हिन्दी की बात
#आजकल एक चलन बन गया है कि भारत के राजनीति भक्त हिंदी के थके विरोध के नाम पर हिंदी की बोलियों को आठवीं अनुसूची में लाने की मांग कर रहे है। करें अच्छी बात है। परंतु हिंदी का विरोध न करें। साथ ही यह भी शोध करें कि आठवीं अनुसूची में आने के नाम पर भाषाओं का कितना फायदा हुआ, भाषायी दुकानदारों का कितना हुआ।
उदाहरण के लिए उर्दू को हमने धर्म विशेष से बांध कर उर्दू का कितना अहित किया। तो भाषाओं को धर्मं, राजनीति या क्षेत्र के नाम पर न बांटे।
पिछले 1500 सालों से हिंदी भारत की सभी बोलियों, भाषाओं का समन्वय है। पहले प्राकृत, पाली, अपभ्रंश से चलकर हिंदी कई रूपों में इस देश की राष्ट्रभाषा बनी। हिंदी राजभाषा तभी बनी क्योंकि वो राष्ट्रभाषा उस समय भी थी। आज तो विश्व भाषा है। माॅरीशस या अन्य गिरमिटिया देशों की जनता ने भी विपरीत परिस्थितियों में भोजपुरी, मराठी, तेलुगु आदि के साथ हिंदी को स्थापित किया। इसी से इन छोटे देशों की विशिष्ट पहचान बनी। यहां के लोगों ने अपने संघर्षों के द्वारा अपनी पहचान स्थापित की। इसमें हिंदी महत्वपूर्ण थीं। हिंदी या देशी भाषाएँ हम सब को पहचान देती है। आइए सभी भाषाओं का सम्मान करें पर भाषाओं की राजनीति के नाम पर, अपने क्षुद्र स्वार्थ के नाम पर हिंदी का विरोध न करें। हिंदी की सशक्त नींव यानी उसकी आत्मीयता की शक्ति को कमजोर ना करें।
#साकेत_विचार
Comments