‘हिंदी सबकी, फिर ‘हिंदीतर’ कौन?’
डॉ. साकेत सहाय
यह बात उचित है कि भारतीय भाषाओं के बीच संवाद एकतरफा नहीं, बल्कि पारस्परिक होना चाहिए। अंग्रेजी दैनिक ‘द हिंदू’ का हिंदी में सामग्री उपलब्ध कराना उसके व्यावसायिक विस्तार की रणनीति का हिस्सा हो सकता है, लेकिन भारतीय भाषाओं के बीच संवाद और समन्वय की दृष्टि से यह स्वागतयोग्य पहल है। द इंडियन एक्सप्रेस भी हिंदी में सामग्री उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रहा है।
मैंने अपने अनेक आलेखों और पुस्तकीय अध्यायों में इस आवश्यकता पर जोर दिया है कि हिंदी में एक ऐसे अखिल भारतीय समाचार-पत्र का प्रकाशन और प्रसार होना चाहिए, जो हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं के पाठकों तक पहुँचे। ऐसा समाचार-पत्र केवल हिंदी भाषी समाज की खबरों तक सीमित न रहे, बल्कि देश के विभिन्न भाषाई क्षेत्रों की खबरों, विचारों, ज्ञान-विज्ञान और सांस्कृतिक गतिविधियों को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाए।
अंग्रेजी दैनिकों द्वारा हिंदी में सामग्री उपलब्ध कराने की पहल इसी व्यापक आवश्यकता की ओर संकेत करती है। भाषाई समन्वय का अर्थ किसी एक भाषा का दूसरी भाषा तक पहुँचना भर नहीं, बल्कि सभी भाषाओं के बीच संवाद के रास्ते खोलना है। अनुवाद, डिजिटल तकनीक और पत्रकारिता इस दिशा में प्रभावी माध्यम बन सकते हैं।
हालाँकि, यहाँ एक महत्त्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। राजभाषा और व्यापक राष्ट्रीय संपर्क-व्यवहार की भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका विशिष्ट है। इस भूमिका को स्वीकार करना अन्य भारतीय भाषाओं के महत्त्व को कम करना नहीं है। हिंदी की व्यापक पहुँच का उपयोग भारतीय भाषाओं के बीच संवाद बढ़ाने, उनके ज्ञान-संसार को साझा करने और राष्ट्रीय विमर्श को अधिक समावेशी बनाने के लिए किया जा सकता है।
राष्ट्रीय संपर्क की अग्रणी भाषा के रूप में हिंदी का सम्मान और प्रसार केवल राजनीतिक नारों, परस्पर द्वेष, द्वंद्व या विवाद से नहीं होगा। इसके लिए आवश्यक है कि देशवासियों को हिंदी में सूचना, ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और विचारों की सहज उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। भाषा का वास्तविक विस्तार तभी होता है, जब वह लोगों के जीवन, शिक्षा, रोजगार, कारोबार और ज्ञानार्जन में उपयोगी बनती है।
भारतीय भाषाओं का भविष्य हिंदी से प्रतिस्पर्धा में नहीं, बल्कि सहकार में है; अंग्रेजी के एकाधिकार में नहीं, बल्कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की सहभागिता में है। यही भाषाई समन्वय विकसित भारत की सांस्कृतिक और ज्ञानात्मक शक्ति बन सकता है।
‘हिंदीतर’ शब्द की अवधारणा पर पुनर्विचार
हिंदी किसी एक प्रदेश की भाषा नहीं, बल्कि पूरे भारत की साझी भाषाई विरासत और व्यापक संपर्क-व्यवहार की भाषा है। उसका विस्तार किसी क्षेत्र विशेष की सीमाओं में नहीं, बल्कि भारत के विविध भाषाई और सांस्कृतिक परिवेश में है। इसीलिए ‘हिंदीतर’ शब्द के प्रयोग और उसकी व्याख्या पर सावधानीपूर्वक विचार करने की आवश्यकता है।
प्रशासनिक संदर्भ में ‘हिंदीतर’ का अर्थ हिंदी के अतिरिक्त अन्य भाषाओं से हो सकता है। इस शब्द का अर्थ न तो उन भाषाओं को हिंदी से कमतर ठहराना है, न उन्हें हिंदी की उपश्रेणी मानना और न ही उनकी अलग सांस्कृतिक पहचान को नकारना। फिर भी, इसके सामान्य प्रयोग से एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है—जब हिंदी किसी एक प्रदेश या भाषाई समुदाय की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय संपर्क की साझी भाषा है, तो ‘हिंदीतर’ कौन है और ‘हिंदी वाला’ कौन?
राजभाषा के रूप में हिंदी की संवैधानिक भूमिका क्या है? स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय संपर्क और जनजागरण में हिंदी की भूमिका क्या रही? और जब हिंदी का सामाजिक आधार विभिन्न भाषाई क्षेत्रों तक विस्तृत है, तब उसे ‘हिंदी’ और ‘हिंदीतर’ के दो खेमों में बाँटकर देखने की आवश्यकता क्यों हो?
निस्संदेह, प्रशासनिक और सांख्यिकीय प्रयोजनों के लिए भाषाओं का वर्गीकरण आवश्यक हो सकता है। किंतु प्रशासनिक सुविधा के लिए प्रयुक्त किसी शब्द को सामाजिक दूरी या भाषाई विभाजन का आधार नहीं बनना चाहिए। शब्दों का चयन ऐसा हो, जो भाषाओं के पारस्परिक संबंध को स्पष्ट करे, न कि अनावश्यक विभाजन की धारणा पैदा करे।
हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के संबंध को ‘हिंदी बनाम हिंदीतर’ के चश्मे से देखने के बजाय पारस्परिक संवाद, सहभागिता और सह-अस्तित्व के संदर्भ में देखना अधिक उचित है। हिंदी का प्रसार किसी दूसरी भारतीय भाषा के संकुचन की शर्त पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और साझा अभिव्यक्ति की भावना के साथ होना चाहिए।
राष्ट्रहित में आवश्यक है कि हिंदी व्यापक संपर्क और साझा अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बने तथा प्रत्येक भारतीय भाषा को अपनी अस्मिता, सामर्थ्य और विकास के समान अवसर मिलें।
हिंदी की व्यापकता भारतीय भाषाओं से उसकी दूरी में नहीं, बल्कि उन्हें जोड़ने की उसकी क्षमता में है। यही भारतीय भाषाई समन्वय की वास्तविक भावना है।
जय हिंद! जय हिंदी!!

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