Wednesday, January 26, 2022

गणतंत्र दिवस की शुभकामना!





आज का दिन हम सभी के लिए बेहद खास हैं क्योंकि आज ही के दिन यानि 26 जनवरी,1950 को हमने अपना संविधान अपनाया और राष्ट्र निर्माण की तरफ अपने कदम बढ़ाए। आइए, आज हम अपने संविधान निर्माताओं द्वारा किए गए महान कार्य और उनकी दूरदर्शिता को नमन करें। 26 जनवरी एक ऐसा दिन है जब प्रत्येक भारतीय के मन में देश भक्ति की लहर और मातृभूमि के प्रति अपार स्नेह भर उठता है। ऐसी अनेक महत्त्वपूर्ण स्मृतियां हैं जो इस दिन के साथ जुड़ी हुई है। 26 जनवरी, 1950 को देश का संविधान लागू हुआ और इस प्रकार सदियों की पराधीनता के बाद दुनिया के समक्ष भारत एक संप्रभुताशाली, समाजवादी, लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में अस्तित्व में आया। गणतंत्र दिवस का अवसर हमें देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले महान शहीदों की याद दिलाता है। पहली बार 21 तोपों की सलामी के बाद राष्ट्रीय ध्वज को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने फहरा कर 26 जनवरी, 1950 को भारतीय गणतंत्र के ऐतिहासिक जन्म की घो‍षणा की। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति ने देश के पहले गणतंत्र दिवस के अवसर पर नागरिकों को जारी अपने संदेश में कहा :-

 "हमें स्वयं को आज के दिन एक शांतिपूर्ण किंतु एक ऐसे सपने को साकार करने के प्रति पुन: समर्पित करना चाहिए, जिसने हमारे राष्ट्रपिता और स्वतंत्रता संग्राम के अनेक नेताओं और सैनिकों को अपने देश में एक वर्गहीन, सहकारी, मुक्त और प्रसन्नचित्त समाज की स्थापना के सपने को साकार करने की प्रेरणा दी। हमें इस दिन यह याद रखना चाहिए कि आज का दिन आनन्द मनाने की तुलना में समर्पण का दिन है– श्रमिकों और कामगारों परिश्रमियों और विचारकों को पूरी तरह से स्वतंत्र, प्रसन्न और सांस्कृतिक बनाने के भव्य कार्य के प्रति समर्पण करने का दिन है।"

 इसी मंगलकामना के साथ, 

 भारत की सर जमी यूं ही दुल्हन बनी रहे! 

सारे जहां में धूम हमारी मची रहे !! 

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामना ! 

वंदे मातरम्! 

@डा. साकेत सहाय

Saturday, January 22, 2022

खिचड़ी

खिचड़ी का इतिहास काफी पुराना है। इतना कि वेद और पुराण में भी इसका वर्णन मिलता है। लेकिन सबसे पहले इसे बिहार प्रदेश के भागलपुर के कोहलग्राम ( आज का कहलगांव) में पकाने के प्रमाण मिलता हैं।  कथा कुछ यूं है - ऋषि कोहल ने कोहलग्रम में तपस्या की थी और यह स्थान उनके सात्विक प्रभाव के कारण काफी वैभवशाली हो गया।  इसकी मान्यता पहले काशी एवम् कैलाश के बराबर थी।  फिर,ऋषि दुर्वासा ने यहां अपना आश्रम बनाया। पुराण कथाओं के अनुसार देव - असुर संग्राम दस हजार वर्षों तक चला और असुरों से लड़ते - लड़ते देवता कमजोर होने लगे। तो वे सभी दुर्वासा ऋषि के आश्रम में आए क्योंकि शिव भूमि होने के कारण वहां असुर प्रवेश नहीं कर सकते थे। उसी समय,देवताओं को तुरंत भोजन कराने के उद्देश्य से ऋषि दुर्वासा ने सभी अनाजों (दालों सहित) और सब्जियों को मिलाकर जल में पकाकर खिलाया था। सब कुछ मिश्रित होने  के कारण इस व्यंजन का नाम खिचड़ी रखा गया और उस दिन संक्रांति भी थी। तब से ,संक्रांति के दिन खिचड़ी खाने की प्रथा चल पड़ी और आज भी यह व्यंजन अपनी पौष्टिकता में अव्वल बना हुआ है। संकलन एवं संशोधन-लेखक

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस

जय हिंद! 





सच में इतिहास जनता लिखती है न कि इतिहासकार। नेताजी का भारत की जनता में स्वीकृति और स्मरण इसका स्पष्ट उदाहरण हैं । नेताजी भारत के जीवंत यौद्धा है। भले ही षडयंत्रकारी परिस्थितियों में उनका अवसान करार दिया गया, पर उनकी पूरी जीवनी त्याग, बलिदान, बुद्धिमता और शौर्य से भरपूर रहा। उनके लिए 'देश पहले' सर्वोच्च प्राथमिकता में सदैव शामिल रहा। उनके लिए पद, पैसा, रसूख से पहले देश रहा; पर देश उनके साथ पर्याप्त न्याय करने में असफल रहा।  गुलामी के प्रतीक जॉर्ज पंचम की मूर्ति के स्थान पर इंडिया गेट पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति लगाने के निर्णय हेतु सरकार का अभिनन्दन! 

यूं तो भारत 15 अगस्त, 1947 को ब्रिटिश पराधीनता से आजाद हुआ लेकिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 21 अक्टूबर, 1943 को ही भारत को आजाद घोषित किया था। उन्होंने अंग्रेजों की गुलामी को अस्वीकार करते हुए भारत में वैकल्पिक सरकार बनाई । नेताजी ने 1943 में स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार स्थापित की थी। नेताजी आजाद हिंद फौज के प्रमुख थे और उन्होंने अंडमान-निकोबार द्वीप में भारत का झंडा लहराया था। भले ही नेताजी निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री रहे ।  

उनकी बनाई आजाद भारत की सरकार को 11 देशों ने मान्यता भी दे दी थी। उन्होंने रिजर्व बैंक की तरह आजाद हिन्द बैंक का भी गठन कर उसकी करेंसी भी चलाई थीं । अंडमान के रॉस आईलैंड में उन्होंने तिरंगा झंडा फहराकर स्वाधीन भारत की घोषणा की। इसलिए रॉस आईलैंड का नया नामकरण भी उन्हीं के नाम पर किया गया था। 

“नेताजी” सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी, सन 1897 ई. में उड़ीसा के कटक में हुआ था। वे 6 बहनों और 8 भाइयों के परिवार में नौवीं संतान और पाँचवें बेटे थे। सुभाष बाबू का हृदय बचपन से ही भारतीयों के साथ अंग्रेज़ों द्वारा हो रहे अत्याचार को देखकर व्यथित रहता थाl उन्होंने इस भेदभावपूर्ण व्यवहार को देखकर एक बार अपने भाई से पूछा- “दादा कक्षा में आगे की सीटों पर हमें क्यों बैठने नहीं दिया जाता है?” नेताजी हमेशा जो भी कहा करते थे, पूरे आत्मविश्वास से कहते थे। स्कूल में अंग्रेज़ अध्यापक भी सुभाष के अंक देखकर हैरान रह जाते थे, उनकी मेधाविता  सभी को चकित करती थी।  एक बार जब बाल सुभाष को कक्षा में सबसे अधिक अंक लाने पर भी छात्रवृत्ति अंग्रेज़ बालक को दी गई, तो उन्होंने अपमानित महसूस किया और उन्होंने उस मिशनरी स्कूल को ही त्याग दिया।  उसी समय अरविंद घोष ने बोस बाबू से कहा- “हम में से प्रत्येक भारतीय को डायनेमो बनना चाहिए, जिससे कि हममें से यदि एक भी खड़ा हो जाए तो हमारे आस-पास हज़ारों व्यक्ति प्रकाशवान हो जाएँ।” उस दिन से अरविन्द जी के शब्द बोस बाबू के मस्तिष्क में सदैव गूंजा करते थे l उनके प्रेरणादायी शब्दों का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा और भारत माता को स्वतंत्र करवाना ही उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य बन गया l 

कोहिमा, नागालैंड के आक्रमण की विफलता पर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस भारत माता को ग़ुलामी की हथकड़ी पहने हुए देखते थे l वे देश भक्ति की भावना से प्रेरित होकर अंग्रेज़ी शिक्षा को निषेधात्मक शिक्षा मानते थे। किन्तु बोस जी को उनके पिता ने समझाया- हम भारतीय अंग्रेज़ों से जब तक प्रशासनिक पद नहीं छीनेंगे, तब तक देश का भला कैसे होगा।

अपने पिता से प्रेरणा लेकर नेताजी ने इंग्लैंड में जाकर आई. सी. एस. की परीक्षा उत्तीर्ण की। वे प्रतियोगिता में सिर्फ उत्तीर्ण ही नहीं हुए बल्कि चतुर्थ स्थान पर भी रहे। नेता जी एक बहुत मेधावी व प्रतिभावान छात्र थे। वे चाहते तो उच्च अधिकारी के पद पर सुशोभित हो सकते थे। परन्तु उनकी देश भक्ति की भावना ने उन्हें कुछ अलग करने के लिए हमेशा प्रेरित किया। बोस जी ने नौकरी से त्याग पत्र दे दिया और सारा देश हैरान रह गया l उन्हें अनेक प्रभावशाली व्यक्तियों द्वारा समझाते हुए कहा गया- तुम जानते भी हो कि तुम लाखों भारतीयों के सरताज़ होगे हज़ारों देशवासी तुम्हें नमन करेंगे? तब सुभाष चंद्र बोस ने कहा था – “मैं लोगों पर नहीं उनके दिलों पर राज्य करना चाहता हूँ। उनका हृदय सम्राट बनना चाहता हूँ।”  भारत की सामाजिक दशा पर उनके समकालीन विचार आज भी बड़े मूल्यवान है, उनका मानना था “हमारी सामाजिक स्थिति बदतर है, जाति-पाँति तो है ही, ग़रीब और अमीर की खाई भी समाज को बाँटे हुए है। निरक्षरता देश के लिए सबसे बड़ा अभिशाप है। इसके लिए संयुक्त प्रयासों की आवश्यकता है।”

देश प्रेम और पराक्रम से सुभाष चंद्र बोस समय के साथ भारतीयता की पहचान बनते जा रहे थे।  युवा पीढ़ी उनसे बहुत प्रभावित थीं। आज भी युवा उनसे सर्वाधिक प्रेरणा लेती हैं।  उनका नारा 'जय हिंद' आज भी सर्व भारतीय समाज की पहचान के रूप में स्थापित है।  उन्होंने कहा था कि- “स्वतंत्रता बलिदान चाहती है। आपने आज़ादी के लिए बहुत त्याग किया है, किन्तु अभी प्राणों की आहुति देना शेष है। आज़ादी को आज अपने शीश फूल चढ़ा देने वाले पागल पुजारियों की आवश्यकता है। ऐसे नौजवानों की आवश्यकता है, जो अपना सिर काट कर स्वाधीनता देवी को भेट चढ़ा सकें। “तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा”। इस वाक्य के जवाब में नौजवानों ने कहा- “हम अपना ख़ून देंगे।” उन्होंने आजाद हिंद फौज (आईएनए) को ‘दिल्ली चलो’ का नारा भी दिया था।

नेता जी के जीवन के अनेक पहलू सामाजिक जीवन में हमें एक नई ऊर्जा प्रदान करते हैं। वे एक सफल संगठनकर्ता भी थे। उनकी वक्तव्य शैली में जादू था और उन्होंने देश से बाहर रहकर ‘स्वतंत्रता आंदोलन’ चलाया। नेता जी मतभेद होने के बावज़ूद भी अपने साथियो का मान सम्मान रखते थे।

उन्होंने 21 अक्टूबर, 1943 को आजाद हिन्द अर्थात स्वतंत्र भारत की एक सरकार का भी गठन किया था। जिसे विश्व के 7 देशों ने मान्यता भी प्रदान की थी। वह सात देश थे-जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, इटली, मानसूकू और आयरलैंड। इस सरकार के पास अपना बैंक, डाक टिकट और झंडा भी था। हमारा तिरंगा जो तब से लेकर अब तक लगातार शान से लहरा रहा है। इस सरकार ने आपने नागरिकों के मध्य आपसी अभिवादन के समय ‘जय हिंद’ कहने का निर्णय भी लिया था।

सुभाष बोस स्वदेश प्रेम, दृढ़ता, त्याग, आत्मबल की साक्षात् प्रतिमूर्ति हैं । नेताजी भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रबल समर्थक रहे। उन्होंने अपना नारा भी जय हिंद के रूप में अपनाया। आजाद हिंद फौज के सेनानियों को वे हिंदी में संबोधित करते थे। देश के इस महान सेनानी की जन्म जयंती 'पराक्रम दिवस' पर शत शत नमन! 

ईश्वर इस पुण्यात्मा को भारत भूमि में बार-बार अवतरित करें । 

जय हिंद ! जय हिंदी !!

🙏 (डाॅ साकेत सहाय)

Tuesday, January 11, 2022

लाल बहादुर शास्त्री जी देशभक्त के साथ निष्ठावान ग्राहक भी रहे

जय जवान! जय किसान! 

पुण्यतिथि पर शत शत नमन! 

एक रोचक संस्मरण 



प्रधानमंत्री बनने के बाद भी शास्त्री जी के पास अपनी कार नही थी। जब वे फिएट कार खरीदने गए तो उनके पास 7000 रुपए थे,जबकि कार का मूल्य 12000 रुपये था तो उन्होंने भारत के स्वदेशी बैंक पंजाब नैशनल बैंक से शेष 5000 रुपए का ॠण लिया। बैंक के इस ॠण को लाल बहादुर शास्त्री जी के असामयिक निधन के बाद उनकी धर्मपत्नी ललिता शास्त्री जी ने चुकाया। उनकी पत्नी ने अपनी पेंशन से कार की सारी किस्तें लौटा दी। 

यह उनके ईमानदार ग्राहक होने का भी शानदार उदाहरण प्रस्तुत करता हैं !

Sunday, January 9, 2022

गुरु गोविन्द सिंह जयंती



आज गुरु गोविंद सिंह जी की जयंती है। हम भारतवासियों को उनके कृतित्व पर गर्व है। गुरु गोविन्द सिंह जी ने भारत में औपनिवेशिक अत्याचार के विरूद्ध तथा देश में सामाजिक-सांस्कृतिक-धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षार्थ सर्वोच्च बलिदान दिया। उनके बलिदान के प्रति सनातन समाज सदैव कृतज्ञ रहेगा। कभी स्वामी विवेकानन्द ने प्रत्येक भारतवासी का आह्वान करते हुए महावीर हनुमान और गुरु गोविन्द सिंह का आदर्श अपनाने के लिए कहा था। धार्मिक स्वतंत्रता को बनाए रखने के उनके दृष्टिकोण को शत-शत नमन! खालसा पंथ की स्थापना के द्वारा उन्होंने भारतीय सभ्यता-संस्कृति को अतीतगामी होने से बचाया और हम सभी को प्रेरित करने के लिए एक अद्वितीय विरासत छोड़ी। 🙏

#गुरुपर्व

#साकेत_विचार

Friday, January 7, 2022

प्रेमचन्द और वैचारिक साहित्य











प्रेमचन्द और वैचारिक साहित्य इस विषय पर बहुत कम चर्चा होती है। इसी शीर्षक से मेरा आलेख बिहार सरकार, राजभाषा विभाग की भाषा-साहित्य-संस्कृति की हिंदी त्रैमासिकी 'राजभाषा' के अंक : २, वर्ष: ३५, जुलाई-सितम्बर, २०२१ में प्रकाशित हुआ है। आप सभी पढ़कर विचार देंगे। प्रेमचन्द विशेषांक के रूप में बेहद संग्रहणीय अंक प्रकाशित करने हेतु मंत्रिमंडल सचिवालय (राजभाषा) विभाग का विशेष आभार। मेरा आलेख प्रेमचन्द जी के विराट लेखकीय व्यक्तित्व पर केंद्रित है। मैं अक्सर लिखता हूँ जो स्थान महात्मा गाँधी का आधुनिक भारतीय राजनीति में हैं वहीं स्थान आधुनिक भारतीय साहित्य में मुंशी प्रेमचंद जी का है । मुंशी प्रेमचंद लिखते हैं " मैं एक मजदूर हूँ। जिस दिन कुछ लिख न लूँ, उस दिन मुझे रोटी खाने का कोई हक नहीं।" वास्तव में लेखन के प्रति उनका यह समर्पण ही उन्हें भारतीय साहित्य में विशिष्टता प्रदान करता हैं । प्रेमचन्द जी ने हर प्रकार के साहित्य का सृजन किया, इसलिए वे साहित्य- शिल्पी कहे गए। सर्जनात्मक साहित्य के साथ-साथ प्रेमचंद का वैचारिक साहित्य बेहद समृद्ध है। हिंदी पत्रकारिता में हंस के रूप में उनके उल्लेखनीय योगदान को भला कौन भूल सकता है। प्रेमचंद अपने संपूर्ण वैचारिकी में पाठकों को जगाते हैं । उन्हें आदर्श राष्ट्र राज्य की प्राप्ति हेतु संघर्ष करने हेतु उद्वेलित करते हैं । प्रेमचन्द का साहित्य यथार्थवादी रहा । वे हिंदी के यथार्थ से भी परिचित थे,इसीलिए उन्होंने हिंदी में जमकर लेखन किया। उनके भाषा विषयक निबंध और टिप्पणियाँ राष्ट्रभाषा हिंदी की विशिष्टता को समग्रता से समझने में सहायक हैं । यह भी सुखद संयोग हैं कि हाल में उनके जन्म स्थान लमही जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । कुछ तस्वीरें । #साकेत_विचार

Thursday, January 6, 2022

कमलेश्वर जी की जयंती


आज महान कथाकार कमलेश्वर जी की जयंती हैं । कमलेश्वर जी से मिलने का सौभाग्य वर्ष 2006 में केंद्रीय हिंदी संस्थान, दिल्ली केंद्र द्वारा आयोजित भाषा, मीडिया एवं साहित्य विषयक संगोष्ठी में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में प्राप्त हुआ था। कमलेश्वर जी सच्चे अर्थों में हिंदी को जीते थे। हिंदी की प्रयोजनमूलकता के सच्चे समर्थक । ‘सारिका’ के संपादन द्वारा उन्होंने हिंदी में साहित्यिक पत्रकारिता को समृद्ध किया। दूरदर्शन पर जबरदस्त रूप से सफल धारावाहिक 'चंद्रकांता' उन्होंने ही लिखा। मीडिया विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में हिंदी की सशक्त आवाज़ को स्थापित करने में उनका बहुमूल्य योगदान है। पर बाद में वे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भूमिका विशेष रूप से भाषा एवं सामाजिक गिरावट को लेकर बेहद व्यथित थे। वे इस हेतु स्व-नियंत्रण यानी रिमोट के प्रयोग की बात करते थे। बाद में भी उनका आशीर्वाद मिला। 

 उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को नमन !

 #साकेत_विचार

Monday, January 3, 2022

खस्ताहाल श्रीलंका से सबक

खस्ताहाल श्रीलंका से सबक

कथित विकास की चमक से दूर रहने की सीख लेनी चाहिए विशेष रूप से दक्षिण एशिया के छोटे देशों को। याद कीजिए कभी अमेरिका के चलते पाकिस्तान के, कभी चीन के कारण श्रीलंका के विकास के कसीदे पढें जाते थे। आजकल बांग्लादेश के कसीदे पढें जा रहे है । पर भारत विरोध की हथियार पर चीन के ये दोस्त अपनी संप्रभुता खोते जा रहे हैं । कोरोना संकट के कारण श्रीलंका बुरी तरह प्रभावित हुआ है। चीन के कर्ज, कोरोना से प्रभावित पर्यटन उद्योग के कारण श्रीलंका की अर्थव्यवस्था बुरी तरह से चरमराई है। इस बीच सरकारी व्यय में बढ़ोत्तरी तथा करों में कटौती ने अर्थव्यवस्था को और कमजोर किया।


बहरहाल, श्रीलंका की सेना इस अनियंत्रित स्थिति को संभालने की कोशिश कर रही है । भारत सरकार भी संवेदनशील है। यह हम सभी के लिए एक सबक है । मीडिया और विपक्षी नेताओं की हर समय आलोचना की शिकार रही भारत की पहली महिला वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन जी बधाई की पात्र हैं । उन्होंने इस विपरीत परिस्थिति में प्रधानमंत्री के नेतृत्व में अपने काम को अनुशासित तरीके से संभाला है। सरकार की कुशल नीति यह रही कि इतनी बड़ी आबादी वाला राष्ट्र आजादी के बाद 21वीं सदी के सबसे क्रूर समय में अपनी अर्थव्यवस्था को संभाल रहा हैं । साथ ही हमारी जन-वितरण प्रणाली भी जो जंग खाकर भ्रष्टाचार में लहालोट थीं, वह भी डिजिटल नवोन्मेष से सुधार की ओर है और गरीबों को अनाज सफलतापूर्वक वितरित हो रहा है ।

अंत में, एक संदेश सत्ता विरोध में बिना शोध के चीन के झूठ पर भरोसा करें, बांग्लादेश को अमेरिका बना दे पर भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत होते बुनियाद की भी प्रशंसा करें ।

 जय हिंद ! 

#आत्मनिर्भर_भारत

 #श्रीलंका 

#साकेत_विचार

Saturday, January 1, 2022

जीवन के अहम् हिस्सों का रिकॉर्ड रखता कैलेंडर

 'जीवन के अहम् हिस्सों का रिकॉर्ड रखता कैलेंडर' 

आज अमृत विचार के सभी संस्करणों में दिनांक 02.01.2022 

धन्यवाद

 #साकेत_विचार 

नव वर्ष की मंगलकामना, बेहतर स्वास्थ्य एवं समृद्धि की कामना के साथ 🙏 


#ncert 

 #education

सुब्रह्मण्यम भारती जयंती-भारतीय भाषा दिवस

आज महान कवि सुब्रमण्यम भारती जी की जयंती है।  आज 'भारतीय भाषा दिवस'  भी है। सुब्रमण्यम भारती प्रसिद्ध हिंदी-तमिल कवि थे, जिन्हें महा...