संस्कृत, संस्कार, समाज और राज
प्रस्तुत कथा मूलतः शक्ति, नेतृत्व, उकसावे और राजनीतिक बुद्धिमत्ता के बीच अंतर को रेखांकित करती है। इस कथा का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि हर चुनौती का उत्तर लड़कर देना आवश्यक नहीं होता। गधा शेर को बार-बार उकसाता है, लेकिन शेर यह समझता है कि उससे भिड़ना वास्तव में गधे को महत्व देना होगा। वह अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के बजाय अपने कर्तव्य पर केंद्रित रहता है।
आइए, पहले कथा का पठन करते हैं-
किसी जंगल में एक गधा रहता था। उसने बाकी जीवों से कहना आरंभ कर दिया कि, शेर एक अच्छा राजा नहीं है। उसमें कोई दम नहीं है। संकट काल में वह तुम्हारी मदद नहीं कर पाएगा। अतः तुम सब लोग मुझे अपना राजा मान लो। इसपर जंगल के सभी जीव हंसने लगे।
गधा अपने आप को बलशाली दिखाने के लिए सुरक्षित अंतर से शेर को गालियां बकने लगा। उस पर भिन्न-भिन्न प्रकार के आरोप लगाने लगा। गधा शेर को आह्वान करने लगा कि, अगर आप में साहस है, तो मुझसे लड़कर दिखाओ।
कुशल कामकाजी शेर ने गधे की तरफ बिल्कुल ध्यान ही नही दिया और निष्ठापूर्वक अपना काम करता रहा। थक-हारकर गधा वापस चला गया और फिर बाकी जीवों को बताने लगा कि, शेर तो बिल्कुल कमजोर है। मैंने उसे इतनी गालियां दीं, आह्वान किया, परंतु वह चुपचाप सुनता रहा।
बकरी, खरगोश जैसे कुछ जीव, जो गधे के उपकार को मानते थे, क्योंकि गधा उन्हें भोजन के लिए हरि घास के मैदानों का पता बताता था, वे गधे की हां में हां मिलाने लगे। गधे के जाने के बाद शेर के महामंत्री हाथी ने उससे पूछा :- महाराज! वो गधा आपको इतनी गालियां बकता रहा, आपको लड़ने के लिए आह्वान करता रहा, फिर भी आप चुप क्यों रहे ? आप चाहते, तो पंजे के मात्र एक वार से ही उसका काम समाप्त कर सकते थे। अथवा मुझे आदेश दे देते, तो मैं क्षण भर में उसकी चटनी बना देता। इससे जंगल आपकी धाक भी कायम रहती।
शेर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया :- गजराज! इसके तीन कारण हैं।
प्रथम कारण :- अगर मैं अथवा आप गधे से लड़ते, तो अन्य जीव यह कहते कि, हमारा राजा तो तानाशाह है। भला गधे जैसे निरीह जीव से भी कोई बुद्धिमान लड़ता है ?
द्वितीय कारण :- लड़ाई में गधा मर जाता, तो उसकी माँ, परिवार वाले और मूर्ख भक्तगण उसे शहीद बता कर बाकी जीवों की सहानुभूति अर्जित करके उन्हें हमारे विरुद्ध विद्रोह के लिए उकसाते।
तृतीय कारण :- गधे के परिवार को वास्तव लाभ मिलता देख कई अन्य जीव भी शहीद बनने की जुगाड में लग जाते।
मैं उस गधे के अथवा उसके सखाओं के कारण जंगल का राजा अर्थात वनराज नहीं हूं।
“नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।
विक्रमार्जितसत्त्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥”
अर्थात् सिंह का जंगल में कोई राज्याभिषेक नहीं होता; उसके पराक्रम और सामर्थ्य के कारण वह स्वयं ही पशुओं का राजा बन जाता है।
टिप्पणी :-
कथा के सामाजिक-राजनीतिक संकेत विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं:
* उकसावे में आकर प्रतिक्रिया देना हमेशा बुद्धिमानी नहीं है। कभी-कभी प्रतिद्वंद्वी की सबसे बड़ी ताकत उसकी अपनी शक्ति नहीं, बल्कि आपको प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर करना होती है। गधा कुछ जीवों की हाँ में हाँ पाकर स्वयं को राजा समझने लगता है, जबकि शेर का नेतृत्व उसके व्यवहार, क्षमता और जिम्मेदारी से स्थापित है। इसलिए कथा को किसी विशेष व्यक्ति, दल या वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति से जोड़ना आवश्यक नहीं है।
इसे व्यापक रूप से “शोर मचाने वाले और वास्तव में नेतृत्व करने वाले के अंतर” की कहानी के रूप में भी पढ़ा जा सकता है और शायद इसका सबसे व्यावहारिक निष्कर्ष यही है: जिसे अपनी क्षमता पर विश्वास होता है, वह हर भौंकने वाले को जवाब देना अपनी जिम्मेदारी नहीं समझता।
इस कथा का सामाजिक-राजनैतिक अर्थ लगाने के लिए आप पूर्णतः स्वतंत्र हैं।
-डा. साकेत सहाय