Tuesday, November 20, 2012

खरगोश तथा कछुए की कहानी – नए रुप में

हम सभी ने खरगोश तथा कछुए की कहानी सुनी होगी। हम सभी इस कहानी को सुन-सुनकर बड़े हुए है। हमने इससे सबक भी लिया होगा कि धीरे मगर लगातार कार्य करने वाला इंसान सफलता जरुर प्राप्त करता है। समय के साथ इस कहानी में नए संदर्भ जुड़े है। हम इस कहानी के नए रुप से आपको परिचित करायेंगें।


होता क्या है कि जब खरगोश जीती हुई बाजी अपने अति आत्मविश्वास की हार गया ; तो उसने इस हार पर काफी चिंतन – मनन किया। काफी सोचने के बाद उसने महसूस किया कि उसे यह हार उसके अति आत्मविश्वास, असावधानी तथा आलस के चलते मिली। यदि वह चीजों को अपने लिए तय मानकर नहीं चलता तो उसे निश्चित ही जीत मिलती। तो उसने पुन: कछुए को दूसरे दौड़ के लिए आमंत्रित किया। कछूए भी इससे सहमत नजर आया। इस बार खरगोश ने प्रतियोगिता में बिना रुके दौड़ लगाई तथा विजय हासिल की। इस कहानी से हम सभी को यह सबक मिलता है कि तेज तथा सतत परिश्रम करने वाला व्यक्ति निश्चय ही विजय पथ पर अग्रसर होता है।

लेकिन फिर से इस कहानी का अंत यही नहीं होता।

हार के बाद कछूआ काफी उदास हुआ। उसने भी अपनी हार पर काफी सोच – विचार किया। काफी सोच – विचार के बाद उसके दिमाग में यह बात आई कि वर्तमान रास्ते पर चलकर यह संभव नहीं कि खरगोश से दौड़ में जीत हासिल की जा सके। अत: उसने काफी विचार के बाद खरगोश से इस मार्ग से अलग दूसरे मार्ग से दौड़ लगाने की शर्त रखी। खरगोश भी इससे सहमत दिखा। फिर से एक नए दौड़ की शुरुआत हुई। इस बार चूँकि प्रतियोगिता नए मार्ग द्वारा तय की गई थी। इसलिए खरगोश ने भी प्रारंभ से ही तेज गति से दौड़ लगाई। लेकिन इस मार्ग में एक नदी पड़ती थी। जिससे पार करना खरगोश के लिए काफी मुश्किल था। लेकिन कछूए ने नदी को आसानी से पार कर लिया। और इस बार प्रतियोगिता में जीत हासिल कर ली।

इस कहानी से खरगोश को यह सबक मिला कि किसी भी कार्य में कूदने से पहले अपनी योग्यता को पहचानो और योग्यतानुसार ही कार्य में सफल होने के लिए लक्ष्य तय करो।

इस बार भी कहानी का यही अंत नही हुआ ।

समय के साथ खरगोश और कछूए में काफी मित्रता हो गई। दोनों ने पुरानी घटनाओं से सबक लेकर मिल – जुलकर कार्य करना तय किया। दोनों ने यह विचार किया कि दोनों के बीच हुई अंतिम दौड़ यदि दोनों मिलकर दौड़ते तो परिणाम कुछ अलग होता। अत: दोनों ने मिलकर यह निर्णय किया कि इस बार भी दोनों दौड़ लगायेंगें । लेकिन इस बार एक टीम के रुप में। और इस बार नदी के किनारे पहुँचने पर खरगोश ने कछूए की पीठ पर बैठकर नदी पार किया। इस बार दोनों के अंदर जबरदस्त आत्मसंतुष्टि का भाव उभरा जैसा कि इससे पहले कभी नहीं उभरा था।

प्रस्तुत तीनों उद्धरणों से यह शिक्षा मिलती है कि आप भले ही अपने स्तर पर तेज – तर्रार है। तथा कार्य को सफलतापूर्वक अंजाम दे रहे है। लेकिन यदि कोई कार्य आपने टीम के रुप में अंजाम तक पहुँचाया है तो इसका महत्व अलग होता है। इसके अलावा भी इस कहानी से कई सबक मिलते है।

ना कभी खरगोश और ना कभी कछूए ने हार मानी।

अपने कार्य में तेज तथा सदा निरत लगा रहने वाला व्यक्ति निश्चय ही लगातार मगर बेहद धीरे तरीके से कार्य करने वाले व्यक्ति से हमेशा जीत हासिल करता है।











Sunday, November 18, 2012

दीपावली की शुभकामनायें

नमस्कार बंधुवर,


चूँकि काफी दिनों  बाद  लेखन के माध्यम से आप सभी से रुबरु हूँ।  इसीलिए क्षमाप्रार्थी हूँ।  लेखन की सबसे बड़ी विशेषता है नियमित लेखन और पाठकों से जुड़ाव ।  सबसे पहले दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें




दीपावली है दीपों का त्योहार
हम सभी मनाते है भगवान राम के जमाने से यह त्योहार
लेकिन क्या कभी हमने सोचा है कि
क्या यह त्योहार केवल दीपों की अबलियां सजाने का नाम
कुछ पटाखों - फुलझड़ियों का नाम
तो फिर यह तो किसी भी दिन हो सकता है
फिर क्यूँ एक दिन है नियत

हम क्यों सभी चीजों में  हो जाते  है प्रतीकात्मक
क्या कभी हमने सोचा है दीपावली केवल
सजाने का नाम नहीं
है अंधेरे मन को उजाले विचारों से भरने का नाम
तभी तो विजयादशमी के बाद आता  है।


केवल जीतने से विजय नहीं मिलती
जीत तो मिलती है मन को जीतने से।
इसलिए आईए
हम सभी मिलकर दीपावली मनाए


हर कोई अपने मन के अंधियाये को रौशन करें
जहाँ हो रौशनी का टिमटिमाता दिया
उसे कर से रौशन जगमगाते दिए से।