Saturday, May 7, 2022

न्यायालय की भाषा

 आज सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,  देश के विधि मंत्री द्वारा न्यायालयों में स्थानीय भाषाओं के प्रयोग पर जोर देने की बात पर मन में यह विचार आया कि क्या हम हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में परस्पर सद्भाव के बिना इस महत्वपूर्ण विमर्श को साकार कर सकते है?   इस हेतु यह ज़रूरी है ……


देश में भाषिक समुन्नति हेतु भारतीय भाषाओं की परस्पर एकता को सुदृढ़  किया जाए। हमारी ‘फ़िज़ूल’ की भाषिक लड़ाई का अक्सर फ़ायदा अंग्रेज़ी उठातीं रही है। इस परस्पर वैमनस्य का सबसे बड़ा लाभ अंग्रेज़ी भाषा ने उठाया है। अंग्रेज़ी के बारे में दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि औपनिवेशिक दासता की मूल भाषा होने के  बावजूद  देश के नेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों, मीडिया में  इसके प्रति शून्य नकारात्मकता मौजूद है। जिससे यह भाषा बड़ी तेज़ी से हमारी अपनी भाषाओं की जगह हड़प  रही है। इस दिशा में सोचा जाना बेहद ज़रूरी है।

#साकेत_विचार

#अंग्रेज़ी_का_वर्चस्व

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और लोकतंत्र

लोकतंत्र की वास्तविक सार्थकता तभी सत्य सिद्ध होती है जब जनता और शासन व्यवस्था के बीच बेहतर संवाद कायम हो।  इस संवाद को बेहतर तरीके से निष्पादित करने का कार्य संचार माध्यम करते है।  लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने में संचार माध्यमों की बड़ी भूमिका है। संचार माध्यमों ने भारत के संसदीय जीवन में निर्णायक भूमिका निभाई है।  विशेष रूप से 1990 के दशक के बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने लोकतंत्र को बहुत ही अधिक प्रभावित किया है।  इस माध्यम ने प्रेस के दोनों मुख्‍य पहलूओं यथा सूचना उद्योग के एक भाग के रूप में तथा दूसरा- जनमत तैयार करने के एक कारक के रूप में अत्यंत प्रभावी और विश्‍वसनीय तरीके से कार्य किया है।  हालांकि इस विश्वसनीयता पर विवाद हावी हो चला है, जिससे विवाद से मीडिया को सत्य के साथ संतुलन बनाते हुए आगे आना होगा।  इन्हीं सब बिंदुओं को रेखांकित करता मेरा आलेख “इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और लोकतंत्र” को जगह मिली है प्रतिष्ठित पत्रिका “अपनी माटी” के मीडिया विशेषांक में…

शोध आलेख : इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एवं लोकतंत्र / डॉ. साकेत सहाय | https://www.apnimaati.com/2022/03/blog-post_35.html


विश्व प्रेस दिवस

३ मई को संपूर्ण विश्व में ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस’ (World Press Freedom Day)  चौथे स्तम्भ के सभी कलमकारों को बधाई व शुभकामनाएं।

 ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस’ का मुख्य विषय (Theme) ‘‘सूचना और मौलिक स्वतंत्रता जन जन तक पहुंचे-यह हमारा अधिकार है!’ (Access to Information and Fundamental Freedoms-This is Your Right!) है।

ज्ञातव्य है कि वर्ष 1993 में  यूनेस्को में हुए महासम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 3 मई को प्रतिवर्ष विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाने की घोषणा की थी।

इस दिवस को मनाने का उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता का मूल्यांकन करना, प्रेस की स्वतंत्रता पर बाह्य तत्वों के हमले से बचाव करना एवं प्रेस की स्वतंत्रता के लिए शहीद हुए संवाददाताओं की यादों को सहेजना है।


#साकेत_विचार

सांप्रदायिकता

 जब देश एक विशेष मत, पंथ, मजहब के नाम पर बँटा नहीं था, तब भी साम्प्रदायिकता पर गंभीर विमर्श होता था, पर कथित धार्मिक असहिष्णुता के नाम पर, अंध राष्ट्रवाद के नाम पर, तमाम क्षुद्रताओं ने पाकिस्तान को आख़िरकार जन्म दे ही दिया, पर इससे भारत को क्या मिला? धोखा और अविश्वास। आज भी जब-तब भाषा एवं संस्कृति को लेकर विवाद होते रहते है। 

साम्प्रदायिकता पर दैनिक हिंदुस्तान द्वारा ०७ मई, २०२२ के अंक में राष्ट्रवादी विचारक एम एस गोलवलकर तथा प्रसिद्ध साहित्यकार प्रेमचंद के विचार को प्रकाशित किया गया है।  जिसके कुछ अंश आप सभी के लिए…


१. 


हम इतने क्षुद्र नहीं हैं कि यह कहने लगें कि केवल पूजा का प्रकार बदल जाने से कोई व्यक्ति उस भूमि का पुत्र नहीं रहता। हमें ईश्वर को किसी नाम से पुकारने में आपत्ति नहीं है।हममें प्रत्येक पंथ और सभी धार्मिक विश्वासों के प्रति सम्मान का भाव  है, जो अन्य पंथों के प्रति असहिष्णु है वह कभी हिंदू नहीं हों सकता। 

- एम एस गोलवलकर, राष्ट्रवादी विचारक एवं पूर्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक प्रमुख। 


२. साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है। उसे अपने असली रूप में निकलते शायद लज्जा आती है। …। अब संसार में केवल एक संस्कृति है और वह है आर्थिक संस्कृति। हालाँकि संस्कृति का धर्म से कोई सम्बंध नहीं। आर्य संस्कृति है, ईरानी है, अरब है, लेकिन ईसाई, इस्लाम संस्कृति नहीं।  हिंदू यदि मूर्ति पूजक है तो क्या मुसलमान कब्र पूजक और स्थान-पूजक नहीं। भाषा भी धर्म विशेष की नहीं होती। 

-प्रेमचंद, प्रसिद्ध साहित्यकार


साभार एवं संकलन #साकेत_विचार

रवीन्द्रनाथ ठाकुर, नोबेल पुरस्कार और मौलिकता


 महान कवि और साहित्यकार और देश के राष्ट्रगान के रचयिता, नोबेल पुरस्कार विजेता रबीन्द्रनाथ टैगोर के जन्मदिवस पर शत शत नमन! उनके जन्म दिवस पर उनसे जुड़ा एक वृतांत “ मूल विचार हम अपनी भाषा में कर सकते हैं वह विदेशी भाषा में नहीं। विदेशी भाषा में हमारे विचार विदेशियों की झूठन के अतिरिक्त और कुछ नहीं” 

१९१३ में जब  टैगोर को नोबल पुरस्कार मिला तब सरोजिनी नायडू (अंग्रेजी भाषा की ख्याति प्राप्त साहित्यकार) का नाम भी इस पुरस्कार के लिए नामित था। भारतीय साहित्य जगत के लोग ऐसा कहते हैं कि सरोजिनी नायडू किसी भी प्रकार से रबीन्द्रनाथ ठाकुर से कम नहीं थी, इक्कीस ही होंगी। फिर यह कैसे हुआ कि नोबेल पुरस्कार समिति ने रबीन्द्रनाथ टैगोर को इस पुरस्कार के लिए चुना। यहीं प्रश्न चयन समिति से भी किया गया था। चयन समिति का उत्तर बहुत ही महत्वपूर्ण है। चयन समिति ने कहा कि सरोजिनी नायडू के साहित्य में नया कुछ भी नहीं है। वही सब कुछ है जो यूरोप और पश्चिम के साहित्य में आपको बहुतायत में मिल जायेगा। इसके विपरित हमें रबीन्द्रनाथ की कविताओं में एक ताजगी और नयापन मिलता है जो पश्चिमी साहित्य में कहीं दिखाई नहीं देता। 

इस वृतांत का निहितार्थ यहीं है कि विश्व को यदि हम कुछ दे सकते हैं तो वह अपनी मूल भाषा और उसके चिन्तन से ही दे सकते हैं।  रवीन्द्रनाथ ठाकुर के जन्मदिवस पर  इसी वृतांत के साथ उन्हें शत शत नमन!  

Wednesday, May 4, 2022

हिंदी -भारत की भाव भाषा

 


हिंदी पर चल रहे ‘नाहक’ विवाद और इसकी सर्वप्रियता पर कुछ भाव उपजे, जिसे आप सभी से साझा कर रहा हूँ….


मुझे हिंदी से प्रेम है

बचपन से है यह मुझसे

घुली-मिली

पेशावर से पोखरण तक 

कोच्चि से चटगाँव तक


किसी के लिए है यह राष्ट्रीय भाषा 

किसी के लिए है यह राष्ट्रभाषा

किसी के लिए है यह संपर्क भाषा

किसी के लिए है यह जनभाषा 

पर भाव एक ही है 

सबके लिए है यह 

प्रेम, लगाव और जुड़ाव की भाषा

तभी बनी देश की राजभाषा

है यह संस्कृत की पुत्री

पर सींचित हुई सभी से

कभी दक्षिण से 

कभी उत्तर से

कभी पूर्व से 

कभी पश्चिम से


है बड़ी सहज, 

बड़ी सरल,

हर कोई करें 

इसका सम्मान।

संस्कृत इसकी जननी है,

है यह प्रेम और लगाव की भारत सूत्र।


भारत माँ है 

भाषाओं की थाल,

पर हिंदी है हम सबकी चहेती

हिंदी को जब मन से पढ़ा

जाग्रत हुआ भारत-विवेक।


हिंदी से स्वाधीनता, 

एकता, संपर्क के भाव हो पूरे। 

लिखते-बोलते कवि, लेखक, नेता, अभिनेता हिंदी में

बड़े-बड़े संदेश भी अक्सर

बोले-सुने जाते हिंदी में।


गांधीगीरी से आज़ाद-भगत ,

कबीर से रवीन्द्र

तुलसी से प्रेमचंद 

नानक से शिवाजी तक

लता से रफी 

आशा से किशोर

राजेंद्र से कलाम तक

फुले से बाबा साहब तक

संत नामदेव से कविवर सुब्रमण्यम तक

सब हिंदी को ज़ुबाँ से दिल तक लाए


है हिंदी माँ भारती की आवाज़

हिंदी देती सबको मान

सरल-सहज शब्दों में 

सब इसका करें बखान।

अरब से लेकर अमरीका तक। 


हिंदी मिले, जब दिल से

निकले दिल से प्रेम की ज्योति

है यह सब भाषाओं की संपर्क सूत्र

इसीलिए सबको लगे विशेष।


जब बोले हम हिंदी में

हो जाए हम एक

आइए हम सब मिल करें 

एक पहल

करें सम्मान हिंदी का, 

समझे इसका मान

हिंदी है भारत की अमर वाणी !!


जय हिंद!! जय हिंदी!!

सर्वाधिकार सुरक्षित •साकेत सहाय

#साकेत_विचार


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Thursday, April 14, 2022

एक अम्बेडकर जो भूला दिये गये

एक अंबेडकर जो भुला दिये गये...  

ये वह महान व्यक्ति हैं जिनसे आज बहुत कम लोग परिचित होंगे।  यह ब्राह्मण अध्यापक, कृष्णाजी केशव अंबेडकर हैं। जिन्होंने अपने विद्यार्थी भीमराव सकपाल को अपना उपनाम देकर भीमराव अंबेडकर बनाया। उनको पढ़ाया-लिखाया तथा आगे अध्ययन के लिए विदेश भेजने हेतु गायकवाड़ बड़ौदा महाराज से सिफारिश करके   छात्रवृत्ति की व्यवस्था करवाई।  सचमुच समरसता और एकता हमारे समाज का सदा से अभिन्न अंग रही है। यह सामाजिक एकता सदैव भारत मे बनी रहे ताकि बाबा साहेब जैसी महान विभूतियाँ इस पावन धरा को सुसज्जित करती रहें। ek


सादर नमन

परीक्षा सुधार समिति

 परीक्षा विवाद के बीच सरकार द्वारा श्री नंदन नीलेकणी को दी गई बड़ी जिम्मेदारी!  नीट परीक्षा व्यवस्था पर उठे सवालों के बीच केंद्र सरकार ने आज...