Wednesday, December 3, 2014

भूले -बिसरे देशरत्न

 
 
आज देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की जन्मतिथि है। वास्तव में भारतरत्न थे। तीन बार कांग्रेस की अध्यक्षता करने वाले, संविधान सभा के पहले अध्यक्ष राजेंन्द्र बाबु अजातशत्रु थे। सदैव देशहित के लिए जिए। इसीलिए पटेल,गांधीजी या नेहरु की तरह अपना आभामंडल न तैयार कर पाए। गांधीजी को वास्तव में गांधी बनाने में उनका भी बड़ा योगदान था। चंपारन सत्याग्रह में राजकुमार शूक्ल के साथ उनकी भी भूमिका थी। परंतु,ह्मारे देश में आजादी के बाद उन्हीं नेताओं की पूछ ज्यादा होती है जिसके पीछे बड़ा वोट बैंक हो। उदाहरण आप सभी के सामने है, अंबेडकर, नेहरु,पटेल, (दलित, ब्राहमण,ओबीसी) क्षमा कीजिएगा,इसमें इन नेताओं की गलती नहीं है।

चूंकि, राजेंद्र बाबु के पीछे कोई बड़ा वोट बैंक नहीं था,इसीलिए आज उन्हें कोई टिवटर पर याद नहीं करता। और उनकी जयंती पर कोई बड़ा अभियान नहीं चलाया जाता। सत्ता या विपक्ष सब नंगे है।

Sunday, August 3, 2014

जीवन

मानव जीवन से जुड़ी सारी चीजें स्वयं एक कहानी है। चाहे इसे 140 शब्दों में लिखें या 14000 या 1400000 में मतलब एक ही है जिंदगी बाधाओं, सफलताओं, रुसवाईयों से गुजर कर ऊपर जाने का नाम है।

साकेत सहाय
ब्लॉग www.vishwakeanganmehindi.blogspot.com

हिंदी का प्रश्न



बार-बार मन में यह प्रश्न कौंधता है कि देश की भाषा समस्या का कारण क्या है क्या यह समस्या एक विशेष भाषा से राजनैतिक दुराव की देन है या अंग्रेजीवादी मानसिकतावादी से एक अतिरिक्त लगाव की उपज।  दोनों ही विचार मन में आते है।  लेकिन इस स्थिति का जिम्मेवार कौन है ? जबकि संविधान सभा ने  सर्वसम्मति से हिन्दी को राजभाषा घोषित किया था। हमारे जन प्रतिनि‍धियों ने भी हिन्दी की महत्ता एवं गुणों को स्वीकारते हुए वर्ष 1947 में ही इसे संघ की राजभाषा के रुप में स्वीकार किया था।  क्या हमारी राजभाषा भी सरकार के अन्य चिन्हों,  प्रतीकों की तरह प्रतीकवाद की शिकार हो गई ?


हम सभी इसका दोष आसानी से राजनैतिक दलों या सरकार को देते है।  परंतु, क्या हमने अपने अंदर कभी झाँकने की कोशिश की है ?  कि हम सभी अपने कर्तव्य पालन हेतु कितने तत्पर है? हिन्दी महज भाषा नही वरन् राष्ट्रवाद की प्रतीक है।  फिर क्यों हम अपने तथाकथित राजनैतिक, व्यक्तिगत हितों के तले राष्ट्रनायकों की वास्तविक इच्छा को रौंद रहे है।  और – तो - और, जिन राजनैतिक वजहों से हिंदी वास्तविक सत्ता को प्राप्त नहीं कर पाई तो वहीं दूसरी भारतीय भाषाएं भी इसी मानसिकता की शिकार हो अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है।  और इसका फायदा विदेशी भाषा के पोषक उठा रहे है। 

दिक्कत तो इस बात की है कि भारतवर्ष में अंग्रेजी की 250 वर्षों की प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष गुलामी के चलते हमने इसे जितनी इज्जत, मान-सम्मान बख्शी उसके बाद भी यह भाषा जनभाषा तो दूर भारतवर्ष की 2 % से ज्यादा लोगों तक अपनी पहुंच बना पाने में असफल रही है।  फिर भी हम सब  ‘’ घर की मुर्गी दाल बराबर ‘’ मानसिकता की शिकार होकर अंग्रेजीवादी मानसिकता को सींच रहे है और इस वजह से हमारी हालत ‘’ धोबी का कुत्ता घर का न घाट ’’  का होकर रह गई है।  इसी सोच की वजह से हमारी शिक्षा व्यवस्था भी दिन-प्रतिदिन तथ्यहीन व नकलवादी बनती जा रही है।  अपनी भाषा से दूर रहने का ही कारण है कि इतनी विशाल जनसंख्या वाला देश होने के बावजूद आज भी हमारा देश सिर्फ चंद नोबेल पुरस्कार ही हासिल कर पाया है। कारण कि निज भाषा में शिक्षण पद्धति का विकास नहीं होने के कारण ही आज भी हमारी भाषा तकनीक व विज्ञान की भाषा बनने से कोसों दूर है। 

हालांकि यह सर्वज्ञात तथ्य है कि हिन्दी में वे सभी गुण है जो किसी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने की पात्रता रखते है। भारत की दूसरी अन्य भाषाओं की तरह हिन्दी का जन्म भी संस्कृत से हुआ है तो वहीं यह उर्दू के भी करीब है। यानि देश की गंगा-जमुनी तहजीब की भाषा हिन्दी ही है।  संपूर्ण भारत में  एक साथ बोली व समझी जाने वाली एकमात्र भाषा हिन्दी है।  हिंदी देश को एक साथ सांस्कृतिक, वैचारिक, आध्यात्मिक रुप से जोड़ती है।  हिंदी के बारे में सबसे प्रमुख तथ्य यह है कि  इसने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों एवं राष्ट्र को एकीकृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जिससे हमारी आजकल की पीढ़ी कम परिचित है। तकनीकी तौर पर भी देखें तो हिंदी भाषा व इसकी लिपि पूर्णत: वैज्ञानिक है।  आज विदेशी विशेषज्ञ भी मानते है कि यह भाषा पूर्णत वैज्ञानिक है।  कारण कि इसमें जो बोलते है वही लिखते है। 

फिर भी, इसे देश का दुर्भाग्य कहिए कि इतना कुछ होते हुए भी हिन्दी अपनी कोई पुख्ता पहचान नही बना पाई।  आज भी इसे लोग अंग्रेजी से कमतर आंकते है।   विचारक इसके पीछे जहाँ देश की अन्य भाषाओं का हिन्दी के कारण अपनी पहचान खोने का डर बताते है तो कुछ वैचारिक गुलामी को।  मतलब भले ही हम अपना कार्य एक विदेशी भाषा में करें लेकिन हिन्दी में न करें।  यह तर्क भाषायी गुलामी का परिचायक नही तो और क्या है

इस भाषायी गुलामी के पक्ष में हजार तर्क दिए जाते है।  कुछ हद तक तो यह तर्क ठीक लगता है कि जितनी ज्यादा भाषा का ज्ञान हो उतना ही अच्छा है।  लेकिन यह तर्क वही तक ठीक है जहाँ तक यह ज्ञान से संबंद्ध रखता है।  लेकिन, इसका मतलब यह नही कि हम अपनी भाषा को दरिद्र माने।  हिंदी को दरिद्र भाषा मानने से काम नहीं चलेगा बल्कि जरुरत है इसमें छुपे ज्ञान को खंगालने की। 

हिन्दी जहाँ एक तरफ समृद्ध भाषा है वही यह राष्ट्रीय पहचान की भी भाषा है।  क्या अंग्रेजी में यह सब गुण है ?  संविधान ने हिन्दी को वह सब कुछ दिया जिसकी वह अधिकारिणी थी।  दोष नीति का नही हमारी नीयत का है।  संवि‍धान लागू होने के बाद पंद्रह साल का समय भाषा परिवर्तन के लिए रखा गया था और वह समय केवल केंद्र सरकार की भाषा के लिए ही नहीं बल्कि भारत संघ के सभी राज्यों के लिए था ताकि उसी अवधि में सभी राज्य सरकारें अपने-अपने राज्यों में अपनी राजभाषा निर्धारित कर लेंगी एवं उन्हें ऐसी सशक्त बना लेंगी कि उनके माध्यम से समस्त सरकारी काम काज किए जा सकेंगें। राज्य में स्थित शिक्षण संस्थाएं अपनी राजकीय भाषा के माध्यम से ही शिक्षा देंगी। यह निर्णय वर्ष 1949 में ही किया गया था।  राज्यों ने अपनी-अपनी राजभाषा नीति जरुर बनाई। परंतु इस निर्णय को उतनी मुस्तैदी से लागू करने का प्रयास नहीं किया जितना कि आवश्यक था। उन्होंने तत्कालीन समस्याओं के आगे भाषा के महत्व को नहीं समझा। कालांतर में, राज्यों ने राजभाषा में उचित कार्यकलाप के लिए अपने यहां भाषा विभाग की स्थापना की और कार्यालयी भाषा की शिक्षा देनी प्रारंभ की।  राज्य सरकारों ने अपनी भाषाओं को संवर्धित तो जरुर किया  लेकिन उस अनुपात में नहीं जिस अनुपात में करना था। जिस कारण राज्य के भाषाओं की वर्तमान स्थिति राज्य के अंदर वही है जो केंद्र में हिन्दी की वर्तमान स्थिति है या यूँ कहें कि उससे भी बुरी है।  अंग्रेजी न चाहते हुए उचित नीयत के अभाव में चलती रही।   इस कारण हिन्दी न तो पूरी तरह से राजभाषा बन पाई और न राज्यों के बीच की संपर्क भाषा ही।  हालांकि थोड़े-बहुत प्रतीकात्मक बदलाव जरुर नज़र आते है।

हिंदी के प्रश्न को संविधान में अनंत काल तक के लिए टालने का फ़ैसला न तो जनता द्वारा किया गया है और न ही किसी समिति द्वारा सुझाया गया था। आज तक जितनी भी समितियां, आयोग गठित की गई है किसी ने भी हिंदी के प्रश्न को समय सीमा (पंद्रह साल) से परे रखने की सिफ़ारि‍श नहीं की है। राजभाषा आयोग, विश्व विद्यालय अनुदान आयोग, केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड, सभी ने हिंदी व क्षेत्रीय भाषाओं में ही शिक्षा-दीक्षा देने की सिफ़ारिश की है। फिर संविधान में हिंदी को अनिश्चित काल के लिए टालने की बात कहां से आई?
 
यदि हिंदी को वास्तविक रूप में कामकाज की भाषा बनाना है तो देश में राजभाषा कार्यान्वयन को कड़ाई से लागू करना होगा।  और यह कार्य केवल एक व्यक्ति या एक खास संगठन का नही बल्कि सभी का है।  उच्च शिक्षा में हिन्दी को अपनाने का प्रयास करना होगा।  साथ में, पुन: त्रिभाषा नीति के कार्यान्वयन  पर जोर देना होगा।  त्रिभाषा सूत्र के कार्यान्वयन की कठिनाइयों पर शिक्षा आयोग (1964-66) ने विस्तार से विचार किया है। जिसमें आयोग ने कार्यान्वयन की कठिनाइयों का उल्लेख करते हुए कहा था गलत योजना बनाने और आधे दिल से सूत्र को कार्यान्वित करने से स्थिति और बिगड़ गई है।  सरकारी प्रयास आज भी जस-की-तस है।  जरुरत है गंभीर कदम उठाने की।
 
अंग्रेजी को अनिश्चित काल तक, भारत की सहचरी राजभाषा के रूप में स्वीकार किए जाने के कारण यह बात अब और आवश्यक हो गई है।  ऐसी परिस्थिति में, कार्यालयों में हिंदी को प्रचलित करने तथा स्टाफ सदस्यों  को सक्षम बनाने के लिए सतत् कार्यनिष्ठा  के साथ शिक्षण-प्रशिक्षण का हर संभव प्रयास करना होगा।  दोष न राजभाषा नीति में है और न संविधान में बल्कि खोट तो हमारे नीयत में है।  

Sunday, July 27, 2014

भाषा, भावुकता और यथार्थ के बीच में पिसती हिंदी


भाषा का मामला भावुकता का नहीं ठोस यथार्थ का है।  जब यथार्थ दरवाजे के रास्ते आक्रमण करता है, तो भावुकता खिड़की के रास्ते भाग निकलती है।  लेकिन ऐसा करने वाली भावुकता को निहायत ही सतही मानना चाहिए।  अगर वह सचमुच भावुकता है तो ऐसा नही करेगी। वह यथार्थ से मुकाबला करेगी और उसे मार गिरायेगी।  यह कोई मुश्किल काम नही है।  भावुकता की वजह से ही देश भर में खादी चल पड़ी थी। यह भावुकता ही है जो भारतीयों को उन अनिवासी भारतीयों से जोड़ती है जो लक्ष्मी की आराधना करने के लिए विदेश चले गए।  फिर वही बस भी गए।  देशभक्ति भी एक भावुकता है जो राष्ट्रीय संकट के समय सभी भारतीयों को ऐक्यबद्ध करती है।  इसलिए भावुकता की ताकत को कम करके नही आंकना चाहिए। भावुकता की वजह से हम उन आईआईटी इंजीनियरों को अपना मानते है जो हमारी सब्सिडी के बल पर पढ़ाई कर डालर की सेवा कर रहे है।  और हमारा देश आज भी तकनीक के मामले में पिछ्ड़ा है।  बस हम खुश होते है कि नोकिया का सीईओ भारतीय है। 
 

दरअसल भावुकता भी एक यथार्थ है।  इसलिए यथार्थ और भावुकता की टकराहट को एक यथार्थ बनाम दूसरे यथार्थ की टकराहट के रुप में देखना चाहिए ।  इस टकराहट में वह यथार्थ जीत जाता है जो मजबूत होता है।  यानी जो हारता है, वह भावुकता नही उसका छदम है।  हिंदी भाषी या दूसरी भारतीय भाषाओं के साथ अंग्रेजी भाषा का द्वंद भी कुछ-कुछ भावुकता बनाम यथार्थ का है।  यानि कि भावुकता में हम भले ही कह ले कि हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाएं किसी भी मामले में अंग्रेजी से कमतर नहीं।  लेकिन हम सभी भली-भांति जानते है भावुकता या दूसरे, जो हिंदी भाषी स्वंय हिंदी न जानते हुए भी या हिंदी (यहां हिंदी का प्रयोग सभी भारतीय भाषाओं के प्रतीक के रुप किया जा रहा है) से रखते हुए भी अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में भेजते है।  उनमें अपनी मातृभाषा के प्रति प्रतिबद्धता नहीं होती ऐसी बात नहीं है।  तीसरी बात यह है कि अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाना काफी खर्चीला होता है, फिर भी क्लर्क, चपरासी, दरबान, धोबी, बढ़ई, नाई और सफाई कर्मचारी भी अपना और अपने परिवार वालों का पेट काट कर, अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में भेजना चाहते हैं और भेज रहे है तो इसका कुछ मतलब होना चाहिए।


हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया है कि देश भर में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में प्रवेश लेने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।  हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में पढ़ने वालों की कुल संख्या अब भी बहुत अधिक है।  लेकिन यह कोई गर्व की बात नही है।  तसल्ली की भी बात नही है क्योंकि सफल और संपन्न वर्ग के ऐसे व्यक्ति विरल ही होंगे जो अपने बच्चों की पढ़ाई जिदपूर्वक अंग्रेजी में नहीं करवा रहे है।

कोई बच्चा हिंदी स्कूल में पढ़ा रहा है, तो इसका मतलब है कि उसके माता-पिता गरीब या अविकसित है।  जैसे-जैसे मध्य वर्ग या निम्न मध्य वर्ग में आने वाले लोगों की संख्या बढ़ेगी, भारतीय भाषाएं बुरे दिनों में साथ न देने वाले मित्रों की तरह गायब होने लगेंगी।  जब पूरा भारत संपन्न हो जाएगा, तब देश की सड़कों और बाजारों में सिर्फ अंग्रेजी बोली जाएगी।  अब भी ऐसे वाणिज्यिक स्थान हैं जहाँ हिंदी की अपेक्षा अंग्रेजी कई गुना ज्यादा बोली जाती है।  और ये कोई मिशनरी संस्थाओं द्वारा संचालित नही की जाती है। 

अक्सर हिंदी प्रेमी लेखको और पत्रकारों पर यह आरोप लगाया जाता है कि वे खुद तो हिंदी के पक्ष में अभियान चलाते है लेकिन अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाते हैं।  मेरी समझ से, यह तथ्य है आरोप नहीं।  इसलिए कि इस तथ्य के पीछे मौजूद विडंबना को समझने की कोशिश नहीं  की जाती।  जब ऐसी कोशिश होगी, तब सहज ही यह समझ आ जाएगा कि भाषा सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है, यह एक जीवन व्यवस्था भी है।  जब तक उस जीवन व्यवस्था पर निर्णायक प्रहार नही किया जाता जिसमें अंग्रेजी को फूलने-फलने का खतरनाक अवसर मिलता है, तब तक भारतीय भाषाओं के चिरायु होने की आशा नहीं की जा सकती।  वे अगर बचेंगी तो इसीलिए कि उनका प्रयोग करने वालों तक विकास नाम की पश्चिमी चिड़िया अब तक नही पहुँची है।

भाषा के मुद्दे को जब तक राजनीतिक, आर्थिक, प्रशासनिक, व औद्योगिक व्यवस्था से नही जोड़ा जाएगा, तब तक इस परिवर्तन आंदोलन का राष्ट्रव्यापी युद्ध औंधे मुँह गिरने को बाध्य है।  इसकी एक अच्छी मिसाल है तमाम हिंदी भाषी राज्यों की स्थिति।  हिंदी के लिए जरुरत है सामाजिक व्यवस्था को बदलने की।  अंग्रेजी हटाने के एक प्रयोग ने लाखों बच्चों का भविष्य अंधकारमय कर दिया।  भारत में अंग्रेजी कल हट सकती है बशर्ते एक ऐसी राष्ट्रीय हुंकार भरी जाए जो इस एलिट उन्मुख व्यवस्था पर चौतरफा धावा बोल दे।  हिंदी की जमीन सामान्य जन से जुड़ी है, तो अंग्रेजी का संबंध भारत में शोषण और संग्रह की प्रक्रिया से है।  इस प्रक्रिया में प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से शामिल हुए बगैर आप संपन्नता की मध्यवर्गिता की सीढ़िया नही चढ़ सकते।  हमारा राजनीतिक प्रतिष्ठान शोषण और संग्रह की इस प्रकिया दलाल बन चुका है।  इसमें हमारी सारी राजनैतिक धारायें शामिल है।  यह गांधीजी का ही कलेजा था कि उन्होंने अपने बच्चों को स्कूली शिक्षा से दूर रखा।  इसके लिए उन्होंने पत्नी से, एक बेटे से और अन्य अनेक लोगों से अपनी कटु आलोचना भी सही।  
 
अंत में मैं, यह कहना चाहूंगा कि केवल सीसैट का प्रश्न नहीं है दरअसल अब वक्त सभी जगह भारतीय भाषाओं को पुर्नस्थापित करने की।  तभी संविधान के अनुच्छेद 351 की भावना के साथ न्याय होगा।