4 अक्‍टूबर 1977 को पहली बार यूनाइटेड नेशंस में हिंदी गूंजी थी जब उस समय बतौर विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेई यूएन में मौजूद थे। वाजपेई से पहले और उनके बाद किसी ने भी हिंदी में इतने बड़े अंतराष्‍ट्रीय मंच पर भाषण नहीं दिया था।

इसके बाद जब अटल बिहारी वाजपेई वर्ष 2000 में बतौर प्रधानमंत्री यूनाइटेड नेशंस के सहस्‍त्राब्‍दी वर्ष समारोह में शामिल होने के लिए गए तो फिर उन्‍होंने हिंदी में भाषण दिया।

वाजपेयी के संबोधन के बाद पूरे देश में एक उम्मीद बंधी कि हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा का दर्जा मिलने की मंजिल अब दूर नहीं है।

हालांकि वर्ष 1977 की उस अहम घटना के बाद एक लंबा वक्त बीत गया और वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वह सपना अधूरा ही है।

हां, अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हिन्दी को जिस तरह से विदेशों में भी सम्मान दिलवा रहे हैं,उससे एक उम्मीद जरूर बंधी है। वे विदेशी राष्ट्राध्यक्षों से भी हिन्दी में ही वार्तालाप कर रहे हैं।

तो क्या माना जाए कि उनके संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी में संबोधन के बाद वहां हिन्दी को आधिकारिक भाषा का दर्जा मिलने का रास्ता साफ होगा ?

अगर बात अटल जीके संबोधन से हो कहने वाले कहते हैं कि उनके कद के ओजस्वी वक्ता के लिहाज से वह उनका कोई बेहतर भाषण तो नहीं था।


हिंदी को किया जाता है अनुवादित


संयुक्त राष्ट्र में चीनी, अंग्रेजी, अरबी, फ्रेंच, रूसी और स्पेनी को ही मान्यता मिली हुई। 1945 में संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाएँ केवल चार थीं। अँग्रेज़ी, रूसी, फ्रेंच और चाइनीज। उनमें 1973 में दो भाषाएं और जुड़ीं। हिस्पानी

और अरबी बाकी भाषाएं बाद में जुड़ीं। इन भाषाओं में वहां पर दिए जाने वालों भाषणों का अनुवाद होता है। बैंकर डा. जयंती प्रसाद नौटियाल एक सतत हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं हिन्दी को सुरक्षाराष्ट्र की भाषा बनाने को लेकर।

वह कहते हैं कि फिजी,सूरीनाम,मारीशस,नेपाल,त्रिनिडाड,ग्याना में भी हिन्दी को भावनात्मक रूप से स्थान मिला हुआ है।

हिन्दी को बोलने वाले चीनी भाषा के बाद सबसे ज्यादा हैं,इसके बावजूद हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र जैसे मंच में जगह न मिलना साफ करता है कि हमारा अपनी मातृभाषा को लेकर सम्मान का भाव नहीं है।

हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने को लेकर जोहानिसबर्ग में हुए विश्व हिंदी सम्मेलन में फिर से यह प्रस्ताव पारित हुआ। इससे पहले भी विश्व हिन्दी सम्मेलन में हिन्दी के पक्ष में इस तरह के प्रस्ताव पारित होते रहे हैं।

पहले विश्व हिन्दी सम्मेलन हुआ था जिसमें हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने का प्रस्ताव पारित किया गया था।

उसके बाद तीन अन्य सम्मेलनों में भी ऐसे प्रस्ताव पारित हुए, लेकिन बात कोई खास आगे नहीं बढ़ पाई।

कई सम्‍मेलनों में हुआ यूएन में हिंदी का जिक्र

पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन 1975 में नागपुर में हुआ था, जिसमें पारित प्रस्ताव में कहा गया, ‘‘संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को आधिकारिक भाषा के रूप स्थान दिलाया जाए।''

इसके बाद 1976 में मारिशस, 1999 में लंदन और 2003 में सूरीनाम में हुए सम्मेलनों में भी इस आशय के प्रस्ताव को दोहराया गया।

बहरहाल,‘जिस भाषा की अपने देश में ही दुर्गति होती रही, वह संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा कैसे बन जाएगी। और तो और,हिन्दी पट्टी के एलिट ने भी हिन्दी बोलने में हेय भाव दिखाया।

जब तक अपने देश और अपने ही लोगों के बीच इसे सम्मान और प्राथमिकता नहीं दी जाती, दूसरे इसे बढ़ावा क्यों देंगे।

विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने दावा किया कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के प्रयास में कमी नहीं की जा रही है लेकिन यह एक लंबी प्रक्रिया है।

उन्होंने कहा कि आठवां विश्व हिन्दी सम्मेलन न्यूयार्क स्थित संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय में ही आयोजित करके इस मुहिम को विश्व संस्था की दहलीज़ तक ले जाने का प्रयास ही किया गया था।

मोदी पर बड़ी जिम्‍मेदारी

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून भी उस सम्मेलन में आए थे और हिन्दी में कहा था, ‘‘नमस्ते, मैं हिन्दी थोड़ी बहुत बोलता हूं। मुझे खुशी हो रही है समय देते हुए। मैं आप सबकोशुभकामनाएं देता हूं।''

बहरहाल, अरबी को 1986 में इस तर्क पर आधिकारिक भाषा की मान्यता दी गई कि इसे 22 देशों में लगभग 20 करोड़ लोग बोलते हैं। संख्या को अगर आधार मानें तो भारत में 100 करोड़ से अधिक लोगजिम्‍मेदारी हिन्दी संवाद करते हैं। यह उनकी भाषा है।

हिन्दी को उन भाषाओं में जगह नहीं मिल रही है, जिनका संयुक्त राष्ट्र में खास स्थान है।अटल बिहारी वाजपेयी के बाद मोदी का संयुक्त राष्ट्र को संबोधित करना अहम है।

अब सारा दारोमदार नरेन्द्र मोदी पर है कि वे हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलवाएं।


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