अज्ञेय

 



“स्नेह अनेकों चोटें सहता है, कुचला जाकर भी पुन: उठ खड़ा होता है; किंतु प्रेम में अभिमान बहुत अधिक होता है, वह एक बार तिरस्कृत होकर सदा के लिए विमुख हो जाता है। ‘’- अज्ञेय

आज हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की जयंती है। आप हिंदी साहित्य में नई कविता, प्रयोगवाद से जुड़े रहें।  आप एक प्रतिभासंपन्न कवि, शैलीकार, कथा-सहित्य को एक महत्वपूर्ण मोड़ देने वाले कथाकार, ललित-निबंधकार, संपादक और सफल अध्यापक के रूप में जाना जाता है।  वर्ष 1921 में अज्ञेय का परिवार ऊटी पहुंचा, ऊटी में अज्ञेय के पिता ने अज्ञेय का यज्ञोपवीत कराया और अज्ञेय का वात्स्यायन कुलनाम दिया।  आपकी शिक्षा-दीक्षा मद्रास और लाहौर में हुई।  आप भगत सिंह के साथी बने और वर्ष 1930 में गिरफ्तार हुए। आपने छह वर्ष कारावास और नजरबंदी भोगा।  आपने विशाल भारत, प्रतीक का संपादन किया।  प्रतीक ने साहित्यिक पत्रकारिता का नया इतिहास रचा। आप साप्ताहिक दिनमान और नवभारत टाइम्स के संपादन से भी जुड़े। आपको ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हुए। आपकी प्रसिद्ध कविता ‘मुझे तीन शब्द दो’

मुझे तीन दो शब्द कि मैं कविता कह पाऊँ।

एक शब्द वह जो न कभी जिह्वा पर लाऊँ,

और दूसरा : जिसे कह सकूँ

किंतु दर्द मेरे से जो ओछा पड़ता हो।

और तीसरा : खरा धातु, पर जिसको पाकर पूछूँ

क्या न बिना इसके भी काम चलेगा? 

और मौन रह जाऊँ।

मुझे तीन शब्द दो कि मैं कविता कह पाऊँ।

स्रोत :पुस्तक : सन्नाटे का छंद (पृष्ठ 70) संपादक : अशोक वाजपेयी रचनाकार : अज्ञेय  प्रकाशन : वाग्देवी प्रकाशन  संस्करण  : 1997

विनम्र श्रद्धार्पण !

-डॉ साकेत सहाय 

#अज्ञेय 

#साकेत_विचार

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