Tuesday, May 20, 2025

हिंदी और भारतीय भाषाओं का अंतर संबंध-सुमित्रानंदन पंत की जयंती पर

 



आज प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पन्त जी की जयंती है। उनके कृतित्व को शत-शत नमन!  कभी अमिताभ बच्चन के पिता, हिंदी के प्रसिद्ध कवि हरिवंश राय बच्चन ने सुमित्रानंदन पंत के सुझाव पर ही अपने पुत्र का नाम  'अमिताभ' रखा, जिसका अर्थ है कभी न मिटने वाली आभा। आज हम सभी इस आभा से परिचित हैं। 

हिंदी एवं भारतीय भाषा प्रेमियों को भी अपने भाषा चिंतकों, साहित्यकारों के आभा एवं कार्य को सम्मान देना होगा। उसका प्रसार करना होगा। यह आभा है - भारतीय भाषाओं की शाब्दिक एकरूपता की। वास्तव में सभी भारतीय भाषाएं आपस में घुली-मिली हुई है। क्योंकि संस्कृत भाषा सभी की मूल स्रोत है।  साथ ही इससे भी महत्वपूर्ण  है - देश की भाषाई एवं सांस्कृतिक अभिन्नता की।  जिसके कारण शब्द और भाव लगभग एक समान होते है। यही कारण है कि ब्रिटिश पराधीनता के समय इस महत्वपूर्ण एवं आवश्यक तत्व को देश की सांस्कृतिक एवं सामाजिक एकता के लिए महात्मा गांधी से लेकर सभी राष्ट्रनायकों ने हिंदी के प्रयोग व इसे अपनाने पर जोर दिया था। इस शाब्दिक एकरूपता रूपी आभा के प्रसार के लिए देवनागरी लिपि के प्रसार की महती आवश्यकता है। कभी आचार्य  विनोबा भावे ने कहा था ''यदि सभी भाषाएं देवनागरी लिपि को अपना लें तो कोई भाषाई अंतर रहेगा ही नहीं। बतौर उदाहरण आइए समझते है इस शाब्दिक एकरूपता को-

एक शब्द है नागफनी।  आइए जानते है दूसरे भारतीय भाषाओं में इसे क्या कहते है और  समझते है कैसे इतनी भाषायी निकटता है-


पंजाबी- चित्तार थोहर 

हिमाचल-नागफन

बिहार- चपड़ा, नागफनी

उत्तर प्रदेश-चपड़ा/नागफनी

महाराष्ट्र -चापल 

कर्नाटक -पापसकल्ली

केरल - नागामुल्लु

पं.बंगाल- नागफना।

उड़ीसा - नागोफेनिया

आंध्र प्रदेश - नागाजेड़्डु 

तमिलनाडु- नागाथली


दूसरा शब्द लेते हैं-रसोई


रसोई 


रसोई वह स्थान जहाँ रसपूरित व्यञ्जन बनाए जाते हैं, इसका अर्थ स्वादिष्ट भोजन भी है। यह संस्कृत भाषा के शब्द रसवती का तद्भव रूप है जो शौरसेनी प्राकृत के 𑀭𑀲𑀯𑀤𑀻 (रसवदी) के रूप से हो कर रसवै बनता हुआ हिन्दी भाषा में रसोई हो गया।


आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं में इसके स्वरूप हैं:

कुमाऊँनी: रस्या

नेपाली: रसोई

बंगाली: रसुइ, रोसाइ

बिहारी, अवधी, हिन्दी: रसोई

मारवाड़ी: रसोई (भोजन), रसौड़ा (भोजन बनाने का स्थान)

गुजराती: रसवई (भोजन), रसोई (स्थान)

पहाड़ी (पश्चिमी) रेसोइ

गढवाली: रुसइ

पंजाबी: ਰਸੋਈ (रसोई)

मराठी :  स्वयंपाक घर, भोजनगृह, भोजन पकाने वाला

सिन्धी: रसोयो (भोजन पकाने वाला)

उडिया: रसोया, रसुया

हिन्दी; रसोया, रसोइया

गुजराती: रसोइयो


तीसरा शब्द लेते हैं - पुण्य

पुण्य 

संस्कृत - पुण्यम्

पंजाबी- पुन्न

उर्दू- कारे सवाब(कारे-ख़ैर) (सवाब)

कश्मीरी-पोन्य

सिंधी- पुण्यु

मराठी- पुण्य 

कोंकणी- पुण्य

गुजराती- पुण्य

नेपाली- पुण्य

बांग्ला- पुण्यम् 

असमिया- पुण्य

मणिपुरी- पुण्य

ओड़िया-पुण्य

तेलुगू- पुण्यमु

तमिल- पुन्नियम

मलयालम- पुण्यम्

कन्नड़-पुण्य

डोगरी- पुन्न

संताली- पुण्य

मैथिली - पुण्य

भोजपुरी- पुण्य

बोडो- फुन्य


ऐसे अनेक शब्द है जो भारतीय भाषाओं की शाब्दिक एकरूपता को  स्वतः प्रमाणित करते है। इन उदाहरणों द्वारा इसे आसानी से समझा जा सकता  है।  हालाँकि आलोचक गाँधी जी के हिंदी के प्रयोग के आग्रह के प्रति और  विनोबा भावे के देवनागरी के आग्रह को लेकर सांस्कृतिक विलगन अर्थात कल्चरल लैग की बात करते है। जो बताता है कि सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में सम्यता पक्ष सांस्कृतिक पक्ष की तुलना में अपेक्षाकृत तेजी से आगे बढ़ता है जिसकी वजह से सम्यता सूचक घटकों और सांस्कृतिक प्रतीकों के बीच एक प्रकार की दूरी आ जाती है।  आज वही दूरी तकनीकी प्रगति एवं अपनी भाषाओं से दूरी अपनाने के कारण मोबाइल, टैबलेट, एंड्रॉएड के विकास क्रम में देवनागरी के इस्तेमाल में दिख रही है जहाँ लोग हिंदी क्या हिंदीतर भाषाओं को भी रोमन लिपि में सहजता से व्यक्त कर रहे हैं। हालांकि देवनागरी का प्रयोग बढ़ा है। पर रोमन लिपि कहीं न कहीं भारतीय भाषाओं की लिपियों का अतिक्रमण कर रही है जो युवा पीढ़ी के बीच से हिंदी एवं भारत की प्रमुख लिपि देवनागरी को विस्थापित कर रही है। इस विस्थापन को समय रहते समझना होगा। तभी हिंदी की आभा का प्रसार होगा और  अपने साहित्यकारों को सच्ची श्रद्धांजलि दे पायेंगे। 🙏🌷


©डॉ. साकेत सहाय

#साकेत_विचार

Wednesday, May 7, 2025

गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर

 


साहित्य के माध्यम से भारतीयता को विश्व भूमि पर जीवंत करने वाले गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की जयंती पर शत शत नमन! 

भारतीय साहित्य जगत के लिए 7 मई का दिन सुनहरे शब्दों में लिखा गया है। 1861 में आज ही के दिन गुरुदेव रबीन्द्र नाथ टैगोर का जन्म हुआ, जिन्हें एक कवि, लघु कथा लेखक, गीतकार, संगीतकार, नाटककार, निबंध लेखक और चित्रकार के तौर पर इतिहास में एक युग पुरुष का दर्जा हासिल है। कविगुरु बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगदृष्टा माने जाते हैं। आप अपनी कृति ‘गीतांजलि’ के लिए एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार से सम्मानित व्यक्ति हैं। भारत का राष्ट्र-गान 'जन गण मन' गुरुदेव की ही रचना हैं।  रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रदत्त ‘सर’ की उपाधि जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में वापस कर दी थी।  गुरुदेव ने 13 अप्रैल 1919 को हुए इस हत्याकांड की निंदा करते हुए 31 मई 1919 को यह उपाधि लौटा दी थी। आप गीतांजलि की "गहन संवेदनशील, ताजा और सुंदर" कविता के लेखक थे। वर्ष 1913 में, रवींद्रनाथ ठाकुर किसी भी श्रेणी में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले पहले गैर - यूरोपीय बने और साहित्य में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले पहले गीतकार भी थे।


रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भारतवर्ष को 'महामानवसमुद्र' कहा है, जिसका अर्थ है कि यह देश विभिन्न मानव जातियों का संगम है। यहाँ अनेक जातियाँ आईं और उन्होंने इस देश के निर्माण में योगदान दिया। यह एक अद्भुत मिश्रण है, जिसमें हिन्दू रीति-नीति का विकास हुआ।


कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ईश्वर से दुःख कम करने की प्रार्थना नहीं करते, बल्कि वे दुःखों से सफलतापूर्वक संघर्ष करने की शक्ति प्रदान करने की कामना करते हैं। वे विपत्तियों से जूझने की क्षमता प्रदान करने और उन परिस्थितियों में निर्भीक बनाने की प्रार्थना करते हैं। वास्तव में, कवि अपने दुःखों का भार स्वयं सहन करना चाहता है।


गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर हिंदी भाषा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहते हैं – ‘’भारतीय भाषाएं नदियाँ हैं और हिंदी एक महानदी है, जो भारत की विविधतापूर्ण संस्कृति को एक सूत्र में पिरोती है। उन्होंने हिंदी को भारतीयता का प्रतीक और संस्कृति का संवाहक माना।


उनकी स्मृति को शत शत नमन !

-डॉ साकेत सहाय 

भाषा -संचार विशेषज्ञ 

#kaviguru #RabindranathTagoreJayanti

#साकेत_विचार

Wednesday, April 16, 2025

भारतीय रेल दिवस

 





आज का दिन भारतीय परिवहन के लिए विशेष है।  आज ही के दिन भारतीय रेल की शुरुआत हुई थी।  16 अप्रैल, 1853 को पड़ी बुलंद नींव की यह देन है कि आज भारतीय रेल  के यात्री वंदे भारत, राजधानी एक्सप्रेस, शताब्दी एक्सप्रेस और संपर्क क्रांति एक्सप्रेस जैसी तेज और सुविधाजनक रेलगाड़ियों से यात्रा करते हैं। इस विशिष्ट यात्रा को तय करने में रेलवे को 172 साल लग गए हैं। रेलवे ने अखण्ड भारत को देखा है और विभाजित भारत को भी देखा है। रेलवे ने बँटवारे की त्रासदी को भी भोगा है।  भारत में रेलवे की शुरुआत लॉर्ड डलहौज़ी द्वारा की गई थी।  16 अप्रैल 1853 के दिन ही भारत में पहली बार रेल ने रफ्तार पकड़ी थी। देश में मुंबई के बोरीबंदर से ठाणे के बीच पहली यात्री (पैसेंजर) गाड़ी चलाई गई थी।  इस ट्रेन को साहिब, सुल्तान, और सिंध नाम के तीन इंजनों ने खींचा था। इस ट्रेन में 13 डिब्बे थे और इसमें 400 यात्री सफ़र करने आए थे।  रेल के निर्माण का श्रेय सर आर्थर कॉटन को दिया गया था।  भारतीय रेल के इस छोटे से सफर ने देश में परिवहन की संपूर्ण तस्वीर ही बदल दी थी। आप सभी को राष्ट्र की जीवन रेखा ‘भारतीय रेल’ के जन्मदिन की ढेर सारी बधाई !

-डॉ साकेत सहाय 

भाषा-संचार विशेषज्ञ 

#साकेत_विचार

#indianrailways

Friday, April 11, 2025

पी एन बी-एक ऐतिहासिक धरोहर



 पंजाब नैशनल बैंक के १३१ वें स्थापना दिवस की पूर्व संध्या पर आप सभी से एक ऐतिहासिक चित्र साझा कर रहा हूँ, जो बैंक की ऐतिहासिक यात्रा का जीवंत दस्तावेज है । एक ऐसा दस्तावेज जो आपको इस संगठन के सुनहरे सफ़र से जोड़ता है । यह तस्वीर एक शिलापट्ट रूपी दस्तावेज है जो आज भी अविभाजित भारत के महत्वपूर्ण शहर लाहौर वर्तमान के पाकिस्तान के सर गंगा राम अस्पताल में सुरक्षित है । तब इस अस्पताल में बैंक ने एक हॉल का निर्माण तब के ₹६५०० की लागत से पंजाब नेशनल बैंक लिमिटिड लाहौर की ओर से उपहार स्वरूप कराया था। तब ऐतिहासिक तारीख़ थी-2-9-43.

और लिखा गया-6500/-रुपये की लागत से निर्मित यह हॉल पंजाब नेशनल बैंक लिमिटेड, लाहौर का उपहार है। जिंदाबाद पीएनबी! यह सफ़र जारी रहें । 

आप सभी को स्थापना दिवस की बहुत बहुत बधाई!

यह पोस्ट देशवासियों को भाषा, पंथ और समाज की कुत्सित नीति को समझने का संकेत भी है । जब आज हिंदी को उर्दू, पंजाबी और अन्य भाषाओं से लड़ाने का खेल जारी है परंतु उस समय हिंदी और हिंदीतर का कोई भेद नही था । तभी तो  यह पट्ट हिंदी में है ।

सादर,

डॉ साकेत सहाय

Wednesday, March 26, 2025

महादेवी वर्मा

आज हिंदी साहित्य की महान साहित्यकार महादेवी वर्मा (२६ मार्च १९०६ - ११ सितम्बर १९८७) की जयंती है ।  आप महान कवियित्री, निबंधकार, रेखाचित्रकार और हिन्दी साहित्य की प्रख्यात हस्ती थीं। आपको हिन्दी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माना जाता है। महादेवी का जन्म 26 मार्च 1907 को प्रातः 8 बजे फ़र्रुख़ाबाद उत्तर प्रदेश, भारत में हुआ। उनके परिवार में लगभग 200 वर्षों या सात पीढ़ियों के बाद पहली बार पुत्री का जन्म हुआ था। अतः बाबा बाबू बाँके विहारी जी हर्ष से झूम उठे और इन्हें घर की देवी — महादेवी मानते हुए पुत्री का नाम महादेवी रखा। कायस्थ पुत्री महादेवी वर्मा ने अपने बचपन में सबसे पहली पुस्तक पंचतंत्र पढ़ी। महादेवी वर्मा के परिवार में बाबा फ़ारसी और उर्दू जानते थे। पिता ने अंग्रेज़ी पढ़ी थी। परिवार में हिंदी का कोई वातावरण नही था। प्रसिद्ध कवियित्री महादेवी वर्मा को अपने निजी जीवन में कई तरह के दुखों का सामना करना पड़ा था।  विरह, वेदना, और करुणा उनकी कविता का अहम हिस्सा है।  महादेवी वर्मा रहस्यवाद और छायावाद की कवयित्री थीं, अतः उनके काव्य में आत्मा-परमात्मा के मिलन विरह तथा प्रकृति के व्यापारों की छाया स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है। वेदना और पीड़ा महादेवी जी की कविता के प्राण रहे। उनका समस्त काव्य वेदनामय है। उन्हें निराशावाद अथवा पीड़ावाद की कवयित्री कहा गया है।उन्होंने प्रकृति के माध्यम से जीवन की गहराइयों को उजागर किया। महादेवी वर्मा न केवल कवयित्री थीं, बल्कि संगीत और चित्रकला में भी निपुण थीं। उनके गीतों में संगीत का नाद-सौंदर्य स्पष्ट झलकता है। उनके लेखन ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया और उन्हें आधुनिक मीरा के नाम से भी जाना जाता है। 

महादेवी वर्मा की प्रमुख काव्य-कृतियाँ हैं - नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत, यामा और दीपशिखा । कविता के अतिरिक्त उन्होंने सशक्त गद्य भी रचा है, जिसमें रेखाचित्र तथा संस्मरण प्रमुख हैं। पथ के साथी, अतीत के चलचित्र तथा स्मृति की रेखाएँ उनकी कलात्मक गद्य रचनाएँ हैं । 

महादेवी यों ही उनका नाम नहीं था।  हिंदी साहित्य के महान कवि निराला महादेवी को 'सरस्वती' नाम से पुकारते थे. उन्हें आधुनिक युग की 'मीरा' भी कहा जाता है।  

उनका प्रसिद्ध उद्धरण -कष्ट और विपत्ति मनुष्य को शिक्षा देने वाले श्रेष्ठ गुण हैं, जो साहस के साथ उनका सम्मान करते हैं। - महादेवी वर्मा


इस अवसर पर उनकी प्रसिद्ध रचना-


बया हमारी चिड़िया रानी


बया हमारी चिड़िया रानी

तिनके लाकर महल बनाती,


ऊँची डाली पर लटकाती,

खेतों से फिर दाना लाती,


नदियों से भर लाती पानी।

तुझको दूर न जानें देंगे,


दानों से आँगन भर देंगे,

और हौज में भर देंगे हम,


मीठा-मीठा ठंडा पानी।

फिर अंडे सेयेगी तू जब,


निकलेंगे नन्हें बच्चे तब,

हम लेंगे उनकी निगरानी।


फिर जब उनके पर निकलेंगे,

उड़ जाएँगे बया बनेंगे,


हम तब तेरे पास रहेंगे

तू मत रोना चिड़िया रानी।

स्रोत :पुस्तक : वीणा (पृष्ठ 25) रचनाकार : महादेवी वर्मा प्रकाशन : एनसीईआरटी  संस्करण  : 2022


-संकलनकर्ता-डा. साकेत सहाय 

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Saturday, March 22, 2025

बिहार दिवस




बिहार से जुड़ाव भारत के विशिष्ट इतिहास से जुड़ने का सुखद संयोग है । जय बिहार! जय भारत! 

कभी डा. राजेन्द्र प्रसाद ने कहा था- ‘यह कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि सदियों तक भारत का इतिहास वस्तुत: बिहार का इतिहास था।‘‘ 

बिहार के बारे में कहा जा सकता है देश बना है जिस मिट्टी से उसकी हिस्सेदारी हूँ..!

बुद्ध, महावीर, चंद्रगुप्त के गौरव का अधिकारी हूँ..!! हाँ, मैं बिहारी हूँ..!!! पर उससे अधिक भारतीय हूँ। 

सभी भारतवासियों को बिहार दिवस की हार्दिक बधाई!

#साकेत_विचार

#बिहार

#बिहार_दिवस

Friday, March 14, 2025

लाल बहादुर शास्त्री-सादगी की प्रतिमूर्ति

 प्रेरक प्रसंग 



स्टेशन की आखिरी ट्रेन प्लेटफार्म से रवाना हो चुकी थी । एक वृद्ध महिला ट्रेन के इंतजार में बैठी हुई हैं। अगली ट्रेन कल सुबह आएगी... एक कुली ने यह देखा और मां से पूछा - माताजी, आप कहां जा रही हैं? मैं दिल्ली अपने बेटे के पास जाऊंगी । आज कोई ट्रेन नहीं है माताजी । महिला असहाय दिख रही थी। कुली ने दयालुता दिखाते हुए महिला को प्रतीक्षालय में आश्रय देने की पेशकश की। वह सहमत हो गई। कुली ने उनसे उसके बेटे के बारे में पूछा.. मां ने जवाब दिया कि उसका बेटा रेलवे में काम करता है। नाम बताओ। देखें संपर्क हो सकता है या नहीं... वृद्ध महिला ने कुली से कहा - वह मेरा लाल है, सब उसे लाल बहादुर शास्त्री कहते हैं! (वृद्ध महिला ने कहा) भारत माँ का  महान सपूत तब भारत का रेल मंत्री था। एक पल में, पूरे स्टेशन में हलचल मच गई। जल्द ही, सैलून कार आ गई। वृद्ध महिला हैरान थी। लाल बहादुर शास्त्री को कुछ भी पता नहीं था ।  ऐसे भी लोग होते थे , समाज में अब भी ऐसे लोग हैं बस उन्हें प्रोत्साहन और हौसले की जरूरत है । 🙏

#शास्त्री #लाल_बहादुर 

#साकेत_विचार

एआई कैमरे का गजब कारनामा....!

 एआई कैमरे का गजब! पीठ पर टंगे गिटार को समझा ‘सवारी’, बिना हेलमेट बताकर काट दिया ₹500 रुपए का चालान!  आईटी नगरी बेंगलूरु की यह घटना केवल यंत...