Wednesday, February 12, 2025

स्वामी दयानंद सरस्वती

 

आज 12 फरवरी है। स्वामी दयानंद सरस्वती जयंती है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने सनातन सभ्यता के महान ग्रंथ ‘वेदों की ओर लौटो’ का आह्वान किया। आधुनिक भारत के महान् चिंतक, धर्मवेत्ता, समाज सुधारक, “आर्य समाज" के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी, 1824 को काठियावाड़ (गुजरात)  के टंकारा गांव में हुआ था। उनके बचपन का नाम मूलशंकर था। वे संन्यासी थे और संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे । आप 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में सनातन पंथ के पुनरुद्धार आंदोलन के सबसे बड़े प्रणेता माने जाते हैं। ब्रिटिश सरकार द्वारा 1813 में चार्टर एक्ट लाए जाने के बाद ईसाई पादरियों ने पर्याप्त संख्या में भारत आना आरंभ कर दिया था। इन ईसाई धर्म प्रचारकों ने षडयंत्रपूर्वक सामाजिक कुरीतियों को हिंदू धर्म में सम्मिलित कर कठोर आघात पहुँचाएं ।  19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में कई सामाजिक व धार्मिक आंदोलन हुए। स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने गुरु मथुरा के स्वामी विरजानंद से वेदों का ज्ञान प्राप्त करके हिंदू धर्म सभ्यता और भाषा के प्रचार का कार्य आरंभ किया। आपने सत्यार्थ प्रकाश की रचना हिंदी में करके राष्ट्रभाषा को गौरव दिलाया। 1875 में आपने आर्य समाज की स्थापना की। आर्य समाज ने हिंदू धर्म और समाज सुधार हेतु कई महत्वपूर्ण कार्य किए। 

-डॉ साकेत सहाय

भाषा एवं संचार विशेषज्ञ

#दयानंद

#साकेत_विचार

#हिन्दी

Thursday, January 30, 2025

स्वाधीनता आंदोलन के भूले-बिसरे नायक -बत्तख़ मियाँ


 स्वाधीनता आंदोलन के भूले-बिसरे नायक -बत्तख़ मियाँ  

गाँधी जी के पुण्यतिथि पर विशेष-

हम सभी ने चंपारण सत्याग्रह के बारे में ज़रूर सुना होगा ।  चंपारण सत्याग्रह के दौरान कर्तव्यनिष्ठ रसोइए बत्तख़ मियां के भूमिका की चर्चा बहुत कम लोगों ने सुनी होगी, जिन्होंने चंपारण सत्याग्रह के दौरान न केवल महात्मा गांधी की जान बचाई, बल्कि इसके लिए उन्होंने भारी कीमत भी चुकाई। उनका नाम भले ही इतिहास की किताबों में उस हद तक दर्ज न हो, लेकिन उनका अदम्य साहस अपने-आप में एक विशिष्ट अध्याय का हकदार है।

वर्ष 1917 में, गांधीजी ब्रिटिश बागान मालिकों द्वारा उत्पीड़ित नील किसानों की दुर्दशा व उत्पीड़न को देखने एवं राजकुमार शुक्ल के निमंत्रण पर गांधीजी सत्याग्रह के लिए बिहार पधारें थे। गांधीजी के आगमन को एक अंग्रेज बागान मैनेजर इरविन ने खतरे के रूप में देखा और उसने एक भयावह साजिश रची। उसने गांधीजी के रसोइए बत्तख़ मियाँ  को उनके दूध में जहर मिलाने का निर्देश दिया। बत्तख़ मियाँ   ने इस जघन्य आदेश को अस्वीकार कर दिया और बत्तख़ मियाँ  ने सत्ता के प्रति आज्ञाकारिता के बदले देश व समाज के प्रति निष्ठा को चुना। 

देश के प्रति उनकी अगाध निष्ठा की उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी। उनके विरोध से क्रोधित इरविन ने उनके व परिजनों के विरुद्ध क्रूरता की तमाम मिसालें लाँघी।

महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर, आइए हम बिहारी बत्तख़ मियाँ    के बलिदान को भी याद करें, जिन्होंने चंपारण सत्याग्रह के दौरान गाँधीजी के जान की रक्षा के लिए त्याग की मिसाल क़ायम की । 

#बत्तख़ मियाँ  

#गुमनाम_नायक #गांधी #सत्याग्रह #भूले_बिसरे_नायक #बिहार #चंपारण #महात्मागांधी #पुण्यतिथि #भारत

#साकेत_विचार


Wednesday, January 29, 2025

प्रयागराज कुंभ हादसा-एक अनहोनी थी, जो घट गई।

 प्रयागराज कुंभ हादसा-एक अनहोनी थी, जो घट गई।


प्रयागराज में जो हुआ दुखद है, अत्यंत दुखद। प्रयागराज कुंभ में भगदड़ मचने की वजह से असमय ही कुछ लोग काल-कवलित हो गए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है।  लेकिन महाकुंभ जैसे अपार जनभागीदारी वाले आयोजन को जिस सुव्यवस्थित तरीके से अब तक आयोजित किया गया, उसे किसी अनहोनी से कमतर नहीं करार दिया जा सकता। अगलगी और फिर भगदड़ के मामले को जिस तीव्रता से नियंत्रित कर स्थिति को सामान्य बनाया गया, यह भी तो गौरतलब है। 

मैं जहाँ पदस्थापित हूँ उस सुदूर दक्षिण से कई मेरे परिचित सपरिवार महाकुंभ गए, ट्रेन से गए, वहां ठहरे और स्नान संपन्न कर लौट आए। वे सभी उत्साह से परिपूर्ण थे। उन्होंने कहा,  करोड़ों लोगों की आवाजाही के बावजूद कुम्भ नगरी की सफाई व व्यवस्था चकित करती थी। उनके लिए सबसे उल्लेखनीय प्रशासन व पुलिस का सहयोग था, जो किसी भी छोटे-बड़े सहयोग के लिए तत्पर दिखते थे।

इतने बड़े आयोजन में, दुनिया भर में अनेकों ऐसे उदाहरण है जहाँ अनियंत्रित या अज्ञात भय से अव्यवस्था मची, यहाँ भी भगदड़ मचने की वजह से कुछ लोगों की मौत हुई, जिसे प्रशासनिक चूक या अनहोनी दोनों के अंतर्गत रखा जा सकता है जो जांच का विषय है।  परंतु मेरा निवेदन है महाकुंभ में घटित आपदा में राजनीतिक या सामाजिक अवसर न खोजे जाए।  यदि कुंभ में खामियां ही खामियां हैं तो अब तक उनके अनुसार लाख असुविधा के बावजूद श्रद्धा और पुण्य की त्रिवेणी में करोडों श्रद्धालुओं ने कैसे डुबकी लगाई? श्रद्धालु कभी शिकायत नहीं करते। शिकायत सदैव पर्यटकों को होती है। परेशानी तो घर से निकलते ही होती है, परंतु वैसी परेशानियों को यदि हम लेकर चले तो जीना मुश्किल हो जाएगा।

प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार संगम में जिस ओर जाने की मनाही थी, उसी ओर भीड़ बढ़ी, हालांकि बैरिकेडिंग पर्याप्त था।  फिर भी जिस तरफ स्नानार्थी सोये हुए थे, उसी दिशा में बैरिकेडिंग टूटने की वजह से भीड़ भरभराती हुई सोये हुए स्नानार्थियों पर गिर पड़ी और उन्हें कुचलते हुए आगे बढ़ गई।  यह कहा जा सकता है कि इस प्रकार की परिस्थितियों को पर्याप्त जागरुकता व सतर्कता से ही बचाया जा सकता है। इसी के साथ यह भी कहा जा सकता है कि मीडिया को भी सकारात्मक या नकारात्मक दोनों ही स्थितियों में अतिवादी रिपोर्टिंग से बचना चाहिए।  सायरन बजा कर रात 1 बजे जिन चैनलों ने खबर को ब्रेक किया यह दिखाता है भारत का मीडिया कितना गैर-जिम्मेदाराना है।

प्रशासन की तत्परता एवं व्यवस्था के साथ ही श्रद्धालुओं के संयम व अनुशासन की भी प्रशंसा की जानी चाहिए।  कल तक न किसी के कुंभ में जाने से कोई समस्या थी न ही कोई स्थिति अनियंत्रित थी।  लोग 12 किमी के फैले क्षेत्र में उत्साहपूर्वक स्नान करते रहे, कोई समस्या उत्पन्न नहीं हुई।  लेकिन ईश्वर ने जो लिख दिया है उसे तो होना ही है। यह हादसा और भी बड़ा हो सकता था जिसे प्रशासनिक सतर्कता से नियंत्रित कर लिया गया है।  

इतने बड़े आयोजन में हमें किसी भी प्रकार के दुष्प्रचार का हिस्सा बनने से भी बचना चाहिए।  क्योंकि इस विशाल आयोजन में इस प्रकार की घटनाएं होने की संभावनायें हमेशा से बनी रहती है। यह भी कहा जा सकता है कि बचाव दल त्वरित गति से सक्रिय हुआ और उपलब्ध हुआ। अंत में प्रार्थना है जो असमय काल-कवलित हो गए उनकी आत्मा को शांति और परिजनों को इसे सहन करने की शक्ति दें।भगवान भोलेनाथ सब पर कृपा करें, सबकी रक्षा करें।

डा. साकेत सहाय

भाषा-संचार विशेषज्ञ

#कुंभ #भगदड़

Thursday, December 19, 2024

भारतीय मानक ब्यूरो (बी आई एस) में व्याख्यान








आज़ भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस), हैदराबाद में भाषा मंथन परिचर्चा के तहत विशिष्ट अतिथि के रूप में मुझे जाने का सुअवसर मिला। इस अवसर पर मैंने अपने संबोधन में कहा कि भाषाएँ केवल रोज़गार की वाहक नहीं होती बल्कि संस्कार एवं संस्कृति की प्रधानत: वाहक होती  है । साथ ही, व्यवहार, संपर्क और राष्ट्रीयता की भी । हिंदी भारत की संपर्क, जुड़ाव और लगाव की भी आग्रही भाषा है। हाल के दशक में विशेष रूप से उदारीकरण के बाद भाषाओं को समाज, आडंबर और राजनीति ने गहरे तौर पर प्रभावित किया है ।  साथ ही हमारी भाषा और संस्कृति पर भी इसने गहरा असर डाला है। हम ग्लोबल बनने के चक्कर  में अपने गाँव, घर, समाज से दूर होते जा रहे हैं।हम चरम नकलची लोग अपने अक़्ल को किसी और के सिरहाने छोड़ आए हैं । इससे हर कोने में अपसंसकृति व्याप्त है । हमारी भाषा और संस्कृति को इस प्रभाव ने मैली और प्रदूषित किया है। जब हमारी भाषाएँ प्रदूषित होंगी तो संस्कृति भी प्रदूषित होंगी ही । अत: हमें अपनी भाषाओं के प्रयोग और व्यवहार को बढ़ाना ही होगा और यह वृहत्तर भारतीय समाज की भी महती जिम्मेदारी है । 

सादर,

डा. साकेत सहाय 

भाषा, संचार विशेषज्ञ 

#साकेत_विचार 

Monday, December 9, 2024

रघुवीर सहाय साहित्यकार



 आज आधुनिक हिंदी कविता के प्रमुख कवि, लेखक, पत्रकार, संपादक, अनुवादक रघुवीर सहाय (1929-1990) की जयंती है।  आपको साहित्य अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त है।  आप पत्रकारिता और कहानियों के लिए प्रसिद्ध रहे। चर्चित पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादक रहे। 


इस अवसर पर ‘दूरदर्शन’ शीर्षक से उनकी एक प्रसिद्ध कविता -


दूरदर्शन 

-रघुवीर सहाय


मैं संपन्न आदमी हूँ 

है मेरे घर में टेलीविजन

दिल्ली और बंबई दोनों के बतलाता है फ़ैशन


कभी-कभी वह 

लोकनर्तकों की तस्वीर दिखाता है

पर यह नहीं बताता है उनसे मेरा क्या नाता है


हर इतवार दिखाता है 

वह बंबइया पैसे का खेल

गुंडागर्दी औ' नामर्दी का 

जिसमें होता है मेल


कभी-कभी वह दिखला देता है 

भूखा नंगा इंसान

उसके ऊपर बजा दिया करता है 

सारंगी की तान


कल जब घर को लौट रहा था 

देखा उलट गई है बस

सोचा मेरा बच्चा 

इसमें आता रहा न हो वापस


टेलीविजन ने ख़बर सुनाई 

पैंतीस घायल एक मरा

ख़ाली बस दिखला दी ख़ाली 

दिखा नहीं कोई चेहरा


वह चेहरा जो जिया या मरा 

व्याकुल जिसके लिए हिया

उसके लिए समाचारों के बाद

समय ही नहीं दिया।


तब से मैंने समझ लिया है 

आकाशवाणी में बनठन

बैठे हैं जो ख़बरोंवाले 

वे सब हैं जन के दुश्मन


उनको शक था दिखला देते 

अगर कहीं छत्तिस इंसान

साधारण जन अपने-अपने 

लड़के को लेता पहचान


ऐसी दुर्भावना लिए है 

जन के प्रति जो टेलीविजन

नाम दूरदर्शन है 

उसका काम 

किंतु है दुर्दशन


स्रोत :पुस्तक : रघुवीर सहाय संचयिता (पृष्ठ 182) संपादक : कृष्ण कुमार  रचनाकार : रघुवीर सहाय प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन  संस्करण  : 2003


विनम्र श्रद्धार्पण !

#रघुवीर_सहाय 

#साकेत_विचार

Wednesday, October 2, 2024

केंद्रीय हिंदी संस्थान में मुख्य अतिथि






























दिनांक ३०.०९.२०२४ को केंद्रीय हिंदी संस्थान, हैदराबाद केंद्र द्वारा आयोजित 475वें नवीकरण पाठ्यक्रम के समापन समारोह एवं 476वें नवीकरण पाठ्यक्रम के उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में मुझे सहभागी होने का अवसर प्राप्त हुआ।  कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। समारोह की अध्यक्षता केंद्रीय हिंदी संस्थान, हैदराबाद के क्षेत्रीय निदेशक प्रो. गंगाधर वानोडे ने की तथा मुख्य अतिथि के रूप में पंजाब नेशनल बैंक के मुख्य प्रबंधक (राजभाषा) डॉ. साकेत सहाय एवं सम्मानित अतिथि के रूप में डॉ. योगेन्द्रनाथ मिश्र उपस्थित थे। साथ ही पाठ्यक्रम प्रभारी डॉ. फत्ताराम नायक व कार्यालय अधीक्षक डॉ. एस. राधा भी मंच पर उपस्थित थे। इस पाठ्यक्रम में कुल 20 (महिला-11, पुरुष-09) प्रतिभागी अध्यापकों ने निमित्त उपस्थित रहकर पाठ्यक्रम पूर्ण किया।

मुख्य अतिथि के रूप में अपने उद्बोधन में मैंने कहा कि आप सभी कि हिंदीतर प्रदेशों के अध्यापक हैं अत: आपकी भूमिका एक शिक्षक के साथ-साथ राष्ट्रीय संवाद के वाहक के रूप में भी है। आप सभी अपने विद्यालयों में विद्यार्थियों के लिए ज्ञान के प्रवाहक के साथ संवाद शिक्षक भी है। आपकी भूमिका दोहरी है। आपकी मातृभाषा हिंदी नहीं है फिर भी आप सभी हिंदी की समृद्धि के लिए कार्य कर रहे हैं, राष्ट्र की प्रगति का यह बड़ा सूत्र है।मुझे आशा ही नहीं वरन् पूर्ण विश्वास है कि इस नवीकरण पाठ्यक्रम के माध्यम से आप सभी के हिंदी के ज्ञान में अवश्य वृद्धि होगी। मैं संस्थान को इस हेतु बधाई देता हूँ। मुझे गर्व है कि मैं केंद्रीय हिंदी संस्थान का विद्यार्थी रहा हूँ और आज इस संस्थान में मुख्य अतिथि के रूप में आकर मुझे गर्व की अनुभूति हो रही है। मैंने इस अवसर पर संस्थान के संस्थापक  पद्मभूषण तेलुगू भाषी डॉ. मोटूरी सत्यनारायण को भी उनके योगदान के लिए स्मरण किया। हम सभी शपथ लें कि उनकी मुहिम को आगे बढ़ाने में अपनी सार्थक भूमिका निभाएँगे। इस अवसर पर 475वें नवीकरण पाठ्यक्रम के प्रतिभागियों द्वारा हस्तलिखित पत्रिका ‘स्वर्ण आंध्र प्रदेश’ का विमोचन भी किया गया। साथ ही, इस अवसर पर नवीकरण पाठ्यक्रम के दौरान लिए गए पर परीक्षण का परिणाम भी घोषित किया गया। इस अवसर पर स्थानीय विद्यालयों के बच्चों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किया गया। इस बेहतरीन आयोजन व मुझे आमंत्रित करने के लिए संस्थान के क्षेत्रीय निदेशक डॉ गंगाधर वानाडे जी का विशेष आभार। उनके व संस्थान के समस्त साथियों के आत्मीयपूर्ण  व्यवहार के लिए मेरी ओर से विशेष धन्यवाद। इस अवसर पर मैंने वानाडे जी को प्रयोज़नमूलक हिंदी को समर्पित तथा दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी, संस्कृति मंत्रालय से साहित्य श्री कृति से सम्मानित कृति ‘इलेक्ट्रॉनिक मीडिया : भाषिक संस्कार एवं संस्कृति’ तथा वित्त, बैंकिंग व भाषा : विविध आयाम, जिसकी पांडुलिपि मंत्रिमंडल सचिवालय, बिहार सरकार से चयनित व अनुदानित की गयी थी आदि पुस्तकें उन्हें भेंट की। साथ ही उन्होंने मुझे दक्षिण में हिंदी व स्थानीय भाषाओं के विकास व समन्वय को समर्पित संस्थान की पत्रिका “समन्वय” भेंट की। 

#साकेत_विचार

-डॉ साकेत सहाय

लाल बहादुर शास्त्री - कर्त्तव्यनिष्ठ और सत्यनिष्ठ व्यक्तित्व के स्वामी




 




आज महान देशभक्त, भारतरत्न, भूतपूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की १२२ वीं जयंती है।  भारत-पाक युद्ध में जय जवान! जय किसान! का उद्घोष करने वाले शास्त्रीजी की जयंती पर उनके व्यक्तित्व व कृतित्व को शत शत नमन! 
आज बहुत कम लोगों को यह ज्ञात होगा कि वे पंजाब नैशनल बैंक के निष्ठावान ग्राहक भी रहे। इस पुण्य अवसर पर शास्त्री जी से जुड़ा यह संस्मरण हम सभी के लिए प्रेरक कथा की भांति है। 

तथ्य यह है कि अपनी सादगी भरी जीवनशैली के लिए प्रसिद्ध शास्त्री जी की पत्नी ललिता शास्त्री जी ने लाल बहादुर शास्त्री जी के ताशकंद में हुए असामयिक निधन के बाद पीएनबी से लिए गए कार लोन की बची हुई ₹5,000 की राशि को सरकार से ऋण माफ़ी की मिली पेशकश को मना कर अपनी बची हुई पेंशन राशि से चुकाई थी। यह उनके कर्तव्यनिष्ठा का शानदार उदाहरण है। शास्त्री जी के कार ख़रीदने से जुड़े वाक़ये को सुनकर हम सभी बहुत कुछ सीख सकते हैं।  यह घटना वर्ष 1964 की है। चूँकि प्रधानमंत्री बनने के बाद भी शास्त्री जी के पास अपना घर तो क्या एक कार तक नहीं थी। 

लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को वाराणसी के पास मुगलसराय में हुआ था। उनके बचपन का नाम लाल बहादुर श्रीवास्तव था।  बाद में संस्कृत में स्नातक की योग्यता के बाद वे ‘शास्त्री’ कहलाए। लाल बहादुर शास्त्री के पिता शरद प्रसाद श्रीवास्तव एक शिक्षक थे। जब वे मात्र डेढ़ साल के थे तो उनके पिता का निधन हो गया था। उनकी मां, रामदुलारी देवी, जो अभी बीस वर्ष की थीं, अपने तीन बच्चों के साथ अपने पिता के घर चली गईं। जहां उनका लालन- पालन अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में हुआ और वे ‘गुदड़ी के लाल’ कहलाए। 

शास्त्री जी अपनी ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा के बल पर देश के सर्वोच्च पद पर पहुँचे। प्रधानमंत्री बनने के बाद एक बार उनके बच्चों ने उलाहना दिया कि अब आप भारत के प्रधानमंत्री हैं, अब हमारे पास अपनी कार होनी चाहिए। शास्त्री जी के पास अपनी कोई कार नही थी और उनके बच्चे कभी-कभी स्कूल जाने के लिए शास्त्री जी के पीएमओ की कार का भी इस्तेमाल करते थे। परंतु लाल बहादुर शास्त्री जी किसी भी तरह के निजी कार्य के लिए इसके नियमित प्रयोग की अनुमति नहीं देते थे और घर में बच्चों को एक कार की ज़रूरत थी। उस ज़माने में एक फ़िएट कार का मूल्य ₹12,000 होता था। तब शास्त्री जी ने अपने एक सचिव से कहा कि ज़रा देखें कि उनके बैंक खाते में कितने रुपये हैं? तब उनका बैंक बैलेंस था ₹7,000 । जब बच्चों को पता चला कि शास्त्री जी के पास कार ख़रीदने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं तो उन्होंने कहा कि कार मत ख़रीदिए। 

लेकिन शास्त्री जी ने कहा कि वो बाक़ी के पैसे बैंक से लोन लेकर जुटाएंगे। परिवार के पसंद की ख़ातिर शेष बची राशि के लिए शास्त्री जी ने भारत के स्वदेशी बैंक पंजाब नैशनल बैंक में ₹5,000 के ऋण हेतु आवेदन किया, जिसकी मंजूरी उसी दिन उन्हें मिल गई। 

दुर्भाग्य से एक साल बाद ही लोन चुकाने से पहले ही उनका निधन हो गया। उनके बाद प्रधानमंत्री बनीं श्रीमती इंदिरा गाँधी ने सरकार की तरफ़ से उनके ऋण को माफ़ करने की पेशकश की लेकिन उनकी पत्नी ललिता शास्त्री ने इसे स्वीकार नहीं किया । बैंक की इस बची हुई ॠण राशि को लाल बहादुर शास्त्री जी के असामयिक निधन के बाद उनकी धर्मपत्नी ललिता शास्त्री जी ने अपनी पेंशन से कार की सारी किस्तें चार साल में चुका दी। 

शास्त्री जी और उनका परिवार जहाँ-जहाँ भी गया, वह कार उनके साथ गया।  वर्तमान में यह कार दिल्ली में लाल बहादुर शास्त्री की स्मृति में स्थापित संग्रहालय में रखी हुई है और दूर- दूर से लोग इसे देखने आते हैं। 

उनके कार से जुड़ा एक और संस्मरण है जब वर्ष 1964 में लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने तो उनके बेटे अनिल शास्त्री दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल में पढ़ रहे थे।  उस ज़माने में अभिभावक-शिक्षक(पैरेंट्स-टीचर) बैठक (मीटिंग) नहीं हुआ करती थी। हाँ अभिभावकों को छात्र का  परिणाम पत्र (रिपोर्ट कार्ड)  लेने के लिए ज़रूर बुलाया जाता था। शास्त्री जी ने भी तय किया कि वो अपने बेटे का रिपोर्ट कार्ड लेने उनके स्कूल जाएंगे। स्कूल पहुंचने पर वो स्कूल के गेट पर ही उतर गए। हालांकि सुरक्षा गार्ड ने कहा कि वो कार को स्कूल के परिसर में ले आएं, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। 

उनके प्रेरक व्यक्तित्व से जुड़ा एक प्रसंग -


 प्रेरक प्रसंग 



स्टेशन की आखिरी ट्रेन प्लेटफार्म से रवाना हो चुकी थी । एक वृद्ध महिला ट्रेन के इंतजार में बैठी हुई हैं। अगली ट्रेन कल सुबह आएगी... एक कुली ने यह देखा और मां से पूछा - माताजी, आप कहां जा रही हैं? मैं दिल्ली अपने बेटे के पास जाऊंगी । आज कोई ट्रेन नहीं है माताजी । महिला असहाय दिख रही थी। कुली ने दयालुता दिखाते हुए महिला को प्रतीक्षालय में आश्रय देने की पेशकश की। वह सहमत हो गई। कुली ने उनसे उसके बेटे के बारे में पूछा.. मां ने जवाब दिया कि उसका बेटा रेलवे में काम करता है। नाम बताओ। देखें संपर्क हो सकता है या नहीं... वृद्ध महिला ने कुली से कहा - वह मेरा लाल है, सब उसे लाल बहादुर शास्त्री कहते हैं! (वृद्ध महिला ने कहा) भारत माँ का  महान सपूत तब भारत का रेल मंत्री था। एक पल में, पूरे स्टेशन में हलचल मच गई। जल्द ही, सैलून कार आ गई। वृद्ध महिला हैरान थी। लाल बहादुर शास्त्री को कुछ भी पता नहीं था ।  ऐसे भी लोग होते थे , समाज में अब भी ऐसे लोग हैं बस उन्हें प्रोत्साहन और हौसले की जरूरत है । 🙏

शास्त्री जी से जुड़े ये संस्मरण उनके प्रेरक व्यक्तित्व होने के अनुकरणीय उदाहरण हैं। 

सादर नमन🙏🌺

डॉ साकेत सहाय

राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित लेखक

#शास्त्री #लाल_बहादुर 

#साकेत_विचार


एआई कैमरे का गजब कारनामा....!

 एआई कैमरे का गजब! पीठ पर टंगे गिटार को समझा ‘सवारी’, बिना हेलमेट बताकर काट दिया ₹500 रुपए का चालान!  आईटी नगरी बेंगलूरु की यह घटना केवल यंत...