक्रम का प्रसारण अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर किया जाएगा । अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस (21 फरवरी) पर प्रसारण के निमित्त विशेष परिचर्चा की रिकॉर्डिंग। विशेषज्ञ - डॉ. साकेत सहाय और प्रो. ऋषभदेव शर्मा। सूत्रधार- सीमा कुमारी, सहायक निदेशक का विशेष धन्यवाद 

#साकेत_विचार 

#रेडियो 

#allindiaradiohyderabad

Thursday, December 11, 2025

सुब्रह्मण्यम भारती जयंती-भारतीय भाषा दिवस





आज महान कवि सुब्रमण्यम भारती जी की जयंती है।  आज 'भारतीय भाषा दिवस'  भी है। सुब्रमण्यम भारती प्रसिद्ध हिंदी-तमिल कवि थे, जिन्हें महाकवि भरतियार के नाम से भी जाना जाता है आप एक कवि होने के साथ-साथ स्वाधीनता सेनानी, समाज सुधारक, पत्रकार एवं उत्तर व दक्षिण भारत के मध्य एकता सेतु के समान थे। सुब्रह्मण्यम भारती ने तमिलनाडु में हिंदी का परचम फहराया था। सुब्रमण्य भारती राष्ट्रवादी काल (1885-1920) के महान भारतीय लेखक, कवि, संगीतकार, पत्रकार, शिक्षक, भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और बहुभाषी थे। उनका जन्म 11 दिसंबर, 1882 को मद्रास प्रेसीडेंसी के 'एट्टायपुरम' में हुआ था।  उन्हें आधुनिक तमिल साहित्य शैली का जनक माना जाता है। वे मद्रास (चेन्नई) में तमिल दैनिक समाचार पत्र स्वदेशमित्रन से जुड़े। उन्होंने ‘वंदे मातरम’ का तमिल भाषा में अनुवाद किया, जो अत्यंत लोकप्रिय हुआ। उन्हें महाकवि भरतियार के नाम से भी जाना जाता है। भारती तमिल भाषा में सृजन करने वाले भारत के महान कवियों में से एक थे।  भारती की देश प्रेम की रचनाओं से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में लोग आजादी की लड़ाई में शामिल हुए थे। उनकी प्रसिद्ध रचना 

‘कहकर वंदे मातरम्, नमन करें इस देश को ॥1॥ 
मोद मनाया है यहीं जुन्हाई में हंसकर क्वाँरेपन का। कहकर वंदे मातरम्, नमन करें इस देश को॥ 2॥‘
महाकवि सुब्रमण्यम भारती की जयंती को ‘भारतीय भाषा दिवस' के रूप में मनाया जाता है। प्रति वर्ष भारतीय भाषा दिवस 11 दिसंबर को मनाया जाता है, जो तमिल कवि सुब्रमण्यम भारती की जयंती है, और इसका उद्देश्य भारत की भाषाई विविधता को बढ़ावा देना, भाषाई सद्भाव स्थापित करना और भारतीय भाषाओं के महत्व पर जोर देना है। भारत की सभी भाषाएं हमारी धरोहर हैं। हमारी भाषाओं में बहुत समानता है। कहा जा सकता है कि “भाषाएं अनेक किंतु भाव में एकात्मकता की प्रतीक है।”  भारतीय भाषाओं के स्थानीय प्रभाव स्वाभाविकता के  प्रतीक है। विविधता में एकता हमारी विशिष्टता है।  अपनी मातृभाषा एवं अपनी मातृभूमि की भाषाओं का सम्मान और उनका अधिकतम प्रयोग श्रेयस्कर है। हिंदी राष्ट्रीय एकता की कड़ी एवं सदियों से हमारी संबल है।आइए, हिंदी  एवं सामस्त भारतीय भाषाओं को और अधिक करीब लाएं। उनका सम्मान और प्रयोग बढ़ाएं। इस अवसर पर प्रसिद्ध पत्रिका “धर्मयुग" में  सितंबर, 1993 के अंक में डॉ मुकेश श्रीधर का आलेख ।
#साकेत_विचार 

Monday, December 8, 2025

गलवान युद्ध स्मारक

 गलवान युद्ध स्मारक 

07 दिसंबर 2025 एक ऐतिहासिक दिन है । जब रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह  द्वारा गलवान में युद्ध स्मारक परिसर का उद्घाटन किया गया ।  गलवान युद्ध स्मारक परिसर लद्दाख की गलवान घाटी में स्थित है। गलवान  स्मारक विश्व का सबसे ऊंचा युद्ध स्मारक है। गलवान विश्व की सबसे दुर्गम घाटियों में से एक है ।  यह स्मारक परिसर अमर शहीद कर्नल संतोष बाबू, महावीर चक्र (मरणोपरांत), कमान अधिकारी, बिहार रेजिमेंट  एवं उन बीस बहादुर सैनिकों के सम्मान में बनाया गया है, जिन्होंने वर्ष 2020 में गलवान घाटी में चीनी सेना के धोखे का करारा बदला लिया और देश के नाम लड़ते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया । यह स्मारक अतीत को आज से जोड़ता है। राष्ट्र की रक्षा के प्रति पुनीत उद्देश्य से और निष्ठा, समर्पण और त्याग को प्रेरणा में परिवर्तित करता है। 14500 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस स्मारक को तराशे हुए पत्थरों से बनाया गया है। यह स्मारक हमें यह सीख देता है कि तमाम चुनौतियों के बावजूद  भारतीय सेना मातृभूमि की रक्षा के लिए सर्वस्व न्योछावर करने हेतु हर पल समर्पित है ।  यह स्मारक अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए हमारे सैन्य वीरों के बहादुरी, साहस, समर्पण, प्रतिबद्धता, त्याग, बलिदान, और देश की प्रति निष्ठा का सर्वोच्च  प्रतीक है।

जय हिंद 👍 🫡🙏🇮🇳

✍️ डॉ साकेत सहाय 

एयर वेटरन 

भाषा-संचार अध्येता 

#Galawan

#साकेत_विचार


विश्व पुस्तक दिवस पर विचार

 विश्व पुस्तक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ! बधाई! साहित्य और लोक व्यवहार जीवन को जानने का सबसे बड़ा जरिया है । यह जीवन का कटु यथार्थ है कि हम ...