Wednesday, August 5, 2026

कविवर शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की जयंती पर विशेष





आज कविवर शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जी की जयंती है।  सुप्रसिद्ध कवि, पद्म भूषण से सम्मानित डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन जी की जयंती पर कोटि -कोटि नमन! हिंदी साहित्य में शिवमंगल सिंह सुमन एक प्रसिद्ध नाम है। हिंदी साहित्य में प्रगतिशील लेखन के अग्रणी कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ का जन्म 5 अगस्त, 1915 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में हुआ था।  स्वतंत्रता, देशभक्ति और स्वाभिमान पर सुमन जी के बोल काफी ओजस्वी रहे हैं। पराधीन राष्ट्र में जन्म लेने के बावजूद उनमें आत्मसम्मान और स्वतंत्रता जैसे मूल मानवीय मूल्यों में गहरी निष्ठा थी। वह वरदान मांगने वाली गुलाम चेतना नहीं थे बल्कि तूफानों की ओर भी नाव की पतवार घुमा देने वाले आजाद और साहसी नाविक थे। अन्याय के प्रति विद्रोह, निराशा के प्रति आक्रामकता और मानव क्षमताओं की महिमा बखानती शिवमंगल की कविताएं आज भी सोती हुई मनुष्यता के लिए जागरण का गीत हैं। वह मनुष्य को तूफानों से डरने नहीं बल्कि अपनी पतवार उसी ओर घुमा देने की प्रेरणा देने वाले कवि हैं।  उनका निधन 27 नवंबर, 2002 को हुआ। 'क्या हार में क्या जीत में। किंचित नहीं भयभीत में। कर्तव्य पथ पर जो मिले। यह भी सही- वह भी सही। वरदान मांगूंगा नहीं।' अक्सर सोशल मीडिया पर यह कविता भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी की रचना के रूप में दर्शायी जाती है लेकिन यह एक गलत तथ्य है, 'वरदान मांगूंगा नहीं' के लेखक अटल बिहारी वाजपेयी नहीं हैं बल्कि इसे हिंदी साहित्य के अप्रतिम रचनाकार शिवमंगल सिंह सुमन ने लिखा है। दरअसल ग्वालियर के जिस कॉलेज में शिवमंगल सिंह सुमन पढ़ाते थे, अटल बिहारी वाजपेयी वहीं पर पढ़ते थे। वाजपेयी जी ने भी स्वीकार किया है कि उनकी कविता पर शिवमंगल सिंह सुमन का स्पष्ट प्रभाव है।  उनकी जयंती पर उनकी रचित प्रसिद्ध कविता - 

 वरदान मांगूंगा नहीं.... 

यह हार एक विराम है

जीवन महासंग्राम है

तिल-तिल मिटूंगा पर दया की भीख मैं लूंगा नहीं

वरदान मांगूंगा नहीं।

स्मृति सुखद प्रहरों के लिए

अपने खंडहरों के लिए

यह जान लो मैं विश्व की संपत्ति चाहूंगा नहीं

वरदान मांगूंगा नहीं।

क्या हार में क्या जीत में

किंचित नहीं भयभीत मैं

संधर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही

वरदान मांगूंगा नहीं।

 लघुता न अब मेरी छुओ

तुम हो महान बने रहो

अपने हृदय की वेदना मैं व्यर्थ त्यागूंगा नहीं

वरदान मांगूंगा नहीं।

 चाहे हृदय को ताप दो

चाहे मुझे अभिशाप दो

कुछ भी करो कर्तव्य पथ से किंतु भागूंगा नहीं

वरदान मांगूंगा नहीं।

उनकी स्मृति को नमन करते हुए प्रस्तुत है उनकी रचित एक और कविता- 

गति प्रबल पैरों में भरी 

फिर क्यों रहूं दर दर खडा 

जब आज मेरे सामने 

है रास्ता इतना पडा 

जब तक न मंजिल पा सकूँ, 

तब तक मुझे न विराम है, 

चलना हमारा काम है। 

कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया 

कुछ बोझ अपना बँट गया 

अच्छा हुआ, तुम मिल गई 

कुछ रास्ता ही कट गया 

क्या राह में परिचय कहूँ, 

राही हमारा नाम है, 

चलना हमारा काम है। 

जीवन अपूर्ण लिए हुए 

पाता कभी खोता कभी 

आशा निराशा से घिरा, 

हँसता कभी रोता कभी 

गति-मति न हो अवरूद्ध, 

इसका ध्यान आठो याम है, 

चलना हमारा काम है। 

इस विशद विश्व-प्रहार में 

किसको नहीं बहना पडा 

सुख-दुख हमारी ही तरह, 

किसको नहीं सहना पडा 

फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ, 

मुझ पर विधाता वाम है, 

चलना हमारा काम है। 

मैं पूर्णता की खोज में 

दर-दर भटकता ही रहा 

प्रत्येक पग पर कुछ न कुछ 

रोडा अटकता ही रहा 

निराशा क्यों मुझे? 

जीवन इसी का नाम है, 

चलना हमारा काम है। 

साथ में चलते रहे 

कुछ बीच ही से फिर गए 

गति न जीवन की रूकी 

जो गिर गए सो गिर गए 

रहे हर दम, 

उसी की सफलता अभिराम है, 

चलना हमारा काम है। 

फकत यह जानता 

जो मिट गया वह जी गया

मूंदकर पलकें सहज 

दो घूँट हँसकर पी गया 

सुधा-मिक्ष्रित गरल, 

वह साकिया का जाम है, 

चलना हमारा काम है।

-शिवमंगल सिंह सुमन

-संकलन -@डॉ साकेत सहाय

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