आज महान भारतीय क्रांतिकारी और राष्ट्रवादी अजीत सिंह संधू (23 फरवरी 1881 – 15 अगस्त 1947) जी की जयंती है । भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान सरदार अजीत सिंह का जन्म 23 फरवरी 1881 को पंजाब के जालंधर के खटकड़ कलां गांव में हुआ था। अजीत सिंह शहीद भगत सिंह के चाचा थे और उन्होंने भारत में ब्रिटिश शासन को चुनौती दी तथा औपनिवेशिक शासन की खुली आलोचना की और खुलकर विरोध भी किया। उन्हें राजनीतिक 'विद्रोही' घोषित कर दिया गया था। उनका अधिकांश जीवन जेल में बीता। 1906 ई. में लाला लाजपत राय जी के साथ ही साथ उन्हें भी देश निकाले का दण्ड दिया गया था। पंजाब उपनिवेशीकरण अधिनियम (संशोधन) 1906 के नाम से जाने जाने वाले किसान विरोधी कानूनों के खिलाफ आंदोलनों को संगठित करने में अपनी भूमिका के लिए जाने जाते हैं। इनके बारे में कभी बाल गंगाधर तिलक ने कहा था ये स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति बनने योग्य हैं उस समय उनकी उम्र केवल 25 साल थी। 1909 में सरदार अजीत सिंह अपना घर-बार छोड़ कर देश सेवा के लिए विदेश यात्रा पर निकल चुके थे, उस समय उनकी उम्र 28 वर्ष की थी। इरान के रास्ते तुर्की, जर्मनी, ब्राजील, स्विट्जरलैंड, इटली, जापान आदि देशों में रहकर उन्होंने क्रांति का बीज बोया और आजाद हिन्द फौज की स्थापना की। नेताजी को हिटलर और मुसोलिनी से मिलाया। मुसोलिनी तो उनके व्यक्तित्व के मुरीद थे। इन दिनों में उन्होंने 40 भाषाओं पर अधिकार प्राप्त कर ली थी। रोम रेडियो को तो उन्होंने नया नाम दे दिया था, 'आजाद हिन्द रेडियो' तथा इसके माध्यम से क्रांति का प्रचार प्रसार किया। मार्च 1947 में वे भारत वापस लौटे। भारत लौटने पर पत्नी ने पहचान के लिए कई सवाल पूछे, जिनका सही जवाब मिलने के बाद भी उनकी पत्नी को विश्वास नही। इतनी भाषाओं के ज्ञानी हो चुके थे सरदार, कि उन्हें पहचानना बहुत ही मुश्किल था।
भारत के विभाजन से वे इतने व्यथित थे कि 15 अगस्त 1947 के सुबह 4 बजे उन्होंने अपने पूरे परिवार को जगाया और ‘जय हिन्द’ कह कर इस संसार से विदा ले ली।
नमन! उनके त्याग को 🙏
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