ऋषिकेश मुखर्जी : मानव अंतर्मन के कुशल चितेरे


ऋषिकेश मुखर्जी : जयंती
आलेख : डॉ. साकेत सहाय
कुछ फिल्मकार फिल्में बनाते हैं, कुछ अपने समय को दर्ज करते हैं और कुछ ऐसे होते हैं, जो मनुष्य को उसकी पूरी संवेदना के साथ परदे पर उतार देते हैं। ऋषिकेश मुखर्जी इसी विरल परंपरा के फिल्मकार थे। उन्होंने भारतीय सिनेमा को चकाचौंध से अलग एक ऐसी दुनिया दी, जिसमें आम आदमी के सुख-दुःख, रिश्तों की गर्माहट और जीवन की छोटी-बड़ी विडंबनाएँ सहजता से दिखाई देती थीं। उनकी फिल्में देखते हुए लगता है कि परदे पर कोई कहानी नहीं, हमारा अपना जीवन घटित हो रहा है।
जयंती पर ऋषि दा को याद करना उस सिनेमा को याद करना है, जिसने बिना शोर किए दर्शकों के मन में स्थायी जगह बनाई। उनका अनुशासन कठोर था, लेकिन कलाकार की प्रतिभा पर उनकी दृष्टि उतनी ही गहरी। बड़े से बड़े सितारे भी उनके साथ काम करना अपना सौभाग्य समझते थे।
‘आनंद’ की कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है, जिसे पता है कि उसके जीवन की घड़ियाँ सीमित हैं, फिर भी वह हर पल को पूरी जीवंतता से जीता है। उसके सामने डॉ. भास्कर है, जो जीवन को तर्क और चिकित्सा की दृष्टि से देखने का अभ्यस्त है। आनंद के साथ उसका संबंध धीरे-धीरे उसे बदलता है। यहाँ कथा मृत्यु की ओर बढ़ती है, लेकिन फिल्म का भाव जीवन की ओर खुलता है। ऋषि दा मृत्यु को भावुकता का अंतिम बिंदु न बनाकर यह प्रश्न उठाते हैं कि कम समय में भी जीवन को अर्थपूर्ण कैसे बनाया जाए। आनंद की जीवंतता और भास्कर का परिवर्तन इसी विचार को मानवीय गहराई देते हैं।
‘सत्यकाम’ में एक आदर्शवादी युवक सत्यप्रिय उस सामाजिक व्यवस्था से टकराता है, जहाँ सिद्धांतों की कीमत अक्सर समझौते से चुकानी पड़ती है। वह ईमानदारी को केवल निजी गुण नहीं, जीवन का आधार मानता है; लेकिन परिस्थितियाँ बार-बार उसके विश्वास की परीक्षा लेती हैं। फिल्म की शक्ति इस संघर्ष में है कि सत्यप्रिय न तो परिस्थितियों के सामने सहजता से झुकता है, न उसके आदर्शों को सरल समाधान मिलता है। इसीलिए ‘सत्यकाम’ व्यक्ति की कहानी से आगे बढ़कर आदर्श और व्यवहार, नैतिकता और सामाजिक यथार्थ के बीच तनाव की कहानी बन जाती है।
‘अभिमान’ में कहानी एक दांपत्य से शुरू होती है। गायक सुबीर और प्रतिभाशाली उमा के रिश्ते में प्रेम है, लेकिन उमा की सफलता के साथ समीकरण बदलने लगते हैं। जिस प्रतिभा को सुबीर ने कभी सराहा था, वही सफलता उसके भीतर असुरक्षा पैदा करने लगती है। ऋषि दा इस परिवर्तन को अचानक नहीं दिखाते; छोटे-छोटे व्यवहार, मौन और दूरी के माध्यम से रिश्ते में बढ़ती दरार को रचते हैं। यही वजह है कि फिल्म केवल पति के अहं की कहानी नहीं रह जाती, बल्कि प्रेम में बराबरी, सफलता की साझेदारी और पुरुष-स्त्री संबंधों में छिपी असुरक्षाओं को भी सामने लाती है।
‘गुड्डी’ में एक किशोरी फिल्मी सितारों की दुनिया से इतना प्रभावित है कि उसे पर्दे का संसार वास्तविक जीवन से अधिक आकर्षक लगता है। कहानी उसके इसी मोह और फिर वास्तविकता से परिचय की यात्रा है। ऋषि दा उसके आकर्षण का मजाक नहीं बनाते; वे समझते हैं कि किशोर मन के लिए कल्पना और आदर्श कितने शक्तिशाली होते हैं। जब पर्दे के पीछे का यथार्थ सामने आता है, तो गुड्डी का मोहभंग केवल निराशा नहीं, परिपक्वता की शुरुआत बन जाता है। इसीलिए फिल्म सिनेमा के आकर्षण के साथ-साथ उम्र के उस पड़ाव को भी समझती है, जहाँ मन कल्पना से यथार्थ की ओर बढ़ता है।
‘मिली’ में बीमारी से जूझती मिली का जीवंत स्वभाव और भीतर से टूटे हुए शेखर का अकेलापन एक-दूसरे के सामने आता है। मिली जानती है कि उसका जीवन अनिश्चित है, फिर भी वह जीवन से प्रेम करना नहीं छोड़ती। शेखर इसके विपरीत जीते हुए भी भीतर से जीवन से कट चुका है। दोनों का मिलना कहानी को एक गहरे मानवीय अर्थ तक ले जाता है—कभी-कभी जीवन की ऊर्जा परिस्थितियों से नहीं, मनुष्य के भीतर से आती है। मिली की बीमारी फिल्म को करुण बनाती है, लेकिन उसकी जीवंतता उसे निराशा की फिल्म नहीं बनने देती।
ऋषिकेश मुखर्जी की विशेषता केवल गंभीर विषयों तक सीमित नहीं थी। ‘बावर्ची’, ‘चुपके-चुपके’ और ‘गोलमाल’ में उन्होंने हास्य के जरिए उसी मध्यवर्गीय जीवन को देखा, जिसे उनकी गंभीर फिल्मों में संवेदना के साथ देखा गया था। ‘बावर्ची’ में एक बिखरे हुए परिवार में एक साधारण-सा व्यक्ति आत्मीयता लौटा देता है; कहानी के बहाने फिल्म यह बताती है कि परिवार केवल एक छत के नीचे रहने का नाम नहीं। ‘चुपके-चुपके’ में भाषा, पहचान और सामाजिक औपचारिकताएँ हास्य पैदा करती हैं, जबकि ‘गोलमाल’ में नौकरी और सामाजिक प्रतिष्ठा के दबाव के बीच अपनी पहचान बनाए रखने की विडंबना सामने आती है। यहाँ हास्य केवल हँसाता नहीं, मध्यवर्गीय जीवन की आदतों और बनावटी गंभीरताओं को हल्के हाथ से खोलता है।
यही ऋषिकेश मुखर्जी के सिनेमा की असली व्यापकता है। ‘आनंद’ में मृत्यु के बीच जीवन है, ‘सत्यकाम’ में आदर्श और यथार्थ का संघर्ष, ‘अभिमान’ में रिश्ते और अहं का द्वंद्व, ‘गुड्डी’ में कल्पना और यथार्थ का अंतर, ‘मिली’ में बीमारी के बीच जीवन की जिजीविषा और उनकी हास्य फिल्मों में रोजमर्रा के जीवन की विसंगतियाँ। विषय बदलते रहे, लेकिन उनकी दृष्टि का केंद्र नहीं बदला—वह था मनुष्य।
वे अपने पात्रों को न पूरी तरह आदर्श बनाते थे, न खलनायक। उनकी कमजोरियों के पीछे भी कोई मानवीय कारण होता था और उनकी अच्छाइयों में भी जीवन की जटिलता। शायद यही कारण है कि ऋषिकेश मुखर्जी के चरित्र केवल फिल्म की कहानी पूरी होने तक हमारे साथ नहीं रहते, बल्कि उसके बाद भी हमारे भीतर कुछ छोड़ जाते हैं।
ऋषिकेश मुखर्जी का सिनेमा इसलिए याद नहीं रहता कि उसने हमें केवल अच्छी कहानियाँ दीं; वह इसलिए याद रहता है कि उसने हमें अपने आसपास के लोगों को थोड़ा अधिक समझना और अपने भीतर के मनुष्य को थोड़ा अधिक पहचानना सिखाया। उनके पात्र चले गए, उनकी कहानियाँ समाप्त हो गईं, पर उनकी संवेदना आज भी हमारे साथ चलती है।
ऋषि दा का जाना एक फिल्मकार का जाना था, लेकिन उनका सिनेमा आज भी जीवन के पर्दे पर चलता हुआ वह दृश्य है, जिसमें हमें बार-बार अपना चेहरा दिखाई देता है। यही किसी रचनाकार की सबसे गहरी स्मृति है—वह स्वयं अनुपस्थित होकर भी हमारी संवेदना में उपस्थित रहे।
ऋषि दा को विनम्र स्मरण।
डॉ. साकेत सहाय ©️