Monday, August 30, 2021

योगेश्वर कृष्ण : एक विराट व्यक्तित्व


 योगेश्वर कृष्ण


-  डॉ साकेत सहाय 

भगवान श्रीकृष्ण के मानवीय रूप में उनका बहुआयामी व्यक्तित्व दिखाई पड़ता है। बाल सुलभ चंचलता, प्रेम-स्नेह त्याग से भरा व्यक्तित्व, भाईचारा, पिता-माता से समान प्रेम, भातृत्व, मित्रता,  समाजोपयोगी नेतृत्व, प्रेरक योद्धा, जीवनोपयोगी प्रेम सभी कुछ से भरा हुआ उनका भाव, विचार  और कर्म ।   इसी लिए वे योगेश्वर कहलाए। 

उन्होंने शौर्य और धैर्य का प्रयोग लोक-कल्याण में


किया।  वे  एक कुशल कूटनीतिज्ञ एवं रणनीतिकार थे।  उनका स्त्री प्रेम मानवीय मूल्यों पर आधारित रहा। वे काम-वासना से परे स्त्री से सखा भाव से  प्रेम करते थे।  श्रीकृष्णृ में प्रेम व ज्ञान का अद्भुत समन्वय था। श्रीकृष्ण विश्व के पहले प्रबंधन गुरु माने जाते हैं । वे अपने हर रूप में दर्शनीय हैं, अनुकरणीय हैं, श्रद्धेय हैं । 

कर्मयोगी कृष्ण निष्काम कर्म की बात कहते हैं । मनुष्य का अधिकार मात्र उसके  कर्म के ऊपर है। पर वे यह भी कहते है कि मन से किया गया कार्य सफलता जरूर देता है ।  वे धैर्य  के साथ कर्मशीलता को प्रोत्साहित करते है । 

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । 

आज श्रीकृष्ण की जीवन गाथा से जो सीखने वाली बात है वह है साध्य पर भरोसा रखो। साधनों और प्रतिभाओं पर विश्वास रखो। वे चाहते तो महाभारत का युद्ध 18 दिन से पहले एक सुदर्शन चक्र से समाप्त कर सकते थे। पर उन्होंने एक संदेश दिया। उन्होंने पाण्डवों के माध्यम से समाज को यह संदेश दिया कि कोई कमजोर नहीं होता। साधन या साध्य कमजोर होता है । धर्म सबसे महत्वपूर्ण है । बाद में उन्हीं के विचारों की छाप अधिकांश पंथ-परंपराओं पर पड़ी । धर्म के पथ पर चलने हेतु उन्होंने शक्तिशाली पाण्डवों को खड़ा किया।  

वे अपने उद्देश्य के प्रति बेहद सजग थे।  श्रीकृष्ण अपने मानव रूपी अवतार के मूल लक्ष्य को लेकर इतने प्रतिबद्ध थे कि उन्होंने मात्र 11 वर्ष की आयु में अपना गांव, यशोदा माता, बाल सखाओं सभी को छोड़कर मथुरा चले गए ।

श्रीकृष्ण ने सिखाया कि अपने ज्ञान को सभी से साझा करो।  वे अपने विचार सभी से बांटते थे। दुर्योधन, शकुनि, गांधारी, विदुर, बलराम, युधिष्ठिर, अर्जुन सभी के साथ उन्होंने अपने विचार स्पष्टता के साथ साझा किया। महाभारत के युद्ध में वे अडिग रहे । सत्य मार्ग पर डटे रहे । सत्य के रक्षार्थ सब कुछ सहा । साथ ही युद्ध के वास्तविक उद्देश्यों से भी अर्जुन को अवगत कराया । 

वे अपने विराट व्यक्तित्व से यह संदेश देते है कि अपने लक्ष्य के प्रति सतर्क रहो । उनका हर कदम, प्रत्येक विचार, हर युक्ति, उन्हें अपने लक्ष्य के निकट लेकर आती थी।  उन्होंने तीन लक्ष्य दिए- 

1.परित्राणाय साधुनाम् यानि सज्जनों का कल्याण । 

2.विनाशाया दुष्कृताम् यानि बुराई और नकारात्मक विचारों को नष्ट करना एवंदना

3.  धर्म संस्थापना अर्थात् जीवन मूल्यों और सिद्धांतों की स्थापना करना।

भगवान योगेश्वर ने तटस्थता का संदेश दिया। वे पक्षपात के विरोधी थे। चाहे मामा कंस का वध करना हो, अग्रज बलराम का विरोध या पाण्डवों को युद्ध हेतु प्रेरित करना । उन्होंने हमेशा सत्य और न्याय का साथ दिया। उनके प्रबंधन का नियम हमें सभी का विश्वासपात्र और सार्वजनिक सहमति प्राप्ति का मार्ग प्रदान करता है । 

श्रीकृष्ण कुशल रणनीतिकार के रूप में किसी को कमजोर नहीं समझते। वे एक कुशल रणनीतिकार हैं।   महाभारत के कई युद्ध प्रसंग इसे सिद्ध करते है । दुर्योधन-भीम युद्ध, जरासंध का मल्ल युद्ध आदि। 

श्रीकृष्ण हर परिस्थिति में अडिग रहने का संदेश देते हैं । हमेशा मृदु एवं सरल बने रहना उनके व्यक्तित्व की विशिष्टता है ।ईश्वरीय अवतार, राज-परिवार से संबंद्धता,  नंदगांव के गौ-पालक सभी रूपों में वे  सहज बने रहे।  अहंकार से कोसों दूर, सरल और मृदुल। 

श्रीकृष्ण कला के प्रेमी और पारखी हैं । श्रीकृष्ण और संगीत दोनों एक दूसरे के पूरक है।  उनका बांसुरी प्रेम युगप्रसिद्ध है। ठुमरी को उन्होंने भूलोक पर स्थापित किया। उनके हाथ में बांसुरी संगीत की प्रतिष्ठा का प्रतीक है ।  

हमारे परंपरा कोष में कृष्ण का अर्थ है- आकर्षक, चुबंकीय। आनंदमूर्ति कहते हैं -कृष्ण शब्द के अनेक अर्थ हैं। कृष् धातु का एक अर्थ है खेत जोतना, दूसरा अर्थ है आकर्षित करना। वे जो खींच लेते हैं, वे जो प्रत्येक को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, जो सम्पूर्ण संसार के प्राण हैं- वही हैं कृष्ण। कृष्ण का अर्थ है विश्व का प्राण, उसकी आत्मा। कृष्ण का तीसरा अर्थ है वह तत्व जो सबके 'मैं-पन' में रहता है। मैं हूँ, क्योंकि कृष्ण है। मेरा अस्तित्व है, क्योंकि कृष्ण का अस्तित्व है। अर्थात यदि कृष्ण नहीं हो तो मेरा अस्तित्व भी नहीं होगा। मेरा अस्तित्व पूर्णत: कृष्ण पर निर्भर करता है। मेरा होना ही कृष्ण के होने का लक्षण या प्रमाण है। कृष्ण कहते हैं, ये यथा मां प्रपद्यन्ते- जो कुछ भी हम स्पर्श करते हैं, जो भी हम इस विश्व में देखते हैं- वह सब कुछ कृष्ण का ही है। तुम अपनी इच्छाओं और वृत्तियों के अनुसार उनसे जो भी चाहते हो, तुम पाओगे। 

उनका युगांतरकारी होना ही श्रीकृष्ण की विशिष्टता है ।  वे कर्मयोगी हैं, योगेश्वर है । 


जय श्रीकृष्ण!

Sunday, August 29, 2021

खेल की दुनिया के किंवदंती पुरूष- ध्यानचंद

 खेल की दुनिया के किवदंती पुरुष-मेजर ध्यानचंद


प्रयागराज (इलाहाबाद) में जन्मे भारतीय हाॅकी के अग्रदूत की जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय खेल दिवस का आयोजन किया जाता है।  जीते-जी किंवदंती बन चुके ध्यानचंद खेल भावना के धनी थे।  देश में ऐसे बहुत से लोग हुए हैं, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में इतनी महारत हासिल की कि उनका नाम इतिहास के पन्नों में सदा के लिए अमर हो गया। भारत में हॉकी के स्वर्णिम युग के साक्षी मेजर ध्यानचंद का नाम भी ऐसे ही लोगों में शुमार है। उन्होंने अपने खेल से भारत को ओलिंपिक खेलों की हॉकी स्पर्धा में स्वर्णिम सफलता दिलाने के साथ ही परंपरागत एशियाई हॉकी का भी दबदबा कायम किया। कालजयी खिलाड़ी, ध्यानचंद के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए उनके जन्मदिन 29 अगस्त को भारत में राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है।  इसी दिन उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को राष्ट्रपति भवन में भारत के राष्ट्रपति के द्वारा विभिन्न पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं।  इस वर्ष यह आयोजन पैरालंपिक खेलों के बाद आयोजित किया जाएगा।  विदित हो कि सरकार ने उनकी महानता को सम्मान देते हुए खेल के क्षेत्र में सर्वोच्च पुरस्कार का नाम ध्यानचंद खेल रत्न कर दिया।

हाल ही में संपन्न हुए खेलों के महाकुंभ यानी टोक्यो ओलंपिक में भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीमों का प्रदर्शन बेहद दमदार रहा। महिला टीम तो बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए पहली बार सेमीफाइनल तक पहुंची।   दुर्भाग्य से यह टीम पदक से चूक गई।  पुरूष हॉकी टीम ने इतिहास रचते हुए कांस्य पदक जीता।  इस ऐतिहासिक प्रदर्शन ने एक बार फिर से भारतीय हॉकी में नई जान फूंकी है । हाॅकी  टीम के कप्तान मनजीत सिंह कहते हैं इस जीत से हाॅकी पुनः घर-घर पहुंचेगी ।

वास्तव में इस पुनः शब्द का बड़ा महत्व है।   भारतीय हॉकी टीम का इतिहास बेहद  स्वर्णिम रहा है। हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले  मेजर ध्यानचंद इस स्वर्णिम युग के मुखिया थे।  कहा जाता है कि ध्यानचंद रात के समय में जब सब सो जाते थे, तब वे अभ्यास करते।  खेल के प्रति उनके इस जूनून को देखकर उनके प्रशिक्षक  ने उनसे कहा, ‘ध्यान वह दिन जरूर आएगा जब इस खेल की दुनिया में इस आसमान के चाँद की तरह इस पृथ्वी पर तुम चमकोगे’ और उन्होंने उन्हें एक नया नाम दिया ध्यानचंद, और यहीं से धीरे-धीरे वे ध्यानचंद के नाम से विख्यात हो गये। सच में गुरु का आशीर्वाद फलित हुआ । गुरु ने उनकी साधना को देखते हुए यह कामना की और इस फलित कामना के रूप में भारत को खेल की दुनिया का नया सितारा मिला। जिसने गुलाम भारत की आबादी को देशप्रेम का नया जज्बा दिया।

हॉकी के जादूगर ध्यानचंद ने अपने खेल जीवन में 1000 से अधिक गोल दागे। जब वे मैदान में खेलने को उतरते थे तो गेंद मानों उनकी हॉकी स्टिक से चिपक-सी जाती थी। उन्हें 1956 में भारत के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था। भारत सरकार ने इसी साल खेल के सर्वोच्च पुरस्कार राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार का नाम ध्यानचंद के नाम पर कर दिया।

ध्यानचंद साल 1926 में पहली बार विदेशी धरती पर  न्यूजीलैंड गए थे। यहां भारतीय टीम ने एक मैच में कुल 20 गोल किए, जिसमें से अकेले 10 गोल ध्यानचंद द्वारा किये गए थे। न्यूजीलैंड में भारत ने 21 मैचों में से 18 मैच जीते और पूरी दुनिया ध्यानचंद को पहचानने लगी।  कभी पढा था कि जिसमें उनके सुपुत्र अशोक कुमार कहते है कि उस समय हाॅकी की दुनिया में  ध्यानचंद का ऐसा डर था कि वर्ष 1928 में ब्रिटेन की टीम ने ध्यानचंद की टीम से हार के डर से ओलंपिक से अपना नाम ही वापस ले लिया था।

जर्मन शासक हिटलर से जुड़ा प्रसंग तो हम सभी ने जनश्रुतियों में  सुना ही होगा कि जब हिटलर अपनी  टीम को किसी भी कीमत पर जीतते देखना चाहता था।  बताया जाता है कि भारत को हराने के लिए मैदान तक गीला कर दिया गया, ताकि हल्के जूते पहनने वाले भारतीय खिलाड़ी अपने पांव नहीं जमा सकें।  पर ध्यानचंद के जादुई  स्टिक ने नंगे पांव जर्मनी को हिटलर की आंखों के सामने 8-1 से परास्त कर दिया।

कहा जाता है कि इस शानदार प्रदर्शन से खुश होकर हिटलर ने उन्हें खाने पर बुलाया और उनसे जर्मनी की ओर से खेलने को कहा।  इसके बदले उन्हें मजबूत जर्मन सेना में कर्नल पद का प्रलोभन भी दिया गया।  लेकिन ध्यानचंद ने कहा, 'हिंदुस्तान मेरा वतन है और मैं वहां खुश हूं।'

ध्यानचंद की उपलब्धियों का सफर भारतीय खेल इतिहास को गौरवान्वित करता है।  लगातार तीन ओलंपिक खेल  (1928 एम्सटर्डम, 1932 लॉस एंजेलिस और 1936 बर्लिन) में भारत को हॉकी का स्वर्ण पदक दिलाने वाले ध्यानचंद के जीवट का हर कोई कायल रहा।   उनके खेल जीवन से जुड़े अनेक यादगार प्रसंग भारतीय हॉकी को शिखर पर ले जाते है।

1936 के बर्लिन ओलंपिक में उनके साथ खेले और बाद में पाकिस्तान के कप्तान बने आईएनएस दारा ने एक संस्मरण में लिखा- छह गोल खाने के बाद जर्मनी की टीम  काफी खराब हॉकी खेलने लगी।  उनके गोलकीपर टिटो वार्नहोल्ज की हॉकी स्टिक ध्यानचंद के मुंह पर इतनी जोर से लगी कि उनका दांत टूट गया।  प्राथमिक चिकित्सा के बाद मैदान पर लौटते ही ध्यानचंद ने खिलाड़ियों को निर्देश दिए कि अब कोई गोल न मारा जाए, जर्मन खिलाड़ियों को ये बताया जाए कि गेंद पर नियंत्रण कैसे किया जाता है। भारत ने उस फाइनल में जर्मनी को 8-1 से हराया।  इसमें तीन गोल अकेले ध्यानचंद ने किए।

कहा जाता है कि  एक बार जब ध्यानचंद एक मैच के दौरान गोल नहीं कर पा रहे थे, तो उन्होंने गोल पोस्ट की माप पर आपत्ति जताई।  आखिरकार वे सही पाए गए।   गोल पोस्ट अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत निर्धारित आधिकारिक न्यूनतम चौड़ाई का नहीं था।

ध्यानचंद 22 साल तक भारत के लिए खेले और 400 अंतरराष्ट्रीय  गोल किए।  कहा जाता है- जब वे खेलते थे, तो मानो गेंद स्टिक पर चिपक जाती थी।  हॉलैंड में एक मैच के दौरान चुंबक होने की आशंका में उनकी स्टिक तोड़कर देखी गई।  जापान में एक मैच के दौरान उनकी स्टिक में गोंद लगे होने की बात भी कही गई।  जीते जी किंवदंती बन चुके भारत के इस नायाब हीरे का देहांत 3 दिसंबर, 1979 को दिल्ली में हुआ। उनका अंतिम संस्कार झांसी में उसी मैदान पर किया गया, जहां वे हॉकी खेला करते थे।

मेजर ध्यानचंद ने अपनी जीवनी और महत्वपूर्ण घटना वृतांत को अपने प्रशंसकों के लिए अपनी आत्मकथा गोल में सम्मिलित किए हैं।  खेल में रूझान रखने वाले  युवाओं के लिए उनका जीवन और खेल दोनों ही एक मिसाल हैं।

जय हिंद ! ध्यानचंद जी 


डाॅ साकेत  सहाय 


Saturday, August 14, 2021

देश विभाजन का सबक




 देश विभाजन का सबक 


आज की तिथि को भारतीय इतिहास में 'कलंक दिवस' के रूप में भारत सरकार द्वारा मनाया जाना चाहिए क्योंकि आज ही के दिन भारतमाता के दो टुकड़े कर दिए गए । इस काले  दिवस को हमें इस बात हेतु भी याद करना चाहिए कि हमारी अंग्रेजों के प्रति  अंधभक्ति और सत्ता का लालच किस प्रकार से एक देश के सपनों को विभाजित कर सकती हैं ।  क्या शहीदों ने इसी विभाजन के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया था?  स्वतंत्रता के बाद इस देश को विभाजन की विभीषिका पर गहराई से मंथन करना जरूरी था।स्वाधीनता प्राप्ति के पूर्व यह दिवस आधी खुशी के साथ देशवासियों को जीवन भर का टीस दे गया । जब एक ही माटी के दो सपूत किसी और के एजेण्डे के तहत बांट दिए गए ।  इसका दोहराव न हो इस हेतु हम सभी को सचेत रहना होगा, क्योंकि पाकिस्तान एक दिन में नहीं बना था ।  सदियों से साथ रहे लोगों को नियोजित विषवमन के साथ बांटने का दुष्परिणाम अविभाजित भारत अपने विभाजन के बाद से ही भुगत रहा है। ब्रिटिशों और यहाँ के गद्दारों ने मिलकर देश बांट दिया, जिसका खामियाजा किस हद तक यह देश, समाज  भुगत रहा है, इसके तटस्थ मूल्यांकन की भी आवश्यकता है।  पाकिस्तान धर्म से अधिक अंधी पहचान, सत्ता की भूख का परिणाम था।  इसी भूख का दुष्परिणाम है कि पाकिस्तान से भारतीय संस्कृति के सभी प्रतीकों को मिटा दिया गया ।  यह कौन-सी  सोच है जो अपने जन्म के समय से ही अपनी मूल संस्कृति और सभ्यता पर कुप्रहार कर रहा है । श्रीराम के सुपुत्र  लव द्वारा स्थापित लाहौर शहर जो अपने विरासत  के नाम पर गर्व करता था, उसकी पहचान आज सीमित हो गई। तमाम उदाहरण हैं जिसे समझने की जरूरत है। आइए कुत्सित भावनाओं के जन्म को रोकें।   हम सब मिलकर रहें और किसी और पाकिस्तान का जन्म न हों इसे देखें । आइए मिलकर रहें । भारतीय बनें । 

©डाॅ. साकेत सहाय


जय हिंद! जय हिंदी!!

Tuesday, August 10, 2021

स्वभाषा और आत्म बल

आज सुबह ट्विटर पर जब एक ट्वीट पढा कि 'अंग्रेजी मोह से ग्रसित चैनल के पत्रकार महोदय जब अपना सवाल ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता से अंग्रेजी में पूछते है तो इस पर नीरज चोपड़ा कहते हैं, सर! हिंदी में प्रश्न पूछिए।  यह खबर बहुत बड़ी है।  क्योंकि यह देश के निवासियों के भाषाई आत्म बल को जगाता है। उनके भाषाई प्रेम को दर्शाता है।  आज नीरज चोपड़ा को कौन नहीं जानता है?   वे खेल क्षेत्र के लिए आशा की नयी किरण हैं ।  उनकी यह पहल बहुत बड़ा संदेश हैं।हालांकि आप सभी को यह बात अतिश्योक्ति से भरी लगेगी, पर मेरे  जैसे हिंदी प्रेमी के लिए इस घटना ने इसी बहाने जाने-अनजाने महात्मा गाँधी की याद दिला दी।  'जब आजादी के बाद बीबीसी पत्रकार उनसे अंग्रेजी में प्रश्न पूछता हैं तो वे कहते हैं  जाओ जाकर दुनिया को कह दो गाँधी को अंग्रेजी नहीं आती ।  गांधीजी जैसा जिगरा सबका नहीं । फिर भी नीरज ने दुनिया को बहुत बड़ा संदेश दिया है । भाषा केवल संवाद या रोजगार का जरिया मात्र नहीं बल्कि देश के आत्म बल का प्रतीक भी होता  है। 

आज यदि देखें तो हर स्तर पर अंग्रेजी या हर बात में हिंदी के विकृत रूप 'हिंग्लिश' का प्रयोग या चलन ज्यादातर मामलों में हीनता बोध या अज्ञानता की उपज को ही माना जा सकता है।  ऐसे लोगों के लिए हिंदी केवल 'यूज और थ्रो' की भाषा बनी रही।  गुलाम मानसिकता के कारण अंग्रेजी से उनकी पुरानी अदावत हैं। अंग्रेजी शासन की मानसिकता रही कि प्रत्येक देशी चीज़ को निकृष्ट मानो, हां यह अलग बात है कि साथ में चोरी से देशी चीजों का दोहन भी करों । आज़ादी मिलने के बाद भी हमारी सोच लगभग वहीं रही । इसी सोच की उपज है- अंग्रेजीवादी मानसिकता । यह एक सोच है। जो एक जहर के रूप में हमारी परंपरा ,भाषा, सोच , व्यवस्था सभी कुछ को बैसाखी आधारित बना रही है। यह समस्या अब ज्यादा विकराल हो रही है। क्योंकि जिस पीढ़ी ने आजादी की लड़ाई लड़ी, देखी, महसूस किया वह अब दिवंगत हो रहीं है। बाकियों के लिए हिंदी या अन्य पक्ष बेकार की बातें है। ऐसे में हमारी भाषा, परंपरा, विरासत के क्षय होने का डर है। इसे पूरे भारतीय समाज के लिए समझना जरूरी है कि हम सब अपनी भाषा, व्याकरण, शब्द, प्रयोग आदि के महत्व को समझे। इस हेतु अंग्रेजी जातिवाद का विरोध जरूरी है और सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण यह कि हिंदी हमारे घरों  में सम्मान से रहे। उसे मूल हक मिले, उसे इंवेट मैनेजमेंट का हिस्सा न बनाया जाए । जो बनाए उसका प्रतिकार हो। बाकी तो जो हो रहा है उसे सब देख ही रहे हैं । सब कुछ सरकारें नहीं करती, कुछ जन दबाव भी जरूरी है ।  इस प्रकार हम स्वतः समझ सकते हैं कि नीरज ने कितना बड़ा कार्य किया है। 
एक और बात 


कुछ लोगों के लिए पूर्वोत्तर विशेष रूप से मिजोरम की मुख्य भाषा अंग्रेजी है पर आज चैनल पर जब भारतीय महिला हाॅकी टीम की खिलाड़ियों का  उनके गौरवमयी प्रदर्शन के लिए साक्षात्कार लिया जा रहा था; तो उसमें भी मिजोरम की महिला खिलाड़ियों के शानदार हिंदी को देखकर लगा कि वास्तव में हिंदी सबकी भाषा हैं । सबको जोड़ने की भाषा हैं । अंग्रेजी तो गुलामी के व्यामोह से उपजी भाषा है। जहां यह आपको अपनी संस्कृति से दूर करती है और भारत में तो यह सांस्कृतिक आक्रमण का हथियार बनती जा रही है । 
आइए हम सब भी प्रत्येक स्तर पर अपनी भाषा को सम्मान दें ।  क्योंकि पेट में गया जहर तो सिर्फ एक व्यक्ति को मारता है पर अंग्रेजी हीनता का कीड़ा करोड़ो भाषाई विकलांगों को जन्म दे रहा है ।

जय हिंद! जय हिंदी!! 

आलेख में हनुमानजी की तस्वीर इसलिए लगाई क्योंकि हनुमानजी से बड़ा आत्म बल का प्रतीक कोई और हो ही नहीं हो सकता । 

#हिंदी  #साकेत_विचार #भारत_की_भाषा_हिंदी 

©डॉ. साकेत सहाय

Saturday, August 7, 2021

विजयी भव: नीरज चोपड़ा - खेल की दुनिया का नया सितारा

 नीरज का अर्थ होता है - कमल का फूल। कहते हैं 'जैसा नाम, वैसा काम'।  बहुधा यह चरितार्थ भी होता है । आज सुबेदार नीरज चोपड़ा ने अपने नाम के अनुरूप धैर्य एवं संयम के साथ ओलम्पिक में स्वर्ण पदक जीत कर भारत को गौरवान्वित किया है। भारत का राष्ट्रीय पुष्प 'कमल' को भारत की पौराणिक गाथाओं में  विशेष स्थान प्राप्त है।   पुराणों में ब्रह्मा को विष्णु की नाभि से निकले हुए कमल से उत्पन्न बताया गया है और लक्ष्मी को पद्मा, कमला और कमलासना कहा गया है।  आज नीरज ने इस नाम को पूरी दुनिया में अपने कर्म बल के साथ स्थापित किया है ।

तोक्यो ओलम्पिक में भारत ने आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में महान धावक मिल्खा सिंह के सपने को भी पूरा किया।  उन्होंने अपने पदक को मिल्खा सिंह को समर्पित किया।  तोक्यो में लंबे समय के बाद इतिहास रचा गया । जो सुनहरे भविष्य का  सूचक बनेगा।  युवा एथलीट नीरज ने एक फौजी के रूप में देश को सम्मानित किया । नीरज चोपड़ा ने अपने पहले ही ओलंपिक में  स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास  रचा है। फाइनल में नीरज ने 87.58 मीटर का थ्रो किया।  ध्यान रहें कि भाला फेंक में पूर्व विश्व विजेता जर्मनी के जोहानेस वेटर ने नीरज को ओलिंपिक से पहले चुनौती दी थी। वेटर ने कहा था कि नीरज अच्छे हैं,  फिनलैंड में उनका भाला 86 मीटर की दूरी तय कर सका, लेकिन ओलिंपिक में वे मुझे पीछे नहीं छोड़ पाएंगे। पर नीरज ने सिर्फ उन्हें पीछे ही नहीं छोड़ा, बल्कि स्वर्ण पदक भी अपने नाम किया। जर्मन खिलाड़ी तो खेल के 3 चरणों के बाद भी सबसे  नीचे से  तीसरे स्थान पर रहने की वजह से खेल से बाहर हो गए।

नीरज ने पूरे देश को जश्न मनाने का मौका दे दिया है। जोहानेस वेटर ने ओलिंपिक से पहले कहा था कि नीरज को उन्हें हराना मुश्किल होगा, पर नीरज ने शब्द की जगह अपने प्रदर्शन से जवाब दे दिया।  नीरज ने पहले थ्रो में 87.03 मीटर दूर भाला फेंका। वे इस थ्रो के बाद ही विश्वास  से भरे दिख रहे थे। नीरज पहले थ्रो के बाद ही समझ गए थे कि इस थ्रो पर कोई न कोई पदक जरूर आएगा।  हालांकि इसके बाद भी नीरज ने कोशिश नहीं छोड़ी और दूसरे थ्रो में और बेहतर प्रदर्शन किया। उन्होंने दूसरे थ्रो में 87.58 मीटर दूर भाला फेंका। नीरज के थ्रो से ही इवेंट समाप्त हुआ। छठे राउंड में नीरज ने 84 मीटर दूर भाला फेंका। 

यह इस प्रतियोगिता का अंतिम थ्रो रहा। इसी के साथ नीरज ने अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखवा लिया।  2016 में भारतीय सेना   से जुड़े नीरज ने आज एक सैनिक की तरह भारत का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है।  नीरज एथलेटिक्स में ऐसा करने वाले पहले भारतीय हैं। नीरज ने ओलिंपिक खेलों में 13 साल बाद भारत को किसी प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक दिलाया।

नीरज की सफलता भी संघर्षमयी  है । सफलता संघर्ष से ही मिलती हैं । 11 वर्ष की आयु  में  इनका वजन 80 किलो था, जिस हाथ से भाला फेंकते हैं वह एक बार टूट चूका है। फिर भी चोट से उबरने के बाद देश को पहले राष्ट्रमंडल, एशियाई खेलों में स्वर्ण दिलाया  और अब मात्र 23 साल की उम्र में ओलंपिक स्वर्ण ।  इनमें योद्धा, लड़ाकू, प्रेरक गाथा, सौम्य, सुंदर, शालीन, मजबूत कद-काठी सभी कुछ हैं असली हीरो की माफिक । हमारा देश कभी योद्धाओं का देश था। कुश्ती, तीरंदाज, तलवारबाज,  भाले फेंकने वाले, हर ओर पाए जाते थे।  लेकिन  विकृत शिक्षा प्रणाली ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया ।  हमारे खिलाड़ी आज विदेशों में प्रशिक्षण प्राप्त कर ये कलाएं सीख रहे हैं। वास्तव में ये सब हमारी प्राथमिकताओं के गलत चयन का उदाहरण  है। अब वक्त आ गया है नीरज को हीरो बनाने का ।  हमारे देश को नीरज जैसे युवाओं की जरूरत हैं । हमारे-आपके बच्चे भी ऐसा कर सकते हैं।  खेल को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है । बच्चों की क्षमता पहचान कर उन्हें उचित खेल हेतु प्रशिक्षण देना हमारी जरूरत है ।  कल प्रधानमंत्री जी ने भी नीरज को भारत में और लोगों को अपनी  तरह तैयार करने का अनुरोध किया ।  उन्होंने कहा कि आप सेना में हैं ऐसा कर  सकते हैं ।  वास्तव में  सेना एक कैरियर से अधिक आपको इंसान बनाता है । 

हमें यह समझना होगा कि रोटी कमाना या मकान- गाड़ी खरीदना ही  जिंदगी का एकमात्र उद्देश्य नहीं है। देश के लिए मान-सम्मान कमाना भी  बड़ी कमाई होती है, आज के दौर में खेलों में  सफलता सिर्फ आपका नहीं, बल्कि पूरे देश का नाम रौशन  करती है। सबसे महत्वपूर्ण स्वस्थ बनाती है ।  नौकरी, व्यापार  का अलग महत्व  है, जीने के लिए चाहिए । पर इसके पीछे अंधी  दौड़ में बच्चों की नैसर्गिक प्रतिभा दब-सी जाती है।  इसी का परिणाम है कि आज हम एक-एक पदक के लिए तरस जाते है ।   

अब हमें असली हीरो को पहचानना सीखना होगा, ताकि देश भी जाने की विजेता कैसे होते है । भारत ने एथलेटिक्स में पहला स्वर्ण जीता है। नीरज ने ओलिंपिक के एथलेटिक्स प्रतियोगिता में 121 साल के  बाद यह पदक जीता है।  भारत का यह टोक्यो ओलिंपिक में आखिरी प्रतियोगिता था और नीरज ने इसका स्वर्णिम अंत किया।  नीरज ने धैर्य एवं सयंम के साथ देश के 1 अरब 35 करोड़ भारतीयों के सपने को जमीन पर उतार दिया।   नीरज ने देश की परंपरा एवं संस्कृति के खेल 'भाला फेंक' में स्वर्ण पदक जीतकर जाने-अनजाने यह भी संकेत दे दिया कि यदि देश को ओलंपिक खेलों में सिरमौर बनना है तो हमें युवाओं को उन खेलों से ज्यादा जोड़ना होगा, जो भारतीय संस्कृति के प्रतीक हैं । 

विजयी भव! नीरज




सुब्रह्मण्यम भारती जयंती-भारतीय भाषा दिवस

आज महान कवि सुब्रमण्यम भारती जी की जयंती है।  आज 'भारतीय भाषा दिवस'  भी है। सुब्रमण्यम भारती प्रसिद्ध हिंदी-तमिल कवि थे, जिन्हें महा...