राजभाषा की बात - हिंदी और हिंदीतर
यह इस देश का कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि जिस नियम को संघ की राजभाषा नीति के समुचित क्रियान्वयन के लिए लागू किया गया था ताकि हिंदी के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों के प्रशासनिक हितों और भाषाई सुविधा का भी ध्यान रखा जाए।परंतु उसका दुरुपयोग कुछ स्वार्थी मानस जान-बूझकर कर रहे हैं । हिंदी या किसी भी भाषा के ज्ञान का अर्थ उसकी योग्यता और उसने वह भाषा कहाँ तक पढ़ी है इससे लगाया जाना चाहिए न कि केवल मातृभाषा के आधार पर । अब तेलंगाना में जन्मा कोई हिंदी भाषी केवल मातृभाषा के नाम पर हिंदी का जानकार नहीं हो सकता है वैसे ही जैसे बिहार या दिल्ली का कोई तमिल या मराठी भाषी व्यक्ति केवल मातृभाषा के नाम पर अहिन्दी भाषी नहीं हो सकता। राजभाषा नियमों में “हिंदी” और “हिंदीतर” शब्द इसलिए इस्तेमाल किए जाते हैं क्योंकि भारत में सभी राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में हिंदी का समान स्तर पर प्रयोग नहीं होता और यह संघ सरकार में पत्राचार को बढ़ावा देने के लिए लागू किया गया था । उदाहरण के लिए,
* हिंदी को प्रथम राजभाषा के रूप में अपनाने वाले राज्य -क क्षेत्र
* हिंदी को द्वितीय राजभाषा के रूप में अपनाने वाले राज्य -ख क्षेत्र
* जिन राज्यों ने हिंदी के बजाय अन्य भाषाओं को प्रथम राजभाषा के रूप में अपनाया है-ग क्षेत्र
तब से समंदर का पानी बहुत बह गया, फिर भी कुछ लोग हिंदी और हिंदीतर का प्रयोग निहित स्वार्थों की खातिर कर रहे हैं जो कि भारतीय जनमानस में “राष्ट्रभाषा” के व्यापक अर्थ में प्रयुक्त हिन्दी भाव को कमजोर करने का एक षड्यंत्र है । उदाहरण के लिए अब कुछ महान अज्ञानी लोग साहित्यकार नरेन्द्र कोहली जी को हिंदीतर सिद्ध करने में लगे हुए हैं,हिंदी हितधारियों को इससे बचना चाहिए ।
पर यह करेगा कौन? क्योंकि ज्यादातर लोग तो इससे लाभ ही उठा रहे हैं । अब कोई आदमी तमिल , तेलुगु भाषी है या मराठी भाषी जिन्होंने हिंदी को रोजगार, पठन -पाठन के कारण चुना है और वे हिंदी में निष्णात भी हैं पर लाभ की खातिर हिंदीतर भाषी बने फिरते हैं, क्या इसे एक प्रकार का जाति वाद या अल्पसंख्यकवाद नही माना जाएगा?
मुझे यह भी डर है कि जिस तरह भाषिक तुष्टिकरण के नाम पर प्रांतों का विभाजन किया गया और आठवीं अनुसूची में आने के नाम पर हिंदी को विभाजित किया जा रहा है कल को यदि भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया गया तो मैं भी हिंदीतर बन कर इठलाता फिरूँगा । पर यह सब दुर्भाग्य हिंदी के साथ ही है और देश में सब अंग्रेजी भाषी है कोई अंग्रेजीतर नहीं है ।
धन्यवाद
जय हिंद! जय हिंदी!!
-डा. साकेत सहाय
भाषा-संचार अध्येता
दिनांक: ०८/०८/२०२६
हैदराबाद
#साकेत_विचार
#राजभाषा
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