Wednesday, March 6, 2024

हिंदी की वर्तमान स्थिति व हमारी मनोवृत्ति

 हिंदी की वर्तमान स्थिति व हमारी मनोवृत्ति



 

अक्सर भारत में राजभाषा हिंदी की स्थिति तथा इसके प्रयोग की मनोवृत्ति पर सवाल उठते रहते है।  क्या हिंदी के प्रयोग को लेकर अखिल भारतीय स्तर पर अध्ययन की ज़रूरत है?   हिंदी का प्रश्न सिर्फ भाषा का प्रश्न नहीं है बल्कि इस प्रश्न का संबंध हमारी राष्ट्रीयता से भी जुड़ा हुआ है।  परंतु इधर इस सोच में भी परिवर्तन आ गया है। हिंदी के प्रति जिस संकल्पशील निष्ठा की ज़रूरत है उसकी झलक हिंदी से जुड़े लोगों के अलावा और कहीं नहीं दिख रही है। 


यह भी कहा जाता है कि गैर सरकारी, गैर शिक्षण संस्थाओं द्वारा किए जा रहे कार्य वास्तव में हिंदी के  प्रचार-प्रसार में ज़्यादा सहायक हैं। इसका मतलब है कि अन्यत्र इस विषय में सकारात्मक सोच का अभाव है या नकारात्मक सोच सकारात्मक सोच पर ज्यादा हावी  हो गया है। जिससे राजभाषा के रूप में हिंदी में किए गए अच्छे कार्य छुप जाते हैं।  


स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमारे नीति निर्माताओं ने गहन विचार-विमर्श के बाद ही हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया था। यह राजभाषा देश के सभी निवासियों पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सभी पर समान रूप से लागू है। इस देश की अधिकांश बड़ी सरकारी एवं निजी कंपनियों का कार्यक्षेत्र अखिल भारतीय है। सरकारी क्षेत्र में तो राजभाषा नीति लागू ही है। 


ऐसे में  हम सभी को विचारना चाहिए कि एक ऐसी संस्था में कार्य कर रहे हैं जिसका स्वरूप अखिल भारतीय है और हमारा संपर्क अनेक भाषा-भाषी व्यक्तियों से होता है। उस परिस्थिति में हमसे क्या अपेक्षित है और हमारा व्यवहार कैसा हो ?

 

इससे पहले हम इस पहलू पर विचार कर लें कि सकारात्मक सोच और नकारात्मक सोच क्या है और इसका प्रभाव किस प्रकार पड़ता है? –

• सकारात्मक सोच वाले व्यक्ति के पास समाधान होता है और नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति के पास समस्या होती है। वह हर काम में समस्या देख लेता है। 
• सकारात्मक सोच वाले व्यक्ति के पास कार्यक्रम होता है और नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति के पास बहाना होता है। 
• सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति काम करने का इच्छुक होता है और नकारात्मक सोच वाल व्यक्ति कहता है कि यह काम मेरा नहीं है। 
• सकारात्मक सोच वाले व्यक्ति के पास समस्या में समाधान होता है जबकि नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति के पास समाधान में समस्या होती है। 
• सकारात्मक सोच वाले व्यक्ति के पास सोच होती है कि कठिन ज़रूर है पर असंभव नहीं है।

 

क्या हम सभी ने कभी इस विषय में गंभीरता से सोचा है कि भारत सरकार की राजभाषा नीति के अनुसार हमें अपना काम-काज ’हिंदी’ में ही क्यों करना चाहिए ? अंग्रेजी में क्यों नही? 


 हिंदी में करो या अंगेजी में क्या फर्क पडता है?


 ऐसे बहुत से सवाल है जो अक्सर पूछे जाते है।  इन सभी से राजभाषा प्रहरियों को अक्सर जूझना पड़ता है।   दुर्भाग्यवश  इन सवालों पर बहुत गंभीरता से कभी चर्चा नहीं की जाती है। 

 

पहला सवाल- सरकारी कर्मचारियों को अपना सरकारी काम-काज हिंदी में क्यों करना चाहिए?  

उत्तर- हमारे देश भारत में, तानाशाही नहीं, एक स्पष्ट लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था है, देश का शासन जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा चलाया जाता है, सरकारी काम करने व करवाने के क्या नियम, होंगें- इसका निर्धारण करना- हम सरकारी कर्मियों का काम नहीं, उन जन-प्रतिनिधियों का है, जिन्हें जनता ने चुनकर भेजा है।  सरकारी कर्मचारी हमें किसी ने जबर्दस्ती नहीं बनाया, बल्कि हमने इसे स्वयं स्वीकार किया है।  नियुक्ति के समय हम सभी ने शपथ ली है कि सरकार द्वारा समय-समय पर बनाये गये नियमों का पालन करेंगें।  सरकार हमसे जो काम करवाती है - उसके बदले हमें वेतन देती है-जिससे हमारे परिवार का गुजारा चलता है।  हम एक अच्छा सभ्य जीवन जीते है।  ’हिंदी’ को राजभाषा का संवैधानिक दर्जा मिले-74 वर्ष बीत चुके है लेकिन सरकारी काम-काज में, अभी तक हमने मूल रूप में इसे कितना अपनाया है ? यह बात किसी से छिपी नहीं है। 


जिस अंग्रेजी को सहयोगी भाषा के रुप में,कुछ वर्षों के लिए अपनाने की छूट दी गयी थी-वही वास्तव में राजभाषा के सिंहासन पर जमी बैठी है।  राजभाषा ‘हिंदी’ को लागू करने के संबंध में सरकार की नीति अभी तक सहयोग व प्रोत्साहन की रही है।  कोई जोर-जबर्दस्ती का रवैया अभी तक नहीं अपनाया गया है  हालांकि कानून बन गए है।  लेकिन लोकतांत्रिक देश होने का नाजायद फायदा कुछ अंग्रेजीपरस्त अधिकारी और कर्मचारी ’हिंदी’में काम करने का प्रयास ही नहीं करते-जबकि सरकार की तरफ से हर प्रकार का सहयोग उन्हें दिया जा रहा है।  रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदासजी लिखते है-’भय बिनु होय न प्रीति’अर्थात भय दिखाये बिना तो प्रेम भी नहीं होता है।  क्या हम सभी उस दिन की प्रतीक्षा कर रहे है।  जब सरकार राजभाषा नियमों की अवहेलना करने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही का प्रावधान करेगी ? क्या हमारा कोई नैतिक दायित्व नहीं बनता कि जनता का काम, उस जनता की भाषा में करें जिसे देश की 93% से अधिक आबादी आसानी से समझती है।  थोड़ी-सी सुविधा और एक विदेशी भाषा के प्रति अनावश्यक मोह के लिए 

लोकतांत्रिक व्यवस्था में बहुसंख्यक जनता को, उसके अधिकारों से वंचित कर देना – कहां तक जायज है? 


दूसरा सवाल – सरकारी काम-काज अंग्रेजी में क्यों नहीं? 

अंग्रेजी ही नहीं विश्व की कोई भाषा बुरी नहीं है।

 

अंत में, इन परिस्थितियों पर विचार करने के बाद यह कहा जा सकता है कि कोई भी व्यक्ति,परिवार,संगठन, या समाज कमजोर नहीं होता। अगर कमजोर होता है तो हमारे अंदर का आत्मविश्वास और नेतृत्वकर्ता।  अगर बात स्वयं के स्तर पर आती है तो किसी व्यक्ति के मन का विश्वास ही जीत की नींव तैयार करता है।  परिवार, संगठन, समाज के बारे में भी यही तथ्य लागू होता है।  इन सभी को सार्थक नेतृत्व एवं आत्मविश्वास द्वारा ही शिखर पर ले जाया जा सकता है।   दुर्भाग्यवश, हिंदी के ऊपर भी यह तथ्य लागू होता है।  हिंदी एक सर्वश्रेष्ठ भाषा है, इसमें अपार शब्द भंडार है, हिंदी ने देश को जोड़ने में, आजादी दिलाने में इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन सभी तथ्यों के बावजूद, हिंदी आज भी अंग्रेजी के समक्ष दोयम दर्जे की भाषा मानी जाती है , विशेष रूप से उन लोगों के बीच जो देश को दिशा देते है। परंतु हिंदी के मूल तथ्य से जो परिचित हैं वे गरीब है, कमजोर है उनके हाथों में कुछ नहीं। जिससे वे हिंदी के लिए कुछ नहीं कर पाते बस अफसोस करते रहते है।  लेकिन तभी तक जब तक वे मध्य या निम्न वर्ग का हिस्सा बने रहते है।  जैसे ही उनके पास अर्थ की ताकत आती है वे भी अंग्रेजी की माला जपने लगते है।  और यह बहस काफी पुरानी प्रतीत होती है।    

 

ऐसे में, अगर हम सभी वास्तव में हिंदी के प्रति कुछ करना चाहते है, इसे इसके वास्तविक पद पर आसीन करना चाहते है तो हम सभी को जिन्हें हिंदी से मातृभाषा, संपर्क भाषा, राष्ट्रभाषा, राजभाषा, मीडिया की भाषा, रोजगार की भाषा, सिनेमा की भाषा, कला-संस्कृति की  भाषा, संस्कार की भाषा के  रुप में थोड़ा भी फायदा हुआ है या वे जो हिंदी की मदद से सफलता की सीढ़िया चढ़े है उन्हें आगे बढ़कर हिंदी के गुणों, ताकत को गौरवान्वित करने की जरुरत है।  न कि थोथी भाषणबाजी । 

हालाँकि स्थिति में बदलाव आ रहे है। जो एक अच्छा संकेत है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति व तकनीकी शिक्षण में हिंदी एवं भारतीय भाषाओं के प्रयोग से सकारात्मक संकेत गया है। आशा है और अधिक बदलाव होंगे। 


पर इसी के साथ यह भी ज़रूरी है कि हम अपने अंदर झांके।  शुरुआत स्वयं से करें।  अपने बच्चों के समक्ष हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं को संपन्न भाषा के रुप में चित्रित करें।  तकनीक, चिकित्सा की भाषा के रुप में हिंदी की महत्ता को स्थापित करें।  तभी विभिन्न उपनामों से अलंकृत राजभाषा, राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा, विश्व भाषा हिंदी सशक्त होगी।  हिंदी सशक्त होगी तो समस्त भारतीय भाषाओं का प्रसार होगा। 

 

 

 

डॉ साकेत सहाय

राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित लेखक

भाषा-संचार विशेषज्ञ

www.vishwakeanganmehindi.blogspot.com

 

 

 

 

Tuesday, March 5, 2024

बीजू पट्टनायक स्मृति दिवस

 बीजू पटनायक जी का स्मृति दिवस




आज प्रसिद्ध भारतीय राजनीतिज्ञ, स्वाधीनता सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं उड़ीसा के भूतपूर्व मुख्यमंत्री बीजू  जी की जयंती है। उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को नमन। ज्ञात हो कि हिन्देशिया या इन्डोनेशिया ने उनके त्याग को नमन करते हुए उन्हें अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भूमिपुत्र’ से नवाजा था। उनकी जयंती पर उनसे जुड़ी प्रेरक बातें- 


वे भारत के एकमात्र ऐसे व्यक्ति है जिनके निधन पर उनके पार्थिव शरीर को उनकी मातृभूमि के अतिरिक्त दो देशों रूस और इंडोनेशिया के राष्ट्रीय ध्वज में लपेटा गया था।


बीजू पटनायक जी एक अनुभवी पायलट थे । जब द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सोवियत संघ संकट में घिरा था तब उन्होंने लड़ाकू विमान डकोटा उड़ा कर हिटलर की सेनाओं पर बमबारी की जिससे हिटलर पीछे हटने को मजबूर हुआ था। उनकी इस बहादुरी पर उन्हें सोवियत संघ का सर्वोच्च पुरस्कार भी दिया गया था और सोवियत संघ ने उन्हें अपनी नागरिकता भी प्रदान की थी।  


कश्मीर पर जब कबायलियों के वेश में पाकिस्तानी सेना ने आक्रमण किया था तब बीजू पटनायक जी ने एक पायलट के रूप में भारतीय सेना का अनथक सहयोग किया और अपने सैनिकों को श्रीनगर पहुंचाया था l


इंडोनेशिया कभी डच यानी हालैंड का उपनिवेश था । डचों ने इंडोनेशिया के काफी बड़े इलाके पर कब्जा किया था । डच सैनिकों ने इंडोनेशिया की संपूर्ण समुद्री सीमा को भी अपने नियंत्रण में रखा था । किसी भी इंडोनेशियन नागरिक को बाहर जाने की अनुमति नहीं थी।  उस वक्त इंडोनेशिया के प्रधानमंत्री को एक कांफ्रेंस में हिस्सा लेने के लिए भारत आना था लेकिन डचों ने इसकी इजाजत नहीं दी थी।  इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो ने भारत से मदद मांगी और इंडोनेशिया के स्वाधीनता सेनानियों ने बीजू पटनायक से मदद मांगी। बीजू पटनायक एवं उनकी पत्नी ने अपनी जान की परवाह किए बगैर एक डकोटा प्लेन से डच नियंत्रण क्षेत्र के ऊपर से उड़ान भरी और अदम्य साहस एवं बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए इंडोनेशिया के प्रधानमंत्री को सिंगापुर होते हुए सुरक्षित भारत लेकर आए। इससे इंडोनेशिया के लोगों में असीम ऊर्जा का संचार हुआ और उन्होंने स्वाधीनता प्राप्ति हेतु डच सैनिकों पर धावा बोला । काफ़ी संघर्ष के बाद इंडोनेशिया एक पूर्ण आजाद देश बना। बाद में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो की बेटी हुई तब उन्होंने उसके नामकरण हेतु बीजू पटनायक और उनकी पत्नी को बुलाया ।  बीजू पटनायक और उनकी पत्नी ने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति की बेटी का नाम मेघवती रखा था। इंडोनेशिया ने बीजू पटनायक और उनकी पत्नी को अपने देश की नागरिकता सम्मान स्वरूप प्रदान की थी।


बीजू पटनायक जी के निधन के बाद इंडोनेशिया में सात दिनों का राजकीय शोक मनाया गया था और रूस में एक दिन का राजकीय शोक मनाया गया ।  उस दिन देश के सारे झंडे झुका दिए गए थे।


देश के ऐसे महान सपूत पर हम सभी को गर्व है। 

#बीजू_पटनायकजी #साकेत_विचार

Wednesday, February 21, 2024

आवाज के जादूगर -अमीन सयानी

अमीन सयानी नहीं रहे। 



आवाज की दुनिया के दोस्त बिना उनकी आवाज़ के अधूरे हैं।  शायद ही कोई रेडियो, सिनेमा प्रेमी  ऐसा होगा जो इस नाम से परिचित ना हों। उनकी कभी न भूलने वाली आवाज के बिना भारत का रेडियो जगत अधूरा है। कभी बिनाका, सीबाका का हर श्रोता ठीक आठ बजे रेडियो सिलोन में कान लगा कर सिर्फ गीतमाला नहीं सुनता था, साथ में उनकी अपनेपन से भरी आवाज को भी सुनता था। जब वे कहते, भाइयों और बहनों, तो ऐसा लगता था जैसे वे सीधे हमें संबोधित कर रहे हैं। उस एक कार्यक्रम ने रेडियो को जन-जन की आवाज़ बना दिया।  एक घंटे में सप्ताह के दस लोकप्रिय गीत मनोरंजन की सबसे बड़ी खुराक थी।  आवाज़ के जादूगर ने ९१ साल की भरपूर आयु जी, जिसमें से 42 साल तक सुपरहिट शो गीतमाला को होस्ट किया।  जब वे कहते "नमस्कार भाइयो और बहनो, मैं आपका दोस्त अमीन सयानी बोल रहा हूं।" तो श्रोता मंत्र-मुग्ध हो जाते।  अमीन सयानी ने 1952 से 1994 तक रेडियो शो गीतमाला को होस्ट किया। अमीन सयानी की वजह से इस रेडियो शो को देशभर में लोकप्रियता मिली।अमीन सयानी ने अपने करियर की शुरुआत आकाशवाणी सेवा से की थी। 21 दिसंबर 1932 को मुंबई में जन्मे अमीन एक बहुभाषी परिवार से संबद्ध रखते थे।  उन्होंने रेडियो प्रस्तुतकर्ता के रूप में  अपने करियर की शुरुआत की। 10 साल तक वे अंग्रेज़ी कार्यक्रम  का हिस्सा रहे। आजादी के बाद उन्होंने हिंदी की ओर रुख किया। सयानी को असली पहचान दिसंबर 1952 में शुरू हुए रेडियो शो गीतमाला से मिली। इस 30 मिनट के रेडियो शो के तीन नाम बदले गए, सब के सब लोकप्रिय रहे।  सयानी का शो बिनाका गीतमाला पहले रेडियो श्रीलंका पर प्रसारित होता था। आधे घंटे का यह कार्यक्रम बेहद चर्चित हुआ।   पहले बिनाका गीतमाला, फिर सिबाका गीतमाला हुआ और हिट परेड नाम से भी प्रसारित हुआ, लेकिन कभी भी इसकी लोकप्रियता कम नहीं हुई। इसके बाद गीतमाला कार्यक्रम आकाशवाणी और विविध भारती पर भी प्रसारित हुआ।

अमीन सयानी के अंदाज का हर कोई दीवाना था। गीतमाला शो रेडियो पर बुधवार रात 8 बजे प्रसारित होता था। परंतु आलम यह था कि हर कोई इस शो का इंतजार करता था। घर, दुकान, बाजार हर जगह लोग सयानी को सुनने के लिए आतुर  रहते थे। फिर गूंजती थी एक आवाज- बहनो और भाइयो, मैं आपका दोस्त अमीन सयानी बोल रहा हूं। और अब इस बरस बिनाका गीतमाला की वार्षिक हिट परेड का सरताज गीत।  इसके बाद बिगुल की आवाज गूंजती और फिर अमीन सयानी कहते, ‘फिल्म नाम का गाना है ये बहनो और भाइयो। इसे गाया है पंकज उधास ने।’

हिन्दी की लोकप्रियता का असर देखिये कि यह गीतमाला पूरे दक्षिण एशिया में लोकप्रिय हुई। इस अपूर्व सफलता के कारण गीतमाला शो 42 साल तक चला। बाद में, 2000-2001 और 2001-2003 में इसके नाम में मामूली बदलाव के साथ इसे फिर से शुरू किया गया।हिंदी इनसे भी लोकप्रिय हुई या यूँ कहें कि इन लोगों ने हिंदी की शक्ति को जाना-पहचाना।  

अब इस दुनिया से वह जोश भरी आवाज चली गई।  पर उनकी जादुई आवाज सदा गुंजेगी। 

डा. साकेत सहाय

भाषा-संचार विशेषज्ञ

राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानितलेखक

hindisewi@gmail.com 

Tuesday, February 20, 2024

अंतराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस





म ‘हज़ार मीलों का सफर एक कदम से आरंभ होता है।’  आप सभी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की हार्दिक शुभकामना! स्वभाषा हो सर्वोपरि!  इस अवसर पर आज ( 21.02.2024 ) के अमृत विचार के सभी संस्करणों में प्रकाशित आलेख “राष्ट्र निर्माण में मातृभाषा की भूमिका”

#मातृभाषा #राष्ट्रभाषा

#साकेत_विचार

Sunday, February 18, 2024

ओरियंटल बैंक ऑफ़ कॉमर्स(ओबीसी) स्थापना दिवस

 सुनहरी यादें ❤️

ओरियन्टल बैंक ऑफ़ कॉमर्स  स्थापना दिवस के अवसर पर सुनहरी यादों की हार्दिक बधाई! संगठन भले समय के साथ समाहित हो जाए परंतु उसके द्वारा निर्मित संस्कार एवं संस्कृति सदैव आपके भीतर जीवंत बने रहेंगे। 🙏🌺

एक बार फिर से वहीं पोस्ट जिसे वर्ष २०२० में मैंने लिखा था, आशा है यह पोस्ट आप सभी को पुन: यादों के संजाल में ले जाएगा। 


‘ओरियन्टल बैंक ऑफ़ कॉमर्स’ (१९४३-२०२०)

आज बैंक का एक और स्थापना दिवस है।भले ही यह संगठन अब इतिहास हो गया । पर इसके द्वारा निर्मित संस्कार अभी भी जिंदा है । कुछ चीजें हमारे-आपके वश में कभी नहीं रहती। नियति ही सब कुछ तय करती है। पर एक मानवीय स्वभाव है -लगाव होना।  यहीं लगाव हमें प्रकृति से, अपनों से जोड़ती है। प्रकृति से जुड़ाव ही  संसार को सशक्त बनाता है, जिससे व्यक्ति, समाज व संगठन का निर्माण होता है।  संगठन भी तो परिवार की ही भांति होते हैं, जिससे बिछुड़ने की टीस हम सभी में ताउम्र बनी रहती है। यहीं कारण है कि हम सब चाहकर भी ओबीसी के हरे बोर्ड और इसकी  प्यारी धुन ‘where every individual committed ‘ से मोह नहीं हटा पाते। यह प्यार, लगाव अब कहाँ मिलेगा,  एक परिवार की तरह अपनापन, सब लोग आपस में मिले हुए, जुड़े हुए ।   पर विछोह जहाँ एक पीड़ा, वहीं एक प्रक्रिया भी है। अब बैंक नहीं रहा, ना कभी दुबारा खुलेगा, क्योंकि सरकार ने इसे समामेलित कर दिया ।  पर इसकी बेहतर कार्य-संस्कृति हम सभी के रूप में सदैव विद्यमान रहेगी ।  

इस दुनिया में बहुत कुछ बदल जाता है, पर कुछ चीजें जो नहीं बदलती वह हमारे-आपके भीतर अन्तर्निहित है। वैसे भी संस्थान, मात्र संस्थान की ही निमित्त नहीं होते। संस्थान तो संस्कार का निर्माण करते है जिससे एक बेहतर कार्य-संस्कृति पुष्पपित-पल्लवित होती है।  ओ बी सी ने हम सभी के भीतर एक सशक्त संस्कृति का बीजारोपण किया है। जो हमें हर परिस्थिति से पार पाना सिखाती है। संस्थान भले किसी में आमेलित, मर्ज़ हो जाए, पर यह संस्कृति हमारे भीतर, आपके भीतर सदैव जिंदा रहेगी।  बतौर कर्मचारी मेरे लिए ओबीसी एक ऐसे संस्थान के रुप में बना रहेगा , जिस पर हमें गर्व है।  मुझे सदैव गर्व  रहेगा इस संस्थान से जुड़ने का। 

चीजें कभी एक जैसी नहीं रहतीं, बदलती रहती है । हमें भी लगातार आगे बढ़ना है।  पर एक अफसोस सदैव बना रहेगा कि एक जीवंत संगठन ख़त्म हो गया, पर इसके सशक्त संस्कार हम सभी के रुप में सदा जीवंत बने रहेंगे। 

पुन: आप सभी को ओरियन्टल बैंक ऑफ़ कॉमर्स  के स्थापना दिवस की यादों की बधाई! 🙏🌺

©डा. साकेत सहाय

लेखक

१९.०२.२०२५


Saturday, February 17, 2024

शहीद बुधु भगत

 


आज प्रसिद्ध क्रांतिकारी शहीद बुधु(बुदु) भगत जी की जयंती है ।  आप अंग्रेजों से लोहा लेते हुए शहीद हुए । आपका जन्म वर्तमान राँची, झारखण्ड में हुआ था।  आमतौर पर 1857 को ही स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम आंदोलन माना जाता है। लेकिन इससे पहले  ही वीर बुधु भगत ने न सिर्फ़ क्रान्ति का शंखनाद किया, बल्कि अपने अदम्य साहस व नेतृत्व क्षमता से 1832 ई. में "लरका विद्रोह" नामक ऐतिहासिक आन्दोलन का सूत्रपात्र भी किया।छोटानागपुर में अंग्रेज़ हुकूमत के दौरान बर्बरता चरम पर थी। बुधु भगत बचपन से ही जमींदारों और अंग्रेज़ी सेना की क्रूरता को देखते आये थे। किस प्रकार से उनके तैयार फ़सल ज़मींदार जबरदस्ती उठा ले जाते थे। ग़रीब गांव वालों के घर में कई-कई दिनों तक चूल्हा नहीं जल पाता था। बालक बुधु भगत सिलागाई की कोयल नदी के किनारे घंटों बैठकर अंग्रेज़ों और जमींदारों को भगाने के बारे में सोचते रहते थे। बुधु भगत ने अपने दस्ते को गुरिल्ला युद्ध के लिए प्रशिक्षित किया था। उन्हें पकड़ने के लिए अंग्रेज़ सरकार ने एक हज़ार रुपये इनाम की घोषणा की थी। 13 फ़रवरी, सन 1832 ई. को बुधु और उनके साथियों को कैप्टन इंपे ने सिलागांई गांव में घेर लिया। बुधु आत्म समर्पण करना चाहते थे, जिससे अंग्रेज़ों की ओर से हो रही अंधाधुंध गोलीबारी में निर्दोष ग्रामीण न मारे जाएँ। लेकिन बुधु के भक्तों ने वृताकर घेरा बनाकर उन्हें घेर लिया। चेतावनी के बाद कैप्टन ने गोली चलाने का आदेश दे दिया। अंधाधुंध गोलियाँ चलने लगीं। बूढ़े, बच्चों, महिलाओं और युवाओं के भीषण चीत्कार से पूरा इलाका कांप उठा। उस खूनी तांडव में करीब 300 ग्रामीण मारे गए। अन्याय के विरुद्ध जन विद्रोह को हथियार के बल पर जबरन खामोश कर दिया गया। बुधु भगत तथा उनके बेटे 'हलधर' और 'गिरधर' भी अंग्रेज़ों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए।

शहीद बुधु भगत जी के देश के प्रति त्याग व समर्पण को शत शत नमन🙏

#आज़ादी #देश #स्वाधीनता #बुधु_भगत

#साकेत_विचार

हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

 आप सभी को हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!🙏 विचार- हिंदी की लड़ाई आज केवल कार्यालय की फाइलों में नहीं, बल्कि घर, स्कूल, बाजार, रोजगार और ...