Monday, March 28, 2022

आखिर अंतर रह ही गया....

आखिर अंतर रह ही गया ..... 

बचपन में जब हम सभी रेलगाड़ी या बस से यात्रा करते थे, तो माँ घर से खाना बनाकर देती थी, पर रेलगाड़ी में कुछ लोगों को जब खाना खरीद कर खाते देखता तो बड़ा मन करता हम भी कुछ खरीद कर खाए l तो बाबुजी समझाया करते यह हमारे बस का नहीं, यह सब स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं, बाहर का खाना, स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं होता आदि-आदि। पर मन में आता, अमीर लोग जिस प्रकार से पैसे खर्च कर सकते हैं, हम नहीं। बड़े हुए तो देखा, जब हम खाना खरीद कर खा रहे हैं, तो लोग घर का भोजन ले जा रहे हैं और यह "स्वस्थ रहने के लिए" आवश्यक है।

आखिर में अंतर रह ही गया .... 

 बचपन में जब हम सब सूती कपड़ा पहनते थे, तब कुछ लोग टेरीलोन का कपड़ा पहनते थे l बड़ा मन करता था पर बाबुजी कहते हम इतना खर्च नहीँ कर सकते l बड़े होकर जब हम टेरीलोन पहने लगे तब वे लोग सूती के कपड़े पहनने लगे l सूती कपड़े समय के साथ महंगे हो गए l हम अब उतने खर्च नहीं कर सकते l 

आखिर अंतर रह ही गया.... 

बचपन में जब खेलते-खेलते हमारी पतलून घुटनों के पास से फट जाती, तो माँ बड़ी ही कारीगरी से उसे रफू कर देती और हम खुश हो जाते l बस उठते-बैठते अपने हाथों से घुटनों के पास का वो रफू वाला हिस्सा ढक लेते l बड़े होकर देखा तो लोग घुटनों के पास फटे पतलून महंगे दामों में बड़े दुकानों से खरीदकर पहन रहे हैं l 

आखिर अंतर रह ही गया... 

 बचपन में जब हम बड़ी मुश्किल से साइकिल से आ पाते, तब वे स्कूटर पर जाते l जब हम स्कूटर खरीदे, वो कार की सवारी करने लगे और जब तक हम मारुति खरीदे, तो वे बीएमडब्लू पर जाते दिखे । 

आखिर अंतर रह ही गया.... 

और जब हम सेवानिवृत्ति के पैसे से अंतर मिटाने हेतु बड़ी गाड़ी खरीदे तो स्वस्थ रहने के लिये ये साइक्लिंग करते नज़र आये। 

आखिर अंतर रह ही गया... 

अंत में, यह कहा जा सकता है कि हर परिस्थिति में, हर क्षण में दो लोगो में अंतर रह ही जाता है, यह अंतर सतत है, सनातन है, सदा-सर्वदा रहेगा, कभी-भी दो व्यक्ति और दो परिस्थितियां एक-समान नहीं हो सकती। अतः परिस्थितियां सम हो या विषम, हर हाल में प्रसन्न रहें..। 

संकलन एवं संपादन- डाॅ साकेत सहाय

Monday, March 21, 2022

विश्व कविता दिवस पर विशेष

मैं रचनाशील होने का निरंतर प्रयास करता रहता हूँ । इसी भाव के साथ दो वर्ष पूर्व विश्व कविता दिवस के ही अवसर पर जीवन के रंगमंच पर सक्रिय कवियों को समर्पित एक कविता लिखी थी, वास्तव में कविता के बहाने रचनाकार अपनी मानवीय भावनाओं को विस्तार देता है। कविता आप सभी के समक्ष है। इस पर आप सभी अपना विचार देंगे तो अच्छा लगेगा... 

 कविता साहित्य की आत्मा है कविता 

©डॉ साकेत सहाय 

 साहित्य की आत्मा है कविता 

मन और आत्मा का मिलन है कविता 

जीवन का भाव-बोध है कविता 

कविता चेतना है 

कविता जीवन है 

कविता पशुता में मानवता का रंग है 

समाज की संवेदना है कविता 

दिल की अरमान है कविता 

जीवन के पंख की उड़ान है कविता 

रिश्तों की उड़ान है कविता 

माँ के लिए बच्चों की उड़ान है कविता 

पिता के लिए परिवार की समृद्धि है कविता 

भाई के लिए बहन की खुशी है कविता 

बहन के लिए भाई की समृद्धि है कविता 

पति के लिए पत्नी का प्यार 

पत्नी के लिए पति की खुशी 

 पत्थर से पत्थर रगड़कर हुई 

आग के आविष्कार का नाम है कविता

कृषक के पसीने से सिंचित फसल का नाम है कविता

चिकित्सक के शोध का भाव बोध है कविता 

देश के लिए उसके निवासियों की पहचान है कविता 

प्रभु द्वारा शबरी के जूठे बेर का प्रेम-बोध है कविता 

श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता का नाम है कविता 

विक्रम और वैताल के धैर्य और चातुर्य का मेल है कविता 

अकबर के प्रश्न और बीरबल के समाधान का नाम है कविता 

 कविता रंग है 

कविता भाव है 

कविता जीवन बोध है। 

 ********* 

©डॉ साकेत सहाय 

Hindisewi@gmail.com

Saturday, March 19, 2022

विक्रमादित्य हेमू की समाधि का अतिक्रमण


आपको इतिहास की किताबों ने ये तो बताया होगा कि हुमायूँ के बाद शेरशाह सूरी दिल्ली की गद्दी पर काबिज हुआ, इन्हीं किताबों में आपने ये भी पढ़ा होगा कि हुमायूं ने किसी मल्लाह या भिस्ती को एक दिन के लिये राज सौंपा था जिसने चमड़े के सिक्के चलाये थे, उन्हीं किताबों में आपने शायद ये भी पढ़ा हो कि पृथ्वीराज चौहान दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाले अंतिम हिन्दू राजा थे पर इतिहास की किसी किताब ने ढ़ंग से आपको ये नहीं बताया होगा कि शेरशाह सूरी और अकबर के बीच दिल्ली की गद्दी पर पूरे वैदिक रीति से राज्याभिषेक करवाते हुए एक हिन्दू सम्राट भी राज्यासीन हुए थे जिन्होंने 350 साल के इस्लामी शासन को उखाड़ फेंका था, इन किताबों ने आपको नहीं बताया होगा कि दिल्ली की गद्दी पर बैठने के बाद मध्यकालीन भारत के इस अंतिम हिन्दू सम्राट ने "विक्रमादित्य" की उपाधि धारण की थी, अपने नाम के सिक्के चलवाये थे और गो-हत्यारे के लिये मृत्युदंड की घोषणा की थी, इन्होंनें आपको ये भी नहीं बताया होगा कि इस पराक्रमी शासक ने अपने जीवन में 24 युद्ध का नेतृत्व करते हुए 22 में विजय पाई थी। जाहिर है उस सम्राट के बारे में न तो हमें इतिहास की किताबों ने बताया और न ही हमारे इतिहास के शिक्षकों ने हमें पढ़ाया तो फिर कुछ पता हो भी तो कैसे हो? एक गरीब के घर में एक पुत्र पैदा हुआ था जो अपनी योग्यता और लगन से 1553 में सूरी सल्तनत के मुख्य सेनापति से लेकर प्रधानमंत्री के ओहदे तक पहुँच गया था। 1555 ईस्वी में जब मुगल सम्राट हूमायूं की मृत्यु हुई थी उस समय वो बंगाल में थे और वहीं से वो मुगलों को भारत भूमि से खदेड़ने के इरादे से सेना लेकर दिल्ली चल पड़े और मुगलों को धूल चटाते हुए 7 अक्टूबर 1556 को दिल्ली के सिंहासन पर विराजमान हुये। दिल्ली के पुराने किले ने सैकड़ों साल बाद पूर्ण वैदिक रीति से एक हिन्दू सम्राट का राज्याभिषेक होते देखा। हेमू ने राज्याभिषेक के बाद अजातशत्रु सम्राट विक्रमादित्य के नाम पर 'हेमचंद विक्रमादित्य' की उपाधि धारण की। उनके सिंहासनरूढ़ होने के एक महीने बाद ही अकबर ने एक बड़ी भारी सेना उनके खिलाफ भेजी। महान पराक्रमी हेमू ने पानीपत के इस दूसरे युद्ध में अकबर की सेना में कोहराम मचा दिया पर धोखे से किसी ने उनकी दायीं आँख में तीर मार दिया जिससे युद्ध का पासा पलट गया और हेमू हार गये। 5 नवंबर 1556 का दिन भारत के लिये दुर्भाग्य लेकर आया, अकबर के जालिम सलाहकार बैरम खान ने इस अंतिम हिन्दू सम्राट को कलमा पढ़ने को कहा और उनके इंकार के बाद उनका सर कलम करवा दिया। कहा जाता है कि पानीपत की दूसरी लड़ाई के बाद जब अकबर ने घायल हेमू के सर कलम का आदेश दिया था तब हेमू के पराक्रम से परिचित उसके किसी भी सैनिक में ये हिम्मत नहीं थी कि वो हेमू का सर काट सके। इन बुजदिलों ने हेमू की बर्बर हत्या करने के बाद उनके 80 वर्षीय पिता पूरनदास पर भी धर्म बदलने का दबाब डाला और इंकार करने पर उनकी भी हत्या करवा दी। अगर पानीपत के द्वितीय युद्ध में छल से प्रतापी सम्राट हेमू नहीं मारे जाते तो आज भारत का इतिहास कुछ और होता मगर हमारी बदनसीबी है कि हमें अपने इतिहास का न तो कुछ पता है न ही उसके बारे में कुछ जानने में कोई दिलचस्पी है इसलिये कोई इरफ़ान हबीब, विपिन चन्द्र या रोमिला थापर हमें कुछ भी पढ़ा जाता है और कोई भंसाली हमारे ऐतिहासिक चरित्रों के साथ बलात्कार करने की हिमाकत करता है। वो ऐसी हिमाकत इसलिये कर सकतें हैं क्योंकि उस सम्राट की हवेली जो रेवाड़ी के कुतुबपुर मुहल्ले में स्थित हैं वो आज बकरी और मुर्गी पालन के काम आ रही है और ताजा खबर ये है कि उसपर एक मजार बना दिया गया है। और इधर हम मुगलों और आक्रांताओं के मजारों, गुसलखानों और हरमखानों का हर साल रंग-रोगन करवा रहें हैं। उनको विस्मृत करने के पाप के परिमार्जन के लिये आवश्यक है कि चूँकि हमारे दोगले इतिहासकार तो हेमू को यथोचित स्थान देने से रहे इसलिये आखिरी हिंदू सम्राट 'हेमचंद विक्रमादित्य' के बारे में खुद भी पढ़िए, अपने बच्चों को भी पढ़ाइये, इतिहासकारों की गर्दनें दबोच कर हेमू की उपेक्षा पर उनसे सवाल पूछिए और हो सके तो जो लोग ट्वीटर पर सक्रिय है वो उनकी समाधि के अवैध अतिक्रमण हटाने को लेकर सरकार से मांग करें। वर्ना भंसालियों और हबीबों द्वारा अपमानित होने वाली सूची में माँ पद्मिनी अंतिम नहीं थीं, ये किसी दिन हेमू को भी मुग़ल दरबार का गुलाम बनाकर अपने फ़िल्मी बाजार में बेच देंगे। 

 (चित्र में हेमू की समाधि जो अब दरगाह में बदली जा चुकी है)

Wednesday, March 16, 2022

अरबी व्याकरण के निर्माण में संस्कृत व्याकरण परंपरा का योगदान

 "अरबी व्याकरण के निर्माण में संस्कृत व्याकरण परम्परा का योगदान"

-  आचार्य  बलराम शुक्ल 

 फ़ारसी विभाग, दि॰वि॰वि॰ तथा इ॰गा॰रा॰क॰केन्द्र द्वारा आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में आज १५.०३.२०२२ को एक महत्त्वपूर्ण विषय पर चर्चा का अवसर मिला, जिसका सार यह है कि अरबी भाषा के व्याकरण संस्कृत वैयाकरणों के मॉडल पर तैयार किये गये थे। प्रायः यह समझा जाता है कि दर्शन तथा चिकित्साशास्त्र इत्यादि विद्यास्थानों की तरह अरबों ने अपने व्याकरण के प्रतिदर्श तथा तकनीकें भी यूनानी अथवा लातीनी मूल ग्रन्थों अथवा उनके अनुवादों से प्राप्त कीं। परन्तु वास्तविकता इससे भिन्न ही है। प्रसिद्ध ईरानी भारतविद् प्रो॰ फ़त्हुल्लाह मुज्तबाई ने अपनी पुस्तक “नह्वे हिन्दी व नह्वे अरबी: हमानन्दी–हा दर ता,रीफ़ात, इस्तिलाहात व तर्हे क़वायद” (भारतीय तथा अरबी व्याकरण: पारिभाषिक, शब्दावलीगत तथा तकनीकी समानताएँ ) में पाश्चात्त्य विद्वानों की इस धारणा का बहुत सारे शोधपूर्ण तर्कों के द्वारा खण्डन किया है। यह पुस्तक भारतीय व्याकरण शास्त्र के विश्व विजय के एक महत्त्वपूर्ण सोपान का डिण्डिमघोष करती है। मुस्लिम विद्वानों के पास अरबी भाषा के लिए व्याकरण बनाने का प्रतिदर्श न तो अरबों से आया था (क्योंकि उनके पास इसकी परम्परा नहीं थी) और न ही यूनानियों से (क्योंकि उनके व्याकरण इतने विकसित नहीं थे)। प्रश्न उठता है कि उनके पास व्याकरण का प्रतिदर्श आया कहाँ से? क्योंकि स्वयं पारसियों के पास अवेस्ता या पुरानी फ़ारसी का अन्वाख्यान करने वाला कोई व्याकरण ग्रन्थ नहीं था। अनेकानेक प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि यह प्रतिदर्श उन्होंने भारतीयों से प्राप्त किया था और वह प्रतिदर्श संस्कृत व्याकरण का था। अरबी भाषा के प्रारम्भिक व्याकरण उन ईरानी विद्वानों के द्वारा लिखे गए हैं जो ईरान के सीमावर्ती ख़ुरासान प्रान्त के रहने वाले थे तथा भारतीय व्याकरण की प्रविधियों से परिचित थे। ध्यातव्य है कि बौद्ध संस्कृति इस्लाम के आगमन से पहले ईरान के पूर्वी सीमाओं पर सीस्तान और मकरान से लेकर बल्ख, समरकन्द और बुख़ारा तक फैली हुई थी। उनमें रहने वाले ईरानी विद्वानों का संस्कृत व्याकरण (सम्भवतः कातन्त्र) से प्रगाढ परिचय था। संस्कृत तथा उसकी सुग़्दी और ख़ुतनी भाषाओं में हुए अनुवादों की पाण्डुलिपियों के जो भण्डार मध्य एशिया में मिले हैं उनसे इन प्रदेशों में भारतीय ज्ञान विज्ञान के प्रचलित होने का प्रमाण मिलता है। इन पुस्तकों में प्रायः सभी सामग्री बौद्ध धर्म के ग्रन्थ हैं लेकिन उनके बीच ज्योतिष तथा आयुर्वेद की किताबों के साथ संस्कृत व्याकरण की पुस्तक के अंश भी मिले हैं। ऐसा लगता है कि इस क्षेत्र के बौद्ध इरानियों ने इस्लाम के विजय के बाद इस नये धर्म को स्वीकार करने के साथ स्वयं इस्लामी जगत् में इन प्राचीन कला और विज्ञान के प्रसार के साधन बन गये। (मु॰५६)। यहाँ तक कि इस्लाम के शुरुआती काल में ७८ हिजरी तक ईराक़ में तथा१२४ हिजरी तक ख़ुरासान में आर्थिक विभाग और महासिबात की भाषा फ़ारसी थी और वह फ़ारसी कर्णिकों के हाथ में थी(मु॰६०)। बाद में धर्म परिवर्तन के बाद इन्हीं विद्वानों ने "मवाली" अथवा "मुल्ला" के नाम से ख़िलाफ़त के दीवानी और दौलती कामों को अपने हाथों में ले लिया। यही मवाली लोग अथवा उनकी सन्तानें अरबी के शुरुआती वैयाकरण थे। अरबी व्याकरण इन्हीं के माध्यम से प्रारम्भ होकर अपनी पूर्णता को प्राप्त हुआ। ध्यान देने की बात है कि अरबी के इल्मे क़िराअत (क़ुरान के पाठ करने की विद्या) और व्याकरण के प्राथमिक चार आचार्य जिन्हें इस विद्या की नींव डालने वाला माना जाता है वे इन्हीं मवालियों में से थे- नस्र बिन आसिम (मृ॰८९), याह्या बिन या,म्र (मृ॰१२९), अब्दुल्लाह बिन अबू इसहाक (मृ॰११७), अब्दुर्रहमान बिन हुर्मुज़ (मृ॰ १२९) (मु॰६१)। –––––––––––––––– अनेक तर्कों से प्रो॰ मुज्तबाई यह सिद्ध कर सके हैं कि अरबी व्याकरण की रचना संस्कृत व्याकरण के प्रभाव से ही हो सकी थी। फ़ारसी में लिखी यह पुस्तक भारतीय लोगों के लिए इतनी महत्त्वपूर्ण है कि उसका अविकल अनुवाद अत्यन्त अपेक्षित है। 

साभार  आचार्य डॉ.बलराम शुक्ल जी का आलेख

Tuesday, March 15, 2022

साहित्य अकादेमी, हिंदी और शशि थरुर




हम भारतीय निश्चय ही आत्महीनता के दौर से गुजर रहे हैं । आप सभी को जरूर याद होगा लोक सभा में 'राष्ट्रभाषा' हिंदी को लेकर माननीय सांसद शशि थरुर जी द्वारा की गयी टिप्पणी । क्या भारत सरकार से पोषित 'साहित्य अकादेमी' को कोई और नहीं मिला इस हिंदी द्रोही के अलावे अपने वार्षिक आयोजन में अतिथि बनाने को। वास्तव में हम अपनी भाषाओं को लेकर ढकोसलों से ऊपर उठ ही नहीं पाते। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम अपनी भाषाओं के प्रति ना संविधान सम्मत हैं, न राष्ट्र सम्मत और ना लोक सम्मत। भगवान ही मालिक है भारतीय भाषाओं का.... क्योंकि जो व्यक्ति अपनी राष्ट्र भाषाओं का सम्मान नहीं कर सकता, उसे क्या हक है साहित्य और संस्कृति पर बोलने का आलेख संलग्न है टिप्पणी के ऊपर। 'स्वाभिमान, सम्मान की भाषा है हिंदी' धन्यवाद अमृत विचार दिनांक 11.02.2022 


#साकेत_विचार 

 #साहित्य_अकादेमी

मान्यवर कांशीराम




आज प्रख्यात भारतीय राजनीतिज्ञ एवं भारतीय समाज के एक बड़े वर्ग के अधिकारों एवं कर्तव्यों के लिए आवाज बुलंद करने वाले मान्यवर कांशीराम (15 मार्च, 1934 – 09 अक्टूबर 2006) की जयंती हैं । कांशीराम जी सत्ता में वंचितों की भागीदारी के सबसे बड़े समर्थक थे। पर आधुनिक रुप में नहीं जहां दलितों के आवाज के नाम पर समाज में कपोल-कल्पित अवधारणाएं स्थापित की जा रही है । कथित मनुवादी भय दिखाकर सनातन समाज को बांटने का कार्य किया जा रहा है। कांशीराम जी ने संतुलित धारा के साथ कार्य किया। वे अविभाजित भारत के उस प्रांत में जन्में, जहां अनुसूचित जातियों की बड़ी आबादी निवास करती थीं। उन्होंने सरकारी नौकरियों में इस वर्ग को आवाज देने हेतु बामसेफ का गठन किया। आज दलित विमर्श के नाम पर सनातन परंपराओं को विभाजनकारी मानसिकता के तहत गाली देने का षड्यंत्र चल रहा है । जरूरत है इससे बचने की। क्योंकि सामाजिक सुधार का मतलब उत्थान होता है न कि किसी वर्ग को हर वक्त गाली देना। इससे विरोध और संघर्ष पनपता है। समाज सार्थक संघर्ष एवं समन्वय से मजबूत होता है। जय भीम, जय मीम से ज्यादा जरूरी है 'जय भारत' की । इसी संदर्भ में एक बात उल्लेखनीय है भारत के कई अनुसूचित जाति के शिक्षक जो विश्वविद्यालयों, संस्थानों में उच्च पदों पर नियुक्त हैं वे कैसे दलित हो सकते है? दुर्भाग्य यह है कि वे भी उसी प्रकार का वर्गवादी आचरण करते हैं जिस मानसिकता की वजह से कथित ब्राहमणवाद पनपा। अतः समाज की सशक्तता के लिए यह जरूरी है कि हम समरसता के लिए कार्य करें । वैसे दलित, वंचित कोई भी हो सकता है। आज कुछ बड़े नेता दलित नेता बनकर अपने हित साध रहे हैं । सबसे अधिक दुर्भाग्य की बात यह है कि शिक्षण संस्थानों में यह ज़हर सबसे अधिक व्याप्त है। अब ऐसे जहर से शिक्षण संस्थानों का कितना भला होगा? ऐसी सोच से बच्चों में किस प्रकार की सोच निर्मित होगी। कभी गौतम बुद्ध क्षत्रिय होकर भी दलित समर्थक हो जाते है। पर अंबेडकर जी का सुपुत्र ब्राह्मण महिला से उत्पन्न होकर भी दलित रहता है। यह कौन सी स्वार्थ नीति है? कभी बाबा साहेब की तस्वीर का विकृत उपयोग विद्यालयों में मानक गणवेश के कारण 'हिजाब' की मनाही होने पर स्वार्थी तत्वों द्वा रा किया जाता है पर बाद में इसी संविधान के आधार पर विद्यार्थियों को समान गणवेश के कारण जब उच्च न्यायालय 'हिजाब' पहनने की मनाही करता है तो बाबा साहब अंबेडकर सिरे से गायब हो जाते है। इस प्रकार की सुविधा की राजनीति उनकी नहीं थी। कांशीराम जी की जयंती पर इन बिंदुओं पर विचार करने की जरूरत है। यही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी। #साकेत_विचार #कांशीराम

Thursday, March 3, 2022

महादेव

 

आडंबरविहीन सनातन आस्था के प्रतीक 



महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामना। जय जय भोलेनाथ 

 *🍃🌸 - : रुद्राष्टकम : - 🌸🍃*

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं

विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं

चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम

हे भगवन ईशान को मेरा प्रणाम ऐसे भगवान जो कि निर्वाण रूप हैं जो कि महान ॐ के दाता हैं जो सम्पूर्ण ब्रह्माण में व्यापत हैं जो अपने आपको धारण किये हुए हैं जिनके सामने गुण अवगुण का कोई महत्व नहीं, जिनका कोई विकल्प नहीं, जो निष्पक्ष हैं जिनका आकर आकाश के सामान हैं जिसे मापा नहीं जा सकता उनकी मैं उपासना करता हूँ | *निराकारमोङ्करमूल* *तुरीयं* *गिराज्ञानगोतीतमीशं* *गिरीशम्* । *करालं महाकालकालं कृपालं* *गुणागारसंसारपारं* *नतोहम* जिनका कोई आकार नहीं, जो ॐ के मूल हैं, जिनका कोई राज्य नहीं, जो गिरी के वासी हैं, जो कि सभी ज्ञान, शब्द से परे हैं, जो कि कैलाश के स्वामी हैं, जिनका रूप भयावह हैं, जो कि काल के स्वामी हैं, जो उदार एवम् दयालु हैं, जो गुणों का खजाना हैं, जो पुरे संसार के परे हैं उनके सामने मैं नत मस्तक हूँ। *तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभिरं* *मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम् ।* *स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा* *लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा* जो कि बर्फ के समान शील हैं, जिनका मुख सुंदर हैं, जो गौर रंग के हैं जो गहन चिंतन में हैं, जो सभी प्राणियों के मन में हैं, जिनका वैभव अपार हैं, जिनकी देह सुंदर हैं, जिनके मस्तक पर तेज हैं जिनकी जटाओ में लहलहारती गंगा हैं, जिनके चमकते हुए मस्तक पर चाँद हैं, और जिनके कंठ पर सर्प का वास हैं | 

 *चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं* 

 *प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।

* *मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं* 

 *प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि* 

 जिनके कानों में बालियाँ हैं, जिनकी सुन्दर भोहे और बड़ी-बड़ी आँखे हैं जिनके चेहरे पर सुख का भाव हैं जिनके कंठ में विष का वास हैं जो दयालु हैं, जिनके वस्त्र शेर की खाल हैं, जिनके गले में मुंड की माला हैं ऐसे प्रिय शंकर पुरे संसार के नाथ हैं उनको मैं पूजता हूँ | *प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं* *अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं ।* *त्र्यःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं* *भजेहं भवानीपतिं भावगम्यम* जो भयंकर हैं, जो परिपक्व साहसी हैं, जो श्रेष्ठ हैं अखंड है जो अजन्मे हैं जो सहस्त्र सूर्य के सामान प्रकाशवान हैं जिनके पास त्रिशूल हैं जिनका कोई मूल नहीं हैं जिनमे किसी भी मूल का नाश करने की शक्ति हैं ऐसे त्रिशूल धारी माँ भगवती के पति जो प्रेम से जीते जा सकते हैं उन्हें मैं वन्दन करता हूँ |

 *कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी* 

 *सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी* । 

 *चिदानन्दसंदोह मोहापहारी*

 *प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी* 

 जो काल के बंधे नहीं हैं, जो कल्याणकारी हैं, जो विनाशक भी हैं,जो हमेशा आशीर्वाद देते है और धर्म का साथ देते हैं , जो अधर्मी का नाश करते हैं, जो चित्त का आनंद हैं, जो जूनून हैं जो मुझसे खुश रहे ऐसे भगवान जो कामदेव नाशी हैं उन्हें मेरा प्रणाम | *न यावद्* *उमानाथपादारविन्दं* *भजन्तीह लोके परे वा नराणाम*। *न तावत्सुखं शान्ति* *सन्तापनाशं* *प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं* जो यथावत नहीं हैं, ऐसे उमा पति के चरणों में कमल वन्दन करता हैं ऐसे भगवान को पूरे लोक के नर नारी पूजते हैं, जो सुख हैं, शांति हैं, जो सारे दुखो का नाश करते हैं जो सभी जगह वास करते हैं | *न जानामि योगं जपं नैव पूजां* *नतोहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम्*। *जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं* *प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो* मैं कुछ नहीं जानता, ना योग , ना ध्यान हैं देव के सामने मेरा मस्तक झुकता हैं, सभी संसारिक कष्टों, दुःख दर्द से मेरी रक्षा करे. मेरी बुढ़ापे के कष्टों से से रक्षा करें | मैं सदा ऐसे शिव शम्भु को प्रणाम करता हूँ | 

 *हर हर हर हर महादेव....🍃🌼👏🏼🚩*

सुब्रह्मण्यम भारती जयंती-भारतीय भाषा दिवस

आज महान कवि सुब्रमण्यम भारती जी की जयंती है।  आज 'भारतीय भाषा दिवस'  भी है। सुब्रमण्यम भारती प्रसिद्ध हिंदी-तमिल कवि थे, जिन्हें महा...