Tuesday, November 20, 2012

खरगोश तथा कछुए की कहानी – नए रुप में

हम सभी ने खरगोश तथा कछुए की कहानी सुनी होगी। हम सभी इस कहानी को सुन-सुनकर बड़े हुए है। हमने इससे सबक भी लिया होगा कि धीरे मगर लगातार कार्य करने वाला इंसान सफलता जरुर प्राप्त करता है। समय के साथ इस कहानी में नए संदर्भ जुड़े है। हम इस कहानी के नए रुप से आपको परिचित करायेंगें।


होता क्या है कि जब खरगोश जीती हुई बाजी अपने अति आत्मविश्वास की हार गया ; तो उसने इस हार पर काफी चिंतन – मनन किया। काफी सोचने के बाद उसने महसूस किया कि उसे यह हार उसके अति आत्मविश्वास, असावधानी तथा आलस के चलते मिली। यदि वह चीजों को अपने लिए तय मानकर नहीं चलता तो उसे निश्चित ही जीत मिलती। तो उसने पुन: कछुए को दूसरे दौड़ के लिए आमंत्रित किया। कछूए भी इससे सहमत नजर आया। इस बार खरगोश ने प्रतियोगिता में बिना रुके दौड़ लगाई तथा विजय हासिल की। इस कहानी से हम सभी को यह सबक मिलता है कि तेज तथा सतत परिश्रम करने वाला व्यक्ति निश्चय ही विजय पथ पर अग्रसर होता है।

लेकिन फिर से इस कहानी का अंत यही नहीं होता।

हार के बाद कछूआ काफी उदास हुआ। उसने भी अपनी हार पर काफी सोच – विचार किया। काफी सोच – विचार के बाद उसके दिमाग में यह बात आई कि वर्तमान रास्ते पर चलकर यह संभव नहीं कि खरगोश से दौड़ में जीत हासिल की जा सके। अत: उसने काफी विचार के बाद खरगोश से इस मार्ग से अलग दूसरे मार्ग से दौड़ लगाने की शर्त रखी। खरगोश भी इससे सहमत दिखा। फिर से एक नए दौड़ की शुरुआत हुई। इस बार चूँकि प्रतियोगिता नए मार्ग द्वारा तय की गई थी। इसलिए खरगोश ने भी प्रारंभ से ही तेज गति से दौड़ लगाई। लेकिन इस मार्ग में एक नदी पड़ती थी। जिससे पार करना खरगोश के लिए काफी मुश्किल था। लेकिन कछूए ने नदी को आसानी से पार कर लिया। और इस बार प्रतियोगिता में जीत हासिल कर ली।

इस कहानी से खरगोश को यह सबक मिला कि किसी भी कार्य में कूदने से पहले अपनी योग्यता को पहचानो और योग्यतानुसार ही कार्य में सफल होने के लिए लक्ष्य तय करो।

इस बार भी कहानी का यही अंत नही हुआ ।

समय के साथ खरगोश और कछूए में काफी मित्रता हो गई। दोनों ने पुरानी घटनाओं से सबक लेकर मिल – जुलकर कार्य करना तय किया। दोनों ने यह विचार किया कि दोनों के बीच हुई अंतिम दौड़ यदि दोनों मिलकर दौड़ते तो परिणाम कुछ अलग होता। अत: दोनों ने मिलकर यह निर्णय किया कि इस बार भी दोनों दौड़ लगायेंगें । लेकिन इस बार एक टीम के रुप में। और इस बार नदी के किनारे पहुँचने पर खरगोश ने कछूए की पीठ पर बैठकर नदी पार किया। इस बार दोनों के अंदर जबरदस्त आत्मसंतुष्टि का भाव उभरा जैसा कि इससे पहले कभी नहीं उभरा था।

प्रस्तुत तीनों उद्धरणों से यह शिक्षा मिलती है कि आप भले ही अपने स्तर पर तेज – तर्रार है। तथा कार्य को सफलतापूर्वक अंजाम दे रहे है। लेकिन यदि कोई कार्य आपने टीम के रुप में अंजाम तक पहुँचाया है तो इसका महत्व अलग होता है। इसके अलावा भी इस कहानी से कई सबक मिलते है।

ना कभी खरगोश और ना कभी कछूए ने हार मानी।

अपने कार्य में तेज तथा सदा निरत लगा रहने वाला व्यक्ति निश्चय ही लगातार मगर बेहद धीरे तरीके से कार्य करने वाले व्यक्ति से हमेशा जीत हासिल करता है।











Sunday, November 18, 2012

दीपावली की शुभकामनायें

नमस्कार बंधुवर,


चूँकि काफी दिनों  बाद  लेखन के माध्यम से आप सभी से रुबरु हूँ।  इसीलिए क्षमाप्रार्थी हूँ।  लेखन की सबसे बड़ी विशेषता है नियमित लेखन और पाठकों से जुड़ाव ।  सबसे पहले दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें




दीपावली है दीपों का त्योहार
हम सभी मनाते है भगवान राम के जमाने से यह त्योहार
लेकिन क्या कभी हमने सोचा है कि
क्या यह त्योहार केवल दीपों की अबलियां सजाने का नाम
कुछ पटाखों - फुलझड़ियों का नाम
तो फिर यह तो किसी भी दिन हो सकता है
फिर क्यूँ एक दिन है नियत

हम क्यों सभी चीजों में  हो जाते  है प्रतीकात्मक
क्या कभी हमने सोचा है दीपावली केवल
सजाने का नाम नहीं
है अंधेरे मन को उजाले विचारों से भरने का नाम
तभी तो विजयादशमी के बाद आता  है।


केवल जीतने से विजय नहीं मिलती
जीत तो मिलती है मन को जीतने से।
इसलिए आईए
हम सभी मिलकर दीपावली मनाए


हर कोई अपने मन के अंधियाये को रौशन करें
जहाँ हो रौशनी का टिमटिमाता दिया
उसे कर से रौशन जगमगाते दिए से।

Monday, August 27, 2012

अलविदा इमाम साहब

अलविदा इमाम साहब

खुदी को कर बुलंद इतना कि खुदा बंदे से पूछे कि बता तेरी रजा क्या है?


चरित्र अभिनेता के रूप में सर्वाधिक चर्चा पाने वाले कलाकार थे ए के हंगल। उन्होंने अपने पूरे फिल्मी करियर में वैसे तो लगभग सवा दो सौ फिल्मों में अभिनय किया, जिनमें से कुछ भूमिकाएं तो पूरी फिल्म में छाई हुई थीं, लेकिन फिल्म शोले में निभाई उनकी नेत्रहीन इमाम साहब की छोटी भूमिका ने लोगों में उनकी बहुत बड़ी पहचान बनाई। यह भी कह सकते हैं कि उन्हें इस फिल्म के रोल ने अमर बना दिया, जो शायद ही किसी चरित्र अभिनेता को नसीब हो।
कंपकंपाती-थरथराती सी उनकी आवाज और भावनाओं को व्यक्त करने का उनका अंदाज, जब फिल्म शोले में रामगढ़ के वासियों के मध्य उनका इकलौता बेटा अहमद (सचिन) घोड़े पर लाश की शक्ल में आता है, गांव वाले खामोश हैं, कोई कुछ नहीं बोलता..। सभी सन्न हैं..। ऐसे में इमाम साहब की आवाज आती है, इतना सन्नाटा क्यों है भाई..? उन्हें वीरू यानी धर्मेद्र पकड़कर अहमद के पास लाता है। वे अहमद को छूते हैं और नाम लेकर रो पड़ते हैं। इस बात से गांव वालों और ठाकुर यानी संजीव कुमार में कहासुनी होती है और जय यानी अमिताभ बच्चन और वीरू को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हैं कि ये दोनों जब तक इस गांव में रहेंगे, लोग एक-एक कर मारे जाएंगे।
गब्बर सिंह की चिट्ठी पढ़ने के बाद, जिसमें लिखा है कि जय-वीरू को गांव वाले उनके हवाले कर दें, नहीं तो खैर नही है, लोग कहते हैं, हम इस बोझ, यानी जय-वीरू, को नहीं उठा सकते। इन बातों को सुनने के बाद रोते हुए इमाम साहब उठ खड़े होते हैं, कौन यह बोझ नहीं उठा सकता है भाई..? जानते हो दुनिया का सबसे बड़ा बोझ क्या होता है? बाप के कंधों पर बेटे का जनाजा.., इससे भारी बोझ कोई नहीं है। मैं बूढ़ा यह बोझ उठा सकता हूं, तुम एक मुसीबत का बोझ नहीं उठा सकते..? भाई, मैं तो एक ही बात जानता हूं कि इज्जत की मौत जिल्लत की जिंदगी से कहीं अच्छी है..। बेटा मैंने बेटा खोया है मैंने.., फिर भी मैं चाहूंगा कि ये दोनों इसी गांव में रहें। आगे आपकी मर्जी..। तभी अजान की आवाज सुनाई देती है, तो इमाम साहब कहते हैं, मेरे नमाज का वक्त हो गया है। आज पूछूंगा खुदा से.., मुझे दो-चार बेटे और क्यों नहीं दिए गांव पर शहीद होने के लिए..? ये संवाद आज भी दर्शकों को सिहरा देते हैं। उस समय दर्शक खल चरित्र गब्बर सिंह के प्रति आक्रोश से भर जाते हैं। फिल्म में ऐसा माहौल ए के हंगल ने अपने संवादों और अनोखे अंदाज के जरिये बनाया था। तमाम फिल्मों में अपने सहज अभिनय से लोगों के दिल में बसने वाले शोले के इमाम साहब यानी ए के हंगल ने लंबे समय तक बीमारी से लड़ने के बाद कल दुनिया को अलविदा कह दिया..।
शोले के अलावा तमाम ऐसी फिल्में हैं, जिनमें ए के हंगल ने कमाल का या यह कहें कि यादगार अभिनय किया। उनकी शौकीन की भूमिका, जो रंगीन तबीयत के उम्रदराज इंदर सेन की थी, जिसे फिल्म में उसके दोस्त बने अशोक कुमार और उत्पल दत्त एंडरसन कहते हैं, को भला कौन भुला सकता है। इसमें तीनों एक युवा लड़की से दिल लगा बैठते हैं। फिर चितचोर के पितांबर चौधरी, खलनायक के शौकत भाई, मेरी जंग के वकील गुप्ता, राम तेरी गंगा मैली के बृजकिशोर, कमला के काका साब, अवतार के रशीद अहमद, खुद्दार के रहीम चाचा, नरम गरम के मास्टरजी, हम पांच के पंडित, जुदाई के नारायण सिंह, सत्यम शिवम सुंदरम के बंसी चाचा, बिदाई के रामशरण, कोरा कागज के प्रिंसिपल गुप्ता, मेरे अपने और जवानी दीवानी के प्रिंसिपल, नमक हराम के बिपिन लाल पांडे, अभिमान के सदानंद, हीरा पन्ना के दीवान करण सिंह, बावर्ची के रामनाथ शर्मा, गुड्डी में गुड्डी के पिता की भूमिका को लोग कैसे भुला सकते हैं?
देखें तो ए के हंगल ने फिल्मों में जो भी भूमिकाएं कीं, वे उन चरित्रों में पूरी तरह ढल गए थे। वे जिन निर्माताओं की पसंद रहे वे थे ऋषिकेश मुखर्जी, गुलजार, बासु चटर्जी, देव आनंद और अनिल गांगुली। इन सब की फिल्मों में उन्होंने ज्यादा काम किया। उन्होंने कुछ हिंदी और अंग्रेजी सीरियलों में भी काम किया।
ए के हंगल का पूरा नाम था अवतार किशन हंगल। वे मूल रूप से कश्मीरी थे। उनका जन्म अविभाजित भारत के पेशावर, जहां उनके पूर्वज बस गए थे, में 1917 को हुआ था। दादा शंभुनाथ पंडित अंग्रेजों के शासनकाल में कलकत्ता हाईकोर्ट में पहले भारतीय जज बने। उस समय बिहार और बंगाल का बंटवारा नहीं हुआ था। पटना म्यूजियम में हाल तक क्वीन विक्टोरिया के साथ शंभूनाथ जी की एक पोट्रेट लगी हुई थी। कोलकाता में उनके नाम पर रोड और अस्पताल हैं। हंगल के पिता भी ब्रिटिश शासन के दौरान प्रतिष्ठित पद पर थे।
हंगल बचपन में बेहद चंचल थे। पढ़ाई में मन नहीं लगता था, किसी तरह मैट्रिक किया। जब युवा हुए तो कुछ करना है, यह सोचकर उन्होंने टेलरिंग शुरू की। इन्हीं दिनों उनका रुझान रंगमंच की ओर भी हुआ, फिर वे इसी में सक्रिय हो गए। उसी समय उनके परिजनों को कराची शिफ्ट होना पड़ा। यहीं उनकी शादी हुई। उस समय स्वतंत्रता आंदोलन तेजी पर था। वे उसमें शामिल हो गए और कई बार जेल भी गए। वाम विचारधारा से ताल्लुक रखने के कारण हंगल भारत-पाकिस्तान बंटवारे के दौरान भी जेल में रहे। जेल से वे इस शर्त पर छूटे कि आगे इस शहर में नहीं रहेंगे। वे 1949 में मुंबई आ गए। यहां आने के बाद उन्होंने एक टेलरिंग शॉप, जो दक्षिण मुंबई में थी, आनंद जेंट्स टेलर में काम करना शुरू किया। कुछ पैसे आए, तो बाद में क्रॉफर्ड मार्केट, जिसमें दिलीप कुमार की भी फल की दुकान थी, में अपनी दुकान खोल ली। हंगल अच्छी पेंटिंग भी किया करते थे। उनका रुझान रंगमंच में तो था ही। फिर वे कैफी आजमी और बलराज साहनी के करीब आए और उनके सुझाव पर इप्टा की स्थापना में जुट गए। उन्होंने नाटकों में अभिनय के साथ निर्देशन भी किया। कई नाटक लिखे। उन्हें मराठी नाटक देखना काफी पसंद था। वे मानते थे, उन दिनों मराठी नाटकों के विषय न केवल गंभीर होते, बल्कि कलाकार भी काफी टैलेंटेड थे। हंगल डॉ. श्रीराम लागू के जबर्दस्त फैन थे। हालांकि उन्होंने खुद कभी मराठी नाटकों में अभिनय नहीं किया। हां, उन्हें इन नाटकों के गाने इतने पसंद आए कि उन्होंने उस्ताद से संगीत सीखना शुरू कर दिया। उन्हें फिल्मों में काम करने के कई अवसर मिले, जिसे ठुकरा दिया, लेकिन बाद में जब समझ आया कि यह भी अभिव्यक्ति का एक अहम माध्यम है, तो काम करने के लिए तैयार हो गए।
हंगल साहब का अभिनय सफर फिल्म हमसे है जहां (2008) तक जरूर चला, लेकिन उन्होंने फिल्मों में नियमित रूप से काम करना 2000 में ही बंद कर दिया था। इस बीच उनकी लगान, हरिओम, पहेली आदि फिल्में आई। फिर वे अधिक बीमार रहने लगे। वे लंबे समय से फेफड़े में सूजन की समस्या से पीडि़त थे। अधिक उम्र होने की वजह से उन्हें दूसरी स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां भी थीं। अपने अंतिम दिनों में वे किसी व्यक्ति का साथ पाने के लिए लालायित रहते थे। पिछले 16 वर्षो से वे बेटे विजय हंगल, जो प्रोफेशनल फोटोग्राफर हैं, के साथ मुंबई के सांताक्रुज इलाके में किराये के घर में रह रहे थे। विजय ने उनकी तबियत खराब रहने के बाद से यानी 2000 में काम करना छोड़ दिया था। वे अपने पिता की सेवा में ठीक वैसे ही जुटे रहे, जैसे तमाम फिल्मों में हंगल साहब अपने काम में, अपने चाहने वालों के लिए जुटे रहते थे। ईमानदारी के साथ..।(दैनिक जागरण से साभार )

Saturday, January 28, 2012

हिंदी के ऊपर प्रसिद्ध अहिंदी भाषी विद्वानों की उक्तियां


‘’ हम चाहते है कि सारी प्रांतीय बोलियां जिनमें सुंदर साहित्य की सृष्टि हुई है, अपने – अपने घर में (प्रांत) रानी बनकर रहे और आधुनिक भाषाओं के हार की मध्यमणि हिंदी भारत – भारती होकर विराजती रहे। ‘’

                                                                                                         - गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर 

राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार।

भारतीय भाषाओं के लिए यदि कोई एक लिपि आवश्यक हो तो वह देवनागरी ही हो सकती है।
                                                        - (जस्टिस) कृष्णस्वामी अय्यर।

हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। - शंकरराव कप्पीकेरी।

राष्ट्रभाषा हिंदी का किसी क्षेत्रीय भाषा से कोई संघर्ष नहीं है। - अनंत गोपाल शेवड़े।

दक्षिण की हिंदी विरोधी नीति वास्तव में दक्षिण की नहीं, बल्कि कुछ अंग्रेजी भक्तों की नीति है।
                                                                                                                              - के.सी. सारंगमठ।
हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है। - वी. कृष्णस्वामी अय्यर

एखन जतोगुलि भाषा भारते प्रचलित आछे ताहार मध्ये भाषा सर्वत्रइ प्रचलित। - केशवचंद्र सेन।

देश को एक सूत्र में बाँधे रखने के लिए एक भाषा की आवश्यकता है। - सेठ गोविंददास।

भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है। - टी. माधवराव।

अंग्रेजी से भारत की रक्षा नहीं हो सकती। - पं. कृ. पिल्लयार।

उसी दिन मेरा जीवन सफल होगा जिस दिन मैं सारे भारतवासियों के साथ शुद्ध हिंदी में वार्तालाप करूँगा।
                                                                                                     - शारदाचरण मित्र।

हिंदी भाषा को भारतीय जनता तथा संपूर्ण मानवता के लिये बहुत बड़ा उत्तरदायित्व सँभालना है।
                                                                                      - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या।

भारतवर्ष के लिए हिंदी भाषा ही सर्वसाधरण की भाषा होने के उपयुक्त है। - शारदाचरण मित्र।

अहिंदी भाषा-भाषी प्रांतों के लोग भी सरलता से टूटी-फूटी हिंदी बोलकर अपना काम चला लेते हैं।
                                                                                                                  - अनंतशयनम् आयंगार।

हिंदी का शिक्षण भारत में अनिवार्य ही होगा। - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या।

अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिये ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता समझता है। - महात्मा गाँधी।

भारतवर्ष में सभी विद्याएँ सम्मिलित परिवार के समान पारस्परिक सद्भाव लेकर रहती आई हैं।- रवींद्रनाथ ठाकुर।

संप्रति जितनी भाषाएं भारत में प्रचलित हैं उनमें से हिंदी भाषा प्राय: सर्वत्र व्यवहृत होती है। - केशवचंद्र सेन।

हिंदी भाषी ही एक ऐसी भाषा है जो सभी प्रांतों की भाषा हो सकती है। - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।

हिंदी में जो गुण है उनमें से एक यह है कि हिंदी मर्दानी जबान है। - सुनीति कुमार चाटुर्ज्या।

राष्ट्रभाषा राष्ट्रीयता का मुख्य अंश है। - श्रीमती सौ. चि. रमणम्मा देव।

हिंदुस्तान के लिये देवनागरी लिपि का ही व्यवहार होना चाहिए, रोमन लिपि का व्यवहार यहाँ हो ही नहीं सकता। - महात्मा गाँधी।

राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है। - महात्मा गाँधी।

जिस प्रकार बंगाल भाषा के द्वारा बंगाल में एकता का पौधा प्रफुल्लित हुआ है उसी प्रकार हिंदी भाषा के साधारण भाषा होने से समस्त भारतवासियों में एकता तरु की कलियाँ अवश्य ही खिलेंगी। - शारदाचरण मित्र।

भारतवर्ष के लिये देवनागरी साधारण लिपि हो सकती है और हिंदी भाषा ही सर्वसाधारण की भाषा होने के उपयुक्त है। - शारदाचरण मित्र।

भारत के एक सिरे से दूसरे सिरे तक हिंदी भाषा कुछ न कुछ सर्वत्र समझी जाती है। - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।

जापानियों ने जिस ढंग से विदेशी भाषाएँ सीखकर अपनी मातृभाषा को उन्नति के शिखर पर पहुँचाया है उसी प्रकार हमें भी मातृभाषा का भक्त होना चाहिए। - श्यामसुंदर दास।

यह महात्मा गाँधी का प्रताप है, जिनकी मातृभाषा गुजराती है पर हिंदी को राष्ट्रभाषा जानकर जो उसे अपने प्रेम से सींच रहे हैं। - लक्ष्मण नारायण गर्दे।

विदेशी भाषा में शिक्षा होने के कारण हमारी बुद्धि भी विदेशी हो गई है। - माधवराव सप्रे।

मैं महाराष्ट्री हूँ, परंतु हिंदी के विषय में मुझे उतना ही अभिमान है जितना किसी हिंदी भाषी को हो सकता है।
                                                                                                                       - माधवराव सप्रे।

हिंदी भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है। - महात्मा गांधी।

राष्ट्रीयता का भाषा और साहित्य के साथ बहुत ही घनिष्ट और गहरा संबंध है। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।

यदि हम अंग्रेजी दूसरी भाषा के समान पढ़ें तो हमारे ज्ञान की अधिक वृद्धि हो सकती है। - जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी।

हिंदी पर ना मारो ताना, सभा बतावे हिंदी माना। - नूर मुहम्मद।

सिक्ख गुरुओं ने आपातकाल में हिंदी की रक्षा के लिये ही गुरुमुखी रची थी। - संतराम शर्मा।

हिंदी जैसी सरल भाषा दूसरी नहीं है। - मौलाना हसरत मोहानी।

ऐसे आदमी आज भी हमारे देश में मौजूद हैं जो समझते हैं कि शिक्षा को मातृभाषा के आसन पर बिठा देने से उसकी कीमत ही घट जायेगी। - रवीन्द्रनाथ ठाकुर।

भारत के विभिन्न प्रदेशों के बीच हिंदी प्रचार द्वारा एकता स्थापित करने वाले सच्चे भारत बंधु हैं। - अरविंद।

हृदय की कोई भाषा नहीं है, हृदय-हृदय से बातचीत करता है। - महात्मा गांधी।

मेरा आग्रहपूर्वक कथन है कि अपनी सारी मानसिक शक्ति हिन्दी के अध्ययन में लगावें। - विनोबा भावे।

हिंदी द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है। - स्वामी दयानंद।

जैसे-जैसे हमारे देश में राष्ट्रीयता का भाव बढ़ता जायेगा वैसे ही वैसे हिंदी की राष्ट्रीय सत्ता भी बढ़ेगी।
                                                                                                                      - श्रीमती लोकसुन्दरी रामन् ।

राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिये आवश्यक है। - महात्मा गांधी।


हिन्दी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है। - मैथिलीशरण गुप्त।

अंग्रेजी को भारतीय भाषा बनाने का यह अभिप्राय है कि हम अपने भारतीय अस्तित्व को बिल्कुल मिटा दें।
                                                                                                                                - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।

हिंदी स्वयं अपनी ताकत से बढ़ेगी। - पं. नेहरू।

हिंदी संस्कृत की बेटियों में सबसे अच्छी और शिरोमणि है। - ग्रियर्सन।

मेरे लिये हिन्दी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है। - राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन।

उर्दू और हिंदी दोनों को मिला दो। अलग-अलग नाम नहीं होना चाहिए। - मौलाना मुहम्मद अली।

जातीय भाव हमारी अपनी भाषा की ओर झुकता है। - शारदाचरण मित्र।

हिंदी अपनी भूमि की अधिष्ठात्री है। - राहुल सांकृत्यायन।

हिन्दी व्यापकता में अद्वितीय है। - अम्बिका प्रसाद वाजपेयी।

भारत के विभिन्न प्रदेशों के बीच हिन्दी प्रचार द्वारा एकता स्थापित करने वाले सच्चे भारत बंधु हैं। - अरविंद।

राष्ट्रीय एकता के लिये हमें प्रांतीयता की भावना त्यागकर सभी प्रांतीय भाषाओं के लिए एक लिपि देवनागरी अपना लेनी चाहिये। - शारदाचरण मित्र (जस्टिस)।

हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने के हेतु हुए अनुष्ठान को मैं संस्कृति का राजसूय यज्ञ समझता हूँ।
                                                                                                       - आचार्य क्षितिमोहन सेन।

हिन्दी को ही राजभाषा का आसन देना चाहिए। - शचींद्रनाथ बख्शी।

अंग्रेजी इस देश के लिए अभिशाप है, यह हर साल हमारे सामने प्रकट होता है, फिर भी उसे हम पूतना न मानकर चामुण्डमर्दिनी दुर्गा मान रहे हैं। - अवनींद्र कुमार विद्यालंकार।


श्री साकेत सहाय