संघर्ष, साधना और कर्मनिष्ठा से जगमगाता एक विलक्षण व्यक्तित्व
“यह बेहतर करने का उत्साह ही अमिताभ को ‘अमिताभ’ बनाता है।”
डॉ. साकेत सहाय
हिंदी फिल्मों के महान अभिनेता अमिताभ बच्चन का आज जन्मदिन है । कभी अमिताभ बच्चन के पिता, हिंदी के प्रसिद्ध कवि हरिवंश राय बच्चन ने छायावाद के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर सुमित्रानंदन पंत के सुझाव पर ही अपने पुत्र का नाम ‘अमिताभ’ रखा था, जिसका अर्थ है—कभी न मिटने वाली आभा। आज हम सभी इस आभा से परिचित हैं।
अपने जीवंत अभिनय, सरल-सहज भाषा और व्यवहार के कारण सदी के महानायक के रूप में ख्यात अमिताभ बच्चन बीते आधी सदी से भी अधिक समय से भारतीय सिनेमा को सशक्तता प्रदान कर रहे हैं। जब बच्चन साहब को भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च पुरस्कारों में से एक दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया, उसी समय से जुड़ा एक उद्धरण आप सभी से साझा करना चाहता हूँ। वे कहते हैं—
“मैंने स्वयं से पूछा कि क्या दादा साहब फाल्के पुरस्कार फिल्मी जीवन की सक्रियता से सेवानिवृत्ति का संकेत है? तो यह गलत है। मुझे अभी और बेहतर करना है।”
— अमिताभ बच्चन
उनकी यही जिजीविषा किसी नायक को सदैव कुछ अप्रतिम करने की प्रेरणा देती है। आप सभी याद करें 29 दिसंबर, 2019 का दिन, जब उन्हें भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से दादा साहब फाल्के पुरस्कार प्राप्त हुआ। यह पुरस्कार भारतीय सिनेमा के क्षेत्र में सर्वोच्च सम्मान माना जाता है। इसकी प्राप्ति के बाद भी उनमें एक ओर संतोष का भाव दिखाई दिया, तो दूसरी ओर बेहतर करने का उत्साह भी। यही उत्साह उन्हें निरंतर सक्रिय बनाए रखता है।
कोरोना काल में भी वे सक्रिय रहे और आज भी फिल्मों में काम कर रहे हैं। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के मंच पर उनका मनमोहक अंदाज तो निराला है ही। अभिनय के साथ-साथ दर्शकों से संवाद स्थापित करने की उनकी सहजता भी उनके व्यक्तित्व की विशिष्ट पहचान है।
संगम नगरी प्रयागराज में जन्मे अमिताभ बच्चन के पिता डॉ. हरिवंश राय बच्चन ने आरंभ में भले ही उनका नाम ‘इंकलाब’ रखा था, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान प्रचलित प्रेरक उद्घोष ‘इंकलाब जिंदाबाद’ से लिया गया था। जब हरिवंश राय बच्चन ने अपने पुत्र का नाम ‘इंकलाब’ रखा होगा, तब उनके मन में क्या विचार रहे होंगे, यह कहना कठिन है। लेकिन उनके जीवन की यात्रा को देखते हुए एक बात अवश्य कही जा सकती है—‘यथा पिता तथा पुत्र’।
एक छोटी-सी घटना, जीवन की बड़ी सीख
अमिताभ बच्चन के जन्मदिन पर एक रोचक प्रसंग याद आता है। अनुपम खेर की आत्मकथा Lessons Life Taught Me, Unknowingly: An Autobiography में मैंने यह प्रसंग पढ़ा था।
‘सारांश’ फिल्म की सफलता के बाद अनुपम खेर को ‘आखिरी रास्ता’ फिल्म में अमिताभ बच्चन के साथ काम करने का अवसर मिला। अनुपम खेर अपनी सफलता से कुछ अधिक आत्मविश्वास से भर गए थे। जब वे पहले दिन शूटिंग के लिए पहुँचे, तो सेट पर छोटी-छोटी बातों को लेकर सहायकों पर नाराज होने लगे। एसी ठीक से काम क्यों नहीं कर रहा है—इस बात पर उन्होंने सबको डाँटना शुरू कर दिया। वे कहने लगे कि मैं नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा का गोल्ड मेडलिस्ट हूँ और आप लोग मेरी कद्र नहीं कर पा रहे हैं। बिना एसी के मैं किस तरह अभिनय कर पाऊँगा?
कुछ शांत होने के बाद उन्होंने सहायक से पूछा, “मेरा पहला सीन किसके साथ है?”
सहायक ने जवाब दिया, “अमिताभ बच्चन सर के साथ।”
अनुपम खेर ने पूछा, “कहाँ हैं वे?”
सहायक ने बताया कि वे ठीक नौ बजे मेकअप के लिए आ गए थे, जबकि अनुपम खेर कुछ देर से पहुँचे थे। इस बात पर अनुपम खेर ने फिर सहायक को झिड़कते हुए कहा कि मुझे यह मत सिखाओ कि कितने बजे आना है और कितने बजे नहीं। बस यह बताओ कि वे कहाँ हैं?
सहायक ने जवाब दिया, “सेट पर।”
अनुपम खेर सेट पर पहुँचे। उन्होंने देखा कि अमिताभ बच्चन एक कुर्सी पर बैठकर कोई किताब पढ़ रहे थे। अनुपम खेर ने अपना परिचय देते हुए कहा, “सर, मैं अनुपम खेर हूँ। ‘सारांश’ फिल्म में काम कर चुका हूँ।”
अमिताभ बच्चन ने सहजता से कहा, “हाँ, मैंने आपकी फिल्म देखी है। अच्छा अभिनय किया है आपने।”
अनुपम खेर ने कहा, “सर, मेरे लिए यह किस्मत की बात है कि आपके साथ अभिनय करने का मौका मिला।”
अमिताभ बच्चन ने भी जवाब दिया, “यह मेरे लिए भी खुशी की बात है कि मुझे आपके साथ अभिनय करने का मौका मिला।”
इतना कहकर अमिताभ फिर से किताब पढ़ने लगे। कुछ इधर-उधर की बातें करने के बाद अनुपम खेर ने उनसे पूछा, “यहाँ एसी ठीक से काम नहीं कर रहा है और आप इतने मेकअप में चादर ओढ़कर बैठे हैं। क्या आपको गर्मी नहीं लग रही?”
अमिताभ बच्चन ने जवाब दिया—
“अनुपम, गर्मी के बारे में सोचता हूँ तो लगती है, नहीं सोचता हूँ तो नहीं लगती है।”
यह कहकर वे फिर किताब पढ़ने में डूब गए।
अनुपम खेर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि यह उनके लिए बहुत बड़ी सीख थी। इसके बाद उन्होंने कभी सेट पर इस तरह की शिकायत नहीं की।
यह प्रसंग केवल एक महान अभिनेता के धैर्य का परिचय नहीं देता, बल्कि एक बड़ा जीवन-संदेश भी देता है—हमारी परिस्थितियों से अधिक महत्त्वपूर्ण उनके प्रति हमारा दृष्टिकोण होता है। जहाँ एक व्यक्ति असुविधाओं को अपनी कार्यक्षमता में बाधा बना लेता है, वहीं दूसरा उन्हीं परिस्थितियों में अपने काम पर एकाग्र रहता है।
असफलताओं से शिखर तक का सफर
अमिताभ बच्चन ने अपने कार्यों से फिल्मी दुनिया के इतिहास में एक क्रांतिकारी पड़ाव का अध्याय अवश्य लिखा है। जिस ऊँचाई तक वे पहुँचे हैं, वहाँ तक पहुँचने का स्वप्न विरले ही देख पाते हैं। यह भी सच है कि प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत द्वारा दिए गए नाम ‘अमिताभ’ के अनुरूप वे भारतीय फिल्म इतिहास के ‘अमिताभ’ सिद्ध हुए।
बहुत कम लोगों के सौभाग्य में यह होता है कि वे अपने कार्यों से अपने नाम की सार्थकता को उजागर कर सकें। ‘अमिताभ’ बनना बहुत मुश्किल होता है। इसके लिए वर्षों की साधना, निरंतर परिश्रम, असफलताओं से संघर्ष और स्वयं को लगातार बेहतर बनाने की प्रतिबद्धता चाहिए। शायद यही कारण है कि सिनेप्रेमियों ने उन्हें ‘महानायक’ का दर्जा दिया है।
अभिनय के प्रति उनकी निष्ठा, लगन, सक्रियता, रचनात्मकता और निरंतरता उन्हें करोड़ों लोगों के बीच विशिष्ट बनाती है। उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक उनकी विनम्रता भी है। वे अपनी सफलता का श्रेय ईश्वर की कृपा, माता-पिता के आशीर्वाद, निर्माताओं-निर्देशकों और सह-कलाकारों के योगदान के साथ-साथ भारत की जनता के स्नेह और प्रेम को देते हैं।
अपनी सहज अभिनय-शैली और दमदार संवाद-अदायगी से करोड़ों लोगों के दिलों पर दशकों से राज करने वाले अमिताभ बच्चन का आकर्षण समय के साथ कम नहीं हुआ है। बदलते दौर, बदलती तकनीक और बदलती दर्शक-रुचियों के बीच अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना किसी भी कलाकार के लिए आसान नहीं होता। अमिताभ बच्चन ने यह उपलब्धि अपने निरंतर प्रयासों से हासिल की है।
भारतीय फिल्म उद्योग के सबसे प्रमुख और दिग्गज व्यक्तित्वों में से एक अमिताभ बच्चन को कभी उनके रूप और आवाज के कारण ठुकराया गया था। आज वही आवाज उनकी सबसे बड़ी पहचान बन चुकी है। उनकी कहानी किसी भी आम आदमी की कहानी जैसी है, क्योंकि आम से खास बनने का सफर कभी भी असफलताओं से खाली नहीं रहा। अंतर इस बात से पैदा होता है कि व्यक्ति उन असफलताओं का सामना कैसे करता है।
अमिताभ बच्चन ने अपनी असफलताओं को अपनी नियति नहीं बनने दिया। उन्होंने उन्हें अपने व्यक्तित्व को तराशने और आगे बढ़ने का अवसर बनाया। यही कारण है कि वे आज एक सफल, सम्मानित और प्रेरणादायी सितारे हैं।
जब आवाज बनी पहचान
मनोरंजन जगत में अमिताभ बच्चन का प्रवेश आकाशवाणी यानी ऑल इंडिया रेडियो में नौकरी पाने की एक असफल कोशिश से भी जुड़ा रहा है। 1960 के दशक में दिग्गज अमीन सयानी अपने प्रसिद्ध कार्यक्रम ‘बिनाका गीतमाला’ के साथ रेडियो प्रस्तोता के रूप में लोकप्रिय थे।
प्रारंभिक दिनों में अमिताभ रेडियो प्रस्तोता बनना चाहते थे और उन्होंने आकाशवाणी में नौकरी के लिए ऑडिशन देने की कई कोशिशें कीं। उन दिनों वे अवसर की तलाश में थे, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। अपनी अस्वीकृति को याद करते हुए अमिताभ ने कहा था—
“शायद मेरी आवाज उस चीज के लिए उपयुक्त नहीं थी, जिसकी उन्हें तलाश थी।”
एक अभिनेता के रूप में अपने शुरुआती सफर पर चर्चा करते हुए उन्होंने मुंबई में संघर्ष के दिनों को भी याद किया। एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि उन्हें कई बार अस्वीकृति का सामना करना पड़ा। जहाँ भी वे नौकरी के लिए गए, उन्हें सफलता नहीं मिली। कभी योग्यता कम समझी गई, कभी उनका संकोच आड़े आया और कभी साक्षात्कार के दौरान उनकी झिझक बाधा बनी। कई बार उनसे अधिक योग्य समझे जाने वाले लोगों को अवसर मिल गया।
विडंबना देखिए कि जिस आवाज को कभी रेडियो की नौकरी के लिए उपयुक्त नहीं माना गया, वही आवाज आगे चलकर भारतीय सिनेमा की सबसे विशिष्ट पहचानों में शामिल हो गई।
अमिताभ बच्चन ने मनोरंजन उद्योग में पहला कदम अभिनेता के रूप में नहीं, बल्कि 1969 में फिल्म ‘भुवन शोम’ के लिए वॉयस-ओवर कलाकार के रूप में रखा था। मृणाल सेन द्वारा निर्देशित यह कम बजट की फिल्म भारतीय समानांतर सिनेमा आंदोलन की महत्त्वपूर्ण कृति बनी और सेन को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में सहायक हुई।
जया बच्चन, जो बाद में अमिताभ की जीवनसंगिनी बनीं, ने फिल्म में अमिताभ के काम के संबंध में मृणाल सेन के शुरुआती आकलन को याद करते हुए कहा था—
“उनकी आवाज ठीक है, लेकिन वे अभिनेता के रूप में कभी सफल नहीं हो पाएँगे।”
इतिहास ने समय के साथ ऐसे तमाम आकलनों को गलत सिद्ध कर दिया। जिस व्यक्ति की आवाज और अभिनय-क्षमता पर कभी सवाल उठे, वही आगे चलकर अपनी आवाज, संवाद-अदायगी और अभिनय से एक अलग मानक स्थापित करने में सफल हुआ।
यही जीवन का एक बड़ा सत्य है—आज का आकलन किसी व्यक्ति की अंतिम क्षमता का प्रमाण नहीं होता। परिस्थितियाँ, अवसर, परिश्रम और समय मिलकर उस संभावना को वास्तविकता में बदल सकते हैं, जिसे लोग आरंभ में पहचान नहीं पाते।
भाग्य से आगे, कर्म की शक्ति
अमिताभ बच्चन के जीवन को लेकर अनेक तरह की चर्चाएँ होती रही हैं। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से उनके जन्म के समय ग्रहों की स्थिति के संबंध में भी कुछ विशिष्ट व्याख्याएँ प्रस्तुत की जाती हैं। किंतु उनके व्यक्तित्व और उपलब्धियों का मूल्यांकन करते समय उनकी जिजीविषा, व्यवहार-कुशलता, परिश्रम और निरंतर सक्रियता को विशेष महत्त्व देना चाहिए।
इतनी असफलताओं के बाद भी आगे बढ़ते रहना, आलोचनाओं के बीच अपनी क्षमता को निखारना और सफलता के शिखर पर पहुँचकर भी काम के प्रति विनम्र बने रहना आसान नहीं है। अमिताभ बच्चन की यात्रा इस बात का उदाहरण है कि प्रतिभा तभी व्यापक पहचान बनती है, जब उसे निरंतर साधना और कर्मनिष्ठा का साथ मिलता है।
आज अमिताभ बच्चन न केवल एक अभिनेता के रूप में, बल्कि भारतीय सिनेमा के सबसे महत्त्वपूर्ण सितारों में से एक हैं। उनकी विशिष्ट आवाज ने उनकी सफलता में अप्रतिम भूमिका निभाई है। अभिनय, संवाद-अदायगी और पर्दे पर उनकी उपस्थिति ने उन्हें एक ऐसी पहचान दी है, जो पीढ़ियों के पार भी कायम है।
उनकी उल्लेखनीय फिल्मों में ‘अभिमान’, ‘मिली’, ‘शोले’, ‘दीवार’, ‘मैं आजाद हूँ’, ‘जंजीर’, ‘शक्ति’, ‘आनंद’, ‘सिलसिला’, ‘ब्लैक’, ‘बागबान’, ‘पा’ और ‘पिंक’ आदि शामिल हैं। इन फिल्मों में उनके अभिनय के विविध रंग दिखाई देते हैं—कहीं संवेदनशीलता, कहीं आक्रोश, कहीं पारिवारिक आत्मीयता, तो कहीं सामाजिक प्रश्नों से मुठभेड़।
ईश्वर से कामना है कि वे स्वस्थ रहें और अभिनय के फलक पर निरंतर सक्रिय बने रहें। परमपिता उन्हें दीर्घायु प्रदान करें।
कवि-पुत्र की काव्यात्मक अभिव्यक्ति
महाकवि हरिवंश राय बच्चन के सुपुत्र अमिताभ बच्चन स्वयं भी कविता लिखते हैं। उनके जन्मदिन के अवसर पर उनकी कुछ काव्यात्मक अभिव्यक्तियों को याद करना प्रासंगिक होगा। ये रचनाएँ उनके ट्विटर अकाउंट पर साझा की गई कविताओं के रूप में प्रस्तुत की गई हैं।
जी हाँ हुज़ूर, मैं काम करता हूँ
जी हाँ हुज़ूर मैं काम करता हूँ
जी हाँ हुज़ूर मैं काम करता हूँ
मैं सुबह शाम काम करता हूँ
मैं रात बा-रात काम करता हूँ
मैं रातों रात काम करता हूँ
केवल एक दिवस देते हो कवि
केवल एक दिवस देते हो कवि, कविता के लिए,
आश्चर्य होता होगा सभी कवि दिग्गजों के लिए;
जानते नहीं हो तुम विश्व के आचरण को जीव-जीवनी,
प्रति क्षण कविता होती है सर्वप्रिय!
जी हाँ जनाब, मैं अस्पताल जाता हूँ
जी हाँ जनाब मैं अस्पताल जाता हूँ
बचपन से ही इस प्रतिक्रिया को जीवित रखता हूँ,
वहीं तो हुई थी मेरी प्रथम पैदाइशी चीत्कार
वहीं तो हुआ था अविरल जीवन का मेरा स्वीकार।
इस पवित्र स्थल का अभिनंदन करता हूँ मैं,
जहाँ ईश्वर बनाई प्रतिमा की जाँच होती है तय।
धन्य हैं वे
धन्य हैं वे,
जिन्हें आत्मा को जीवित रखने का सौभाग्य मिला।
भाग्यशाली हैं वे जिन्हें,
उन्हें सौभाग्य देने का सौभाग्य न मिला।
बनी रहे ये प्रतिक्रिया अनंत जनजात को,
न देखें ये कभी अस्वस्थता के चंडाल को।
पहुँच गया आज रात्रि को लीलावती के प्रांगण में,
देव समान दिव्यों के दर्शन करने के लिए मैं।
विस्तार से देवी-देवों से परिचय हुआ,
उनकी वचन-वाणी से आश्रय मिला।
निकला जब चार पहियों के वाहन में बाहर,
‘रास्ता रोको’ का ऐलान किया पत्र-मंडली ने जर्जर।
चकाचौंध कर देने वाले हथियार बरसाते हैं ये,
मानो सीमा पार कर देने का दंड देना चाहते हैं वे।
समझ आता है मुझे इनका व्यवहार,
समझ आता है मुझे इनका व्यापार।
प्रत्येक छवि-वार है ये उनका व्यवसाय-आधार,
बाधा न डालूँगा उनकी नित्य क्रिया पर कभी।
प्रार्थना है बस इतनी उनसे मगर,
सभी नेत्रहीन कर डालोगे तुम हमारी दिशा-दृष्टि को,
यदि यूँ अकिंचन चलाते रहोगे अपने औजार को।
हमारी रक्षा का है बस भैया, एक ही उपाय,
इस बुने हुए मस्तिष्क-साया रूपी कवच के सिवाय।
(अमिताभ बच्चन के ट्विटर अकाउंट से साभार—प्रकाशन से पूर्व मूल पाठ एवं वर्तनी का सत्यापन अपेक्षित।)
नई पीढ़ी के लिए एक संदेश
आज के दौर में अमिताभ बच्चन के जीवन से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। उनकी कार्यनिष्ठा एक ऐसा संदेश है, जो बड़ी आबादी को प्रेरित करता है। आज की युवा पीढ़ी, विशेषकर जेन-ज़ी, भी उनके जीवन से अनेक महत्त्वपूर्ण सीख ग्रहण कर सकती है।
पहली सीख है—अस्वीकृति को अपनी अंतिम पहचान न बनने दें। दूसरी सीख है—सफलता के बाद भी सीखने और बेहतर करने की इच्छा जीवित रखें। तीसरी सीख है—अपनी परिस्थितियों को अपनी कार्यक्षमता पर हावी न होने दें। और चौथी सीख है—ऊँचाई प्राप्त करने के बाद भी विनम्रता तथा कृतज्ञता बनाए रखें।
अमिताभ बच्चन अपनी भाषा, संस्कृति और लिपि के प्रति भी सजग दिखाई देते हैं। उनका जीवन यह याद दिलाता है कि आधुनिकता और अपनी सांस्कृतिक जड़ों के बीच विरोध आवश्यक नहीं है। व्यक्ति अपनी परंपरा से जुड़े रहते हुए भी समय के साथ आगे बढ़ सकता है।
अमिताभ बच्चन की यात्रा किसी एक कलाकार की सफलता की कहानी भर नहीं है। यह संघर्ष, धैर्य, आत्मविश्वास, अनुशासन और निरंतर कर्म का ऐसा वृत्तांत है, जिसमें हर पीढ़ी अपने लिए कोई न कोई प्रेरणा खोज सकती है।
नाम ‘अमिताभ’ का अर्थ है—असीम आभा। लेकिन केवल नाम से कोई महान नहीं बनता। महानता तब आती है, जब व्यक्ति अपने कर्मों से अपने नाम को सार्थक करता है। अमिताभ बच्चन ने अपनी लंबी यात्रा में बार-बार यह सिद्ध किया है कि उपलब्धियों के शिखर पर पहुँचकर भी सीखने, काम करने और बेहतर बनने की इच्छा समाप्त नहीं होनी चाहिए।
‘अमिताभ’ होने का यही अर्थ है—अपनी आभा से स्वयं प्रकाशित होना और अपने कर्मों से दूसरों के लिए भी प्रेरणा बनना।
डॉ. साकेत सहाय
लेखक | भाषा-संचार विशेषज्ञ
ई-मेल: Hindisewi@gmail.com
आलेख में प्रस्तुत सूचनाएँ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध विभिन्न स्रोतों पर आधारित हैं।
© डॉ. साकेत सहाय

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