Sunday, July 26, 2026

परीक्षा सुधार समिति

 परीक्षा विवाद के बीच सरकार द्वारा श्री नंदन नीलेकणी को दी गई बड़ी जिम्मेदारी! 



नीट परीक्षा व्यवस्था पर उठे सवालों के बीच केंद्र सरकार ने आज एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है । 

भारत की परीक्षा व्यवस्था में उचित सुधार के लिए सरकार ने देश के जाने-माने तकनीकी विशेषज्ञ, श्री नंदन नीलेकणी को नयी जिम्मेदारी सौंपी है, जिन्होंने देश के डिजिटल ढाँचे  को बदलने में क्रांतिकारी भूमिका निभाई है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने २६ जुलाई को यह घोषणा की कि श्री नंदन नीलेकणी के नेतृत्व में एक उच्चाधिकार प्राप्त कार्य समिति (हाई-पावर्ड टास्क फोर्स परीक्षा) परीक्षा सुधारों पर काम करेगी।  प्रधानमंत्री का लक्ष्य स्पष्ट है—

परीक्षा व्यवस्था ज्यादा भरोसेमंद हो, पारदर्शी हो और तकनीक का अधिकतम इस्तेमाल हो। यानी सवाल सिर्फ पेपर लीक रोकने का नहीं है। अब सवाल यह है कि क्या परीक्षा की पूरी प्रक्रिया को ही ऐसा बनाया जा सकता है कि गड़बड़ी की गुंजाइश न्यूनतम हो? जो कि तकनीक और नीति के उचित इस्तेमाल से आसान हो सकता है ।  घोषणा करते हुए श्री मोदी ने यह भी कहा कि विद्यार्थियों के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ कार्रवाई हो रही है, फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाए गए हैं और सख्त कानूनी प्रावधानों की दिशा में भी कदम उठाए जा रहे हैं और अब नजर नंदन नीलेकणी की टास्क फोर्स पर है।

सरकार के इस निर्णय से यह विश्वास जताया जा सकता है कि जिस व्यक्ति ने ‘आधार’ जैसे बड़े डिजिटल पहचान कार्यक्रम का नेतृत्व किया और इंफ़ोसिस के सह-संस्थापक के तौर पर तकनीक की दुनिया में अलग पहचान बनाई, उसकी विशेषज्ञता भारत की परीक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकती है। श्री नीलेकणी की भूमिका के बारे में कहा जा सकता है - कागज से डिजिटल तक…, पहचान से भुगतान तक…, और अब परीक्षा व्यवस्था तक। 


नंदन नीलेकणी के व्यापक अनुभव को देखते हुए यह कहा जा सकता है उनकी टेक्नोलॉजी वाली सोच भारत के करोड़ों छात्रों की परीक्षा-तंत्र पर खोए भरोसा को वापस लाने में सफल होगी यह तो भविष्य बताएगा । पर इतना जरूर कहा जा सकता है कि नीट परीक्षा-पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था को लेकर उठे विवादों के बीच सरकार का यह एक निर्णायक कदम  है । 


डा. साकेत सहाय

Saturday, July 25, 2026

27वां कारगिल विजय दिवस

 🇮🇳 कारगिल विजय दिवस — वीर शहीदों को शत्-शत् नमन! 🇮🇳

💐🙏 अमर रहें ! हमारे वीर सपूत! 🙏💐



26 जुलाई केवल एक तारीख नहीं, बल्कि भारत के शौर्य, साहस, त्याग और विजय का गौरवशाली प्रतीक है। 

आज जब देश 27वां कारगिल विजय दिवस मना रहा है, तब उन वीर जवानों की याद समस्त देशवासियों के हृदय को गर्व से भर देती है, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। वर्ष 1999 में कारगिल की दुर्गम पहाड़ियों पर भारतीय सैनिकों ने जिस अदम्य साहस और पराक्रम का परिचय दिया, वह भारतीय सैन्य इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों में सदैव अंकित रहेगा। ऑपरेशन विजय के दौरान हमारे वीर सैनिकों ने विपरीत परिस्थितियों में भी तिरंगे की आन, बान और शान के लिए संघर्ष किया और 26 जुलाई, 1999 को विजय का गौरव हासिल किया। 

मेरे लिए यह दिन व्यक्तिगत रूप से भी अत्यंत भावुक और गौरवपूर्ण है। मुझे गर्व है कि कारगिल युद्ध के समय मैंने भारतीय  वायु सेना में अपना योगदान दिया था ।  प्रशिक्षण के तुरंत बाद मेरी तैनाती पूर्वोत्तर भारत में हुई थी। उस दौर में वर्दी पहनकर राष्ट्र की सेवा करना मेरे जीवन का ऐसा अनुभव है, जिसे मैं सदैव गर्व और सम्मान के साथ याद रखूँगा ।  

आज उन सभी अमर शहीदों को विनम्र श्रद्धांजलि, जिन्होंने अपने आज का बलिदान देकर देश का हमारा कल सुरक्षित किया।  वीर सपूतों को समर्पित स्वरचित पंक्तियां-

देह बनी है भारत की मिट्टी से,

देह से आती है वतन की ख़ुशबू।

वतन के काम आए यह ख़ुशबू—

यह सपना है हर सैनिक का।

भारत की सीमाएँ सुरक्षित रहें,

माँ भारती का मस्तक सदा ऊँचा रहे—

यह संकल्प है हर सैनिक का।

जिन्होंने तिरंगे की शान के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए, उनके बलिदान को देश कभी नहीं भूलेगा। कारगिल के अमर शहीदों को शत्-शत् नमन! 💐 

🇮🇳 वन्दे मातरम्! जय हिंद! जय भारत!!! 🇮🇳

डॉ साकेत सहाय 

एयर वेटरन 

#साकेत_विचार

Sunday, July 19, 2026

प्रतिमा तोड़ना असहिष्णुता का परिचायक

 जागरूक लोग इसे अवश्य पढ़ें…


प्रतिमा तोड़ना असहिष्णुता का परिचायक




कोयलांचल के रानीगंज में महापंडित राहुल सांकृत्यायन की स्थापित प्रतिमा को तोड़े जाने की घटना प्रत्येक संवेदनशील नागरिक के लिए चिंता का विषय है। इस कृत्य की जितनी भी निंदा की जाए, वह कम है। सरकार और समाज दोनों को इस घटना का गंभीरता से संज्ञान लेते हुए सम्मानपूर्वक राहुल जी की प्रतिमा का पुनर्स्थापन सुनिश्चित करना चाहिए। 

वर्ष 1994 में राहुल सांकृत्यायन की जन्मतिथि के अवसर पर रानीगंज में स्थापित की गई प्रतिमा को क्षति पहुंचाना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।  राहुल सांकृत्यायन ने भारतीय साहित्य, इतिहास, दर्शन और संस्कृति के क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया। उन्होंने सैकड़ों पुस्तकों की रचना की, स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई, किसानों और मजदूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया तथा तिब्बत से दुर्लभ पांडुलिपियां लाकर भारतीय ज्ञान-संपदा को समृद्ध किया। ये बहुमूल्य पांडुलिपियां आज भी पटना संग्रहालय की धरोहर हैं। मेरी मातृभूमि सारण जिले से उनका गहरा जुड़ाव रहा। उन्होंने सारण की धरती पर किसान आंदोलन का नेतृत्व किया, लाठियां खाईं और जेल भी गए।  वर्ष 1948 में गोपालगंज में आयोजित भोजपुरी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता की थी। सारण जिले के परसा स्थित परसागढ़ मठ में उन्होंने संन्यासी के रूप में भी समय बिताया।


वैचारिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन किसी महापुरुष की प्रतिमा को तोड़ना असहिष्णुता और सांस्कृतिक विरासत के प्रति अनादर का परिचायक है।  ऐसे में यह जरूरी है कि राहुल सांकृत्यायन की प्रतिमा को अविलंब पुनः स्थापित किया जाए तथा ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं। ऐसी घटनाएँ देश और समाज के लिए घातक हैं । 

इस दुखद घटना के बीच एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि इसके बहाने राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रबल समर्थक राहुल सांकृत्यायन के सम्मान में वे लोग भी आवाज़ उठा रहे हैं, जो सामान्यतः हिंदी के आलोचक माने जाते हैं। यह स्वागतयोग्य है, क्योंकि साहित्यकार किसी एक विचारधारा, दल या वर्ग के नहीं होते; वे पूरे समाज की साझा धरोहर होते हैं। उनकी रचनाएँ मानवता और समाज के कल्याण के लिए होती हैं।

अपनी यायावरी के लिए प्रसिद्ध महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने अपने व्यापक अनुभवों से यह सिद्ध किया था कि भारत के विशाल भूभाग में शिक्षित-अशिक्षित, ग्रामीण-शहरी सभी किसी न किसी रूप में हिंदी को समझते हैं। उनका मानना था कि किसी राष्ट्र के लिए एक व्यापक संपर्क भाषा का होना राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करता है। वे यह भी कहते थे कि जब कोई समाज अपनी भाषा का सम्मान करना छोड़ देता है, तो उसके आत्मसम्मान और सांस्कृतिक गौरव पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।


पश्चिम बंगाल में हिंदी के महान साहित्यकार की प्रतिमा को तोड़ा जाना संपूर्ण भारतीय ज्ञान परंपरा का निरादर है । राष्ट्रभाषा हिंदी और उससे जुड़े साहित्यकारों का सम्मान करना केवल एक भाषा का सम्मान करना नहीं, बल्कि भारतीय साहित्य, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा का सम्मान करना है। वही भाषा, साहित्य और संस्कृति जीवंत और जागृत रह सकती है, जो जनता की भावनाओं, विचारों और जीवन का सच्चा प्रतिनिधित्व करे।


आज भी हिंदी जानने वाला व्यक्ति देश के अधिकांश हिस्सों में सहजता से संवाद स्थापित कर सकता है। हिंदी की सबसे बड़ी विशेषता इसकी उदारता है। इसने कभी केवल विदेशी मूल होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया, बल्कि समय-समय पर विभिन्न भारतीय और विदेशी भाषाओं के शब्दों को अपनाकर स्वयं को समृद्ध बनाया है। यही समावेशी स्वभाव हिंदी को व्यापक और जीवंत बनाता है।

पश्चिम बंगाल में उनकी प्रतिमा का होना राष्ट्र के समावेशी स्वरूप को दर्शाता है और उसका तोड़ा जाना इसको क्षति पहुंचाना माना जा सकता है । 


भारतीय समाज, साहित्य और संस्कृति के विकास में भाषा और लेखकों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। इसलिए महापंडित राहुल सांकृत्यायन जैसी विभूतियों का सम्मान करना केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि भारत की बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत का सम्मान है।


आइए, हम सब भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध करने में अपना योगदान दें । 


धन्यवाद 


डॉ साकेत सहाय 

भाषा  सेवी 

#साकेत_विचार

#राहुल_सांकृत्यायन

Sunday, July 5, 2026

भाषा और तकनीक -जिम्मेदार उपयोग जरूरी

 भाषा और तकनीक -जिम्मेदार उपयोग




आज कृत्रिम मेधा (AI ) हमारे जीवन और कार्यशैली का हिस्सा बन चुकी है। यह लेखन, अनुवाद, शोध और सूचना जुटाने में अत्यंत उपयोगी है, लेकिन यह मान लेना कि एआई कभी गलती नहीं करता, यह एक बड़ी भूल है। आज के युवाओं के लिए तो यह एक अनिवार्य उपयोग का विषय बनता जा रहा है, जो उनके मानसिक विकास में एक बड़ी बाधा सिद्ध हो रही है । 

मशीन भी कभी-कभी ऐसी त्रुटियाँ कर देता है जो पहली नज़र में सही प्रतीत होती हैं, लेकिन तथ्यात्मक या भाषाई दृष्टि से गलत होती है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न्यायालयों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से तैयार फर्जी न्यायिक संदर्भों के इस्तेमाल पर कड़ी नाराजगी जताई गई है। शीर्ष न्यायालय ने इसे न्यायिक प्रक्रिया के लिए गंभीर खतरा बताते हुए एनसीएलटी का एक फैसला रद्द कर दिया और राष्ट्रीय विधिक आयोग (बीसीआई) से नियम बनाने पर विचार करने को कहा। दरअसल, राष्ट्रीय कंपनी विधिक अधिकरण (NCLT) द्वारा न्यायिक निर्णयों में एआई गढ़े संदर्भ (Fake AI-generated citations) के उपयोग पर गंभीर आपत्ति व्यक्त की गई है ।  यह मामला न्यायिक चूक से अधिक गंभीर असावधानी का सूचक है जो हमें सावधान करता है कि तकनीक का उपयोग विवेक और सत्यापन के साथ ही किया जाना चाहिए। यह कहा जा सकता है कि  “एआई एक उत्कृष्ट सहायक है, अंतिम निर्णायक नहीं।” 

तकनीक और एआई के दौर में भी तथ्यों की जाँच, भाषा की शुद्धता और विषय का सही ज्ञान उतना ही जरूरी है जितना आज से पहले था ।  आज भी ज्ञान का प्रसार मनुष्य की ही जिम्मेदारी है। दैनिक कार्यजीवन से जुड़े इन दो वाक्यों को ही लें- 
शीर्षक वाक्य -

(
१.
पर्यटक बने परेशानी।

अर्थ— पर्यटक ही परेशानी बन गए। 

२.
पर्यटक बनें परेशानी।
अर्थ— पर्यटकों को चाहिए कि वे परेशानी बनें।

केवल ‘बने’ और ‘बनें’ के अंतर ने ही पूरे वाक्य का अर्थ और भाव बदल दिया। यही भाषा की शक्ति है।  आइए, हम सब तकनीक को अपनाएँ, लेकिन भाषा की गरिमा, तथ्य की प्रामाणिकता और अपने विवेक को कभी न छोड़ें। क्योंकि तकनीक गति दे सकती है, परंतु भाषा और विवेक स्पष्टता और विश्वसनीयता देती है।
-डॉ साकेत सहाय 
भाषा-संचार विशेषज्ञ 
#साकेत_विचार #तकनीक #ज्ञान #हिंदी

भाषा एवं कारोबार : राजभाषा संगोष्ठी सह कार्यशाला-14.08.2026

 भाषा एवं कारोबार : राजभाषा संगोष्ठी सह कार्यशाला “हिंदी भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि कारोबार संपर्क, विश्वास, आत्मीयता और प्रभावी ...