Thursday, September 17, 2009

एक और हिन्दी दिवस

एक और हिन्दी दिवस !


एक और हिन्दी दिवस ! आजादी के इतने वर्षो बाद भी राष्ट्रभाषा के लिए अगर कोई दिवस मनाने की जरुरत पड़ती है तो यह इस हम सभी के लिए शर्म की बात है। कारण कि सरकार का काम है, नियम-कानून जारी करना तथा उन कानूनों को लागू करने के लिए विशेष दिशा-निर्देशों जारी करना। लेकिन उन नियमों के अनुपालन की जिम्मेवारी सरकारी सेवकों के साथ-साथ जनता की भी तो है। हम यह भली-भांति जानते है कि हम राष्ट्रभाषा के प्रति कितने लापरवाह है। लेकिन जब भाषण देने की बारी आती है तो हम अपने अंदर न झाँक संविधान और सरकार को दोष देते है। समलैंगिकता जैसे विषयों पर तो हम रैलियां निकाल लेते है लेकिन राष्ट्रीय स्वाभिमान के विषय पर हममें से कितने सरकार से लड़ने या सर्वोच्च न्यायालय जाने की हिम्मत रखते है।

वर्ष 1950 से हमने न जाने कितने हिन्दी दिवस मना लिए। संविधान सभा ने एक स्वस्थ सोच के तहत हिन्दी को राजभाषा की मान्यता दी थी । लेकिन गलती तो हम नागरिकों की है जो प्रयोग नही करते । अगर हम प्रयोग ही नही करेंगें तो हिन्दी अपनी वास्तविक स्थिति की उत्तराधिकारणी कैसे होगी। यहाँ प्रयोग से मेरा तात्पर्य है ज्ञान-विज्ञान की भाषा बनने से। कोई बता सकता है कि आई. आई. टी के कितने विद्वानों ने अपनी हिन्दी में तकनीक की किताब लिखने की चेष्टा की है।
भारत की विधायिका सभा में एक विधेयक पारित कर हिन्दी को सरकारी कामकाज की भाषा स्वीकार किया गया था। उस समय तत्कालीन विधि मंत्री भारत रत्न भीमराव अंबेडकर ने स्पष्ट कहा था, ‘’ आज जब संपूर्ण भारत के लोगों ने एक राष्ट्र के रुप में रहने का संकल्प लिया है, हमारे लिए एक सामान्य संस्कृति का विकास करना बहुत जरुरी है। अत: हर भारतीय का यह कर्तव्य है कि वह हिन्दी को अपनाए ।”

संविधान ने हिन्दी के महत्व को देखते हुए राजभाषा दर्जा प्रदान किया था। जिसके पीछे कई कारण थे। लेकिन साधारण शब्दों में प्रमुख कारण रहा स्वाधीनता आंदोलन में इसकी व्यापक भूमिका। आजादी के पूर्व चूँकि राज-काज की भाषा अंग्रेजी थी। अत: संविधान निर्माताओं को सरकारी काम-काज तथा देश की राजनैतिक एकता के लिए एक ऐसी भाषा की जरुरत महसूस हुई जिसकी पूरे देश में व्यापक स्वीकृति हो। और, हिन्दी उस समय सर्वाधिक लोकप्रिय भाषा थी । अत: देश की संसद ने हिन्दी की व्यापक लोकप्रियता को देखते हुए सर्वसम्मति से देश की राजभाषा बनाया।

सरकारी कार्यालयों में तो हिन्दी थोड़ी-बहुत लागू भी हो गई । लेकिन आम जनता जिनके पास थोड़ा भी पैसा है वो अंग्रेजी की पूजा आज भी करते है। हममें से कितने अपने बच्चों को अपनी संस्कारों की भाषा सिखाने पर जोर देते है। आज 100 में से 99 व्यक्ति अपने बच्चों के जन्मदिन पर Happy Birthday to you का गान कराते है। पैदा होते ही बच्चो को Twinkle –Twinkle little Star सिखाते है। आज जरुरत सरकार पर दोष देने से ज्यादा अपने अंदर झाँकने की है। महान शायर दुश्यंत कुमार की एक गजल है-

‘’आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ो नारे न देख, घर अंधेरा देख तू आकाश के तारे न देख’’

यह हिन्दी पर अक्षरश: लागू होता है हमें जरुरत है अपने अंदर झाँकने की। वरना आने वाले समय में काफी विकट स्थिति पैदा हो जाएगी। हम सभी जानते है कि राष्ट्र मात्र एक भौगोलिक संकल्पना नही वरन सांस्कृतिक संकल्पना भी है। और, इसमें भाषायें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भाषायें सांस्कृतिक एकता की वाहक होती है।

आज हम सभी अपने भारत में दो विभाजन की बात करते है एक भारत दूसरा इंडिया। लेकिन अगर हम चेते नही तों आने वाले समय में हम अपने बच्चों में भी दो भारत देखेंगे। एक इंडिया यानि अंग्रेजी में पला-बढ़ा तथा दूसरा हिन्दी यानि भारतीय परिवेश में पला-बढ़ा। आने वाले समय में इस सांस्कृतिक विभाजन की आसानी से कल्पना की जा सकती है।

धन्यवाद !!!
विशेष आपके सुझावों का इंतजार रहेगा।

Wednesday, August 26, 2009

राष्ट्रभाषा हिन्दी के पक्ष में जबर्दस्त बदलाव.........

राष्ट्रभाषा हिन्दी के पक्ष में जबर्दस्त बदलाव.........

बीते सोमवार को यानि दिनांक 24 अगस्त 09 को नई दिल्ली में आयोजित माध्यमिक शिक्षा परिषद की बैठक को संबोधित करते हुए केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने देश के सभी स्कूलों में हिन्दी की पढ़ाई अनिवार्य करने की जोरदार वकालत की। मानव संसाधन विकास मंत्री ने कहा कि इससे हिन्दी भाषी और गैर हिन्दी भाषी क्षेत्रों के छात्रों के बीच जुड़ाव मजबूत होगा।
श्री सिब्बल ने अपने भाषण में कहा कि एक बार पूरे देश में हिन्दी का प्रचलन बढ़ जाए तो भारत को जानकारियों के लिए दूसरों की तरफ ताकना नहीं पड़ेगा। उन्होंने हिन्दी का दायरा मातृभाषा से बढ़ाकर ‘’ज्ञानोत्पादक’’ और ‘’सबको एक सूत्र में बाँधने वाली भाषा’’ तक ले जाने की जोरदार वकालत की। इस उद्दरण से समझा जा सकता है कि हिन्दी की स्वीकार्यता राजनैतिक रुप से भी बढ़ रही है।

आजादी के पूर्व हिन्दी की व्यापक पहुँच के कारण हमारे स्वाधीनता सेनानियों ने इसे संपर्क भाषा के रुप में महत्ता दी। बाद में, इन्हीं गुणों के कारण संविधान निर्माताओं ने इसे संघ की राजभाषा का दर्जा दिया। फिर धीरे-धीरे हिन्दी सिनेमा, आकाशवाणी और दूरदर्शन के सहयोग से हिन्दी ने देश की सांस्कृतिक जनभाषा का दर्जा पाया। बाद में उदारीकरण और वैश्वीकरण ने तो हिन्दी की आर्थिक महत्ता में जबर्दस्त बदलाव लाया। और हिन्दी बाजार की प्रमुख भाषा बनकर उभरी।

आज हिन्दी बिना किसी लाग-लपेट के आगे बढ़ रही है। और इसी का नतीजा है कि हमारे मानव संसाधन मंत्री ने इसे अनिवार्य बनाने की वकालत की। अगर हाल के उनके इस कदम की ओर नज़र दौड़ाए जिसमें उन्होंने पूरे राष्ट्र में एक शैक्षिक बोर्ड बनाने की वकालत की थी तो इसमें भी उनका यह कदम काफी सहायक सिद्ध होगा।



हिन्दी को अनिवार्य बनाने से कई फायदे होंगे। पहला तो, हिन्दी; विश्व की प्राचीनतम भाषा एवं देश की अधिकांश भाषाओं की जननी संस्कृत की छोटी बहन मानी जाती है। दूसरा, हिन्दी उर्दू के काफी नजदीक है। तीसरा, हिन्दी अपनी संपर्क भाषा के गुणों एवं भाषायी स्वीकार्यता के चलते पूरे देश में व्यापक रुप से स्वीकृत हुई है।

विशेष हमारे ब्लॉग के प्रथम आलेख हिन्दी का बदलता स्वरुप को पढ़े।

धन्यवाद !

भवदीय,

-साकेत सहाय

Friday, August 14, 2009

ट्रकों पर संदेश

ट्रकों पर संदेश

आमतौर पर हम और आप ट्रक ड्राईवरों को अलग से नजरिए से देखते है। कुछ इन्हें असभ्य, रैश ड्राईविंग तथा एड्स का पोषक मानते है, तो कुछ इन्हें राष्ट्रीय एकता व विकास की धुरी भी मानते है।
लेकिन, क्या आपने कभी ट्रकों को एक नए नज़रिए-से देखने की कोशिश की है। जी, हाँ ! हम बात कर रहे है ट्रकों के पीछे लिखे संदेशों एवं उनके छुपे हुए अर्थो की। साथ ही, ट्रक ड्राईवर हिन्दी के विकास में भी पर्याप्त योगदान देते है। पूरे देश का भ्रमण करने वाले ट्रक ड्राईवर अपने काम-काज में हिन्दी का ही व्यवहार करते है चाहे बिहार का ट्रक ड्राईवर तमिलनाडु जाए या केरल या आंध्र प्रदेश का ट्रक ड्राईवर बंगाल जाए सभी हिन्दी का ही प्रयोग करते है। इस प्रकार ये राष्ट्रभाषा के प्रचार-प्रसार में भी अपना पर्याप्त योगदान देते है।


" बुरी नज़र वाले तेरा मुँह काला ।"
" हम दो ! हमारे दो !! "
" हम सब एक है ।"
हम सब रोज ही ऐसे मुहावरे ट्रकों पर लिखे देखते है। बरबस ही, ये हमारा ध्यान भी अपनी-ओर खींचते है। ट्रक ड्राईवरों की माने तो ये संदेश उनकी भावनाओं, मस्ती एवं सोच को ब्यां करते है। इन मुहावरों के भावों की व्याख्या करें तो पायेंगें कि ये बिल्कुल सच कह रहे है। ट्रक ड्राईवर देश की अधिकांश समस्यायों पर अपनी राय इन मुहावरों के द्वारा ही जाहिर करते है। चाहे वह सामाजिक व्यवस्था में ' कोढ़ में खाज़ ' का काम करने वाली दहेज प्रथा को लें या तलाक-प्रथा का। इन सभी का विरोध कुछ इस प्रकार से ये दर्ज कराते है। जैसे- ' दहेज लेना या देना जूर्म है।' तो कुछ गुस्से भरे होते है। ' कुत्तो दहेज मत मांगो । 'बीबी से प्यार करो; तलाक मत दो।' यदि ऐसे स्लोगन समाज में बढ़ रही इन बुराईयों को थोड़ा भी थामने में मदद कर रहे है तो हम इसे ट्रक ड्राईवरों का सामाजिक योगदान तो मान ही सकते है।
ट्रकों पर लिखे कुछ मुहावरे बढ़ती आबादी की समस्या की ओर भी इशारा करते है। " हम दो ! हमारे दो !! इस प्रकार परिवार नियोजन कार्यक्रम में भी ये भागीदारिता करते है। राष्ट्रप्रेम को बढ़ावा देने में इनका कोई सानी नहीं है। जैसे- " हम सब एक है।" " हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आपस में है भाई-भाई ।" तो वहीं कुछ अंधविश्वासी भी होते है। इसका उदाहरण हम ट्रकों पर लिखे 'बुरी नज़र वाले तेरा मुँह काला ।' जैसे संदेशों में देख सकते है या ट्रकों के पीछे टोने-टोटको से सजे जूतों में टँगे देख सकते है। ट्रक राष्ट्रीय एकता को तो प्रत्यक्षत: परिवहन के द्वारा बढ़ाते ही है। अप्रत्यक्षत: ट्रकों के पीछे संदेश लिख कर भी राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देते है। 'कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है।' ' स्वदेशी वस्तुओं को खरीदों। ' इस प्रकार ये स्वदेशी आंदोलन को भी बढ़ाते है। राष्ट्रीय परमिट वाले ट्रक भाषायी एकता को भी बढ़ावा देते है। ' प्रणाम शहीदा नु, जय जवान, जय किसान।' इस संदेश मे एक साथ शहीद, जवान और किसान तीनों को नमन किया गया है। अगर हम इस संदेश के भाव को देखे तो पायेंगे कि इसका भाव कितना व्यापक है। इसमें एक साथ राष्ट्र के तीन आधारों को नमन किया गया है।
ड्राईवर समुदाय ईश्वर में व्यापक आस्था रखता है। लेकिन ये संप्रदायवाद एवं दिखावटीपने का विरोध करते है। कई ट्रकों में हम एक साथ सिख गुरुओं, मुस्लिम संतों एवं हिन्दू देवी-देवताओं के फोटो देखते है जो धार्मिक सौहार्द की ही पहचान है।
ट्रकों के पीछे हम और भी कई तरह के संदेश लिखे देखते है जो उनकी मस्ती को ब्यां करते है। ' मिलेगा मुकद्दर ', ' चल मेरी रानी ', ' तेरा रब रक्खा ', ' माँ का आशीर्वाद ', आदि। सोनु-मोनु दी गड्डी, मित्तरां दी मोटर, गड्डी जट्ट दी, चल हट पीछे, आदि उनके प्रेम व हास्य-रस की गहरी समझ की व्याख्या करते है।
कुछ संदेश स्वत: ही ट्रक चालकों व उनकी पीड़ा को अभिव्यक्ति प्रदान करते है। जैसे- ' जल्दी चल गड्डिए! मैंनु यार नाल मिलना है !!' इस संदेश द्वारा हम ट्रक चालकों की विरह वेदना एवं पिया से मिलने की बेसब्री को समझ सकते है।

उपरोक्त उद्दरणों से हम समझ सकते है ट्रक ड्राईवरों की भूमिका कितनी निराली है। ये समाज के प्रति सब कुछ करके भी अपने को सबसे कम समझते है। जैसे भगवान शिव सबका विषपान करके भी औघड़ कहलाए।

Thursday, August 13, 2009

हिन्दी का बदलता स्वरुप

आजादी के बाद के विभिन्न कालखंडों के दौर में राजभाषा हिन्दी ने कई उतार-चढ़ाव भरे सफर तए किए है। संपर्क भाषा, राजभाषा, राष्ट्रभाषा, अंतर्राष्ट्रीय भाषा आदि विभिन्न उपादानों से अंलकृत होकर हिन्दी भाषा के स्वरुप में भी काफी बदलाव आए है। स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली यह भाषा आज देश की राष्ट्रीय, सांस्कृतिक व राजनैतिक एकता को भी मजबूत कर रही है। अपनी संपर्क भाषा की भूमिका के कारण हिन्दी हमें स्थानीयता और जातीयता से परे लेकर जाती है। हिन्दी का यह भाषायी विस्तार भारतीय समाज में व्याप्त क्षेत्रीय, जातीय व भाषायी दूराग्रह को समाप्त करने में काफी मददगार सिद्ध हो रहा है। हिन्दी की इस भूमिका ने भारतीय जनमानस को राष्ट्रभाषा की कमी के अहसास से भी मुक्ति प्रदान की है।

हिन्दी कई बाधाओं-अवरोधों के बावजूद लोकतांत्रिक तरीके से स्वत: ही पूरे देश में फैल रही है। बोलना ही किसी भाषा को जीवित रखता हैं और फैलाता है। जैसे-जैसे हिन्दी भाषा की इस व्यापकता को स्वीकृति मिल रही है वैसे-वैसे उस पर देश की अन्य भाषाओं, बोलियों का प्रभाव भी स्पष्ट नजर आ रहा है। हिन्दी भाषा का फैलाव अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक हो गया है। सामान्यतया, यही माना जाता था कि हिन्दी की यह आंचलिकता बिहार की बोलियों, हरियाणवी तथा पंजाबी तक ही सीमित है। लेकिन, हिन्दी अपने भाषायी विस्तार के दौर में न केवल गुजराती, मराठी, बंगाली, उड़िया, तमिल, तेलगू आदि भाषाओं के संपर्क में आई है बल्कि इसकी पहुँच पूर्वोत्तर राज्यों की भाषाओं तक हो गई है। इसीलिए, आजकल पंजाबी से गृहित ‘मैंने जाना है या मैंने किया हुआ है’ का प्रयोग आंचलिकता नहीं माना जाता बल्कि इसे हिन्दी का भाषायी विस्तार माना जाता है। आंचलिकता के कारण हिन्दी के कई रुप प्रचलित हो गए है जिसे हम अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग रुपों में देख सकते है। हिन्दी क्षेत्रों में भी एक ही चीज के लिए अलग-अलग शब्द प्रयोग किए जाते रहे है। जैसे, मध्यप्रदेश में शासकीय महाविद्यालय या यंत्री(इंजीनियर) का प्रयोग तथा बस रखने के स्थान को किसी राज्य में डिपो तो कही आगार कहते है।
आज हिन्दी अपने राष्ट्रीय स्वरुप में दक्खिनी हिन्दी, हैदराबादी हिन्दी, अरुणाचली हिन्दी आदि में विस्तारित हो गई है। दक्षिण भारतीय हिन्दी के स्वरुप को हम भले ही मजाकिए अंदाज में हिन्दी सिनेमा में देखते है लेकिन इसे भी हिन्दी का विस्तार माना जाता है। स्पष्टतया, आज हिन्दी सार्वत्रिक रुप से संपूर्ण भारत की भाषा बन गई है। हिन्दी का यह अखिल भारतीय स्वरुप भारत के दक्षिण से उत्तर की ओर तथा भारत के पूर्व से पश्चिम की ओर आ रही है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में फैली हिन्दी का यह जबानी फैलाव एक दिन लिपि के स्तर पर भी होगा।
इस भाषायी विस्तार के कारण हिन्दी में केवल भारतीय भाषाओं के शब्द ही नही आए है बल्कि इसका फैलाव अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी आप्रवासियों की हिन्दी में देखा जा सकता हैं। मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम के अतिरिक्त जमैका, टोबैगो और गुयना जैसे भारतवंशी देश भी है। जहाँ की पचास फीसदी से ज्यादा आबादी तो कहीं पचास फीसदी से कम लोग मातृभाषा के रुप में हिन्दी का प्रयोग करते है। सूरीनाम की हिन्दी में ‘हमरी बात समझियो’ जैसा प्रयोग मानक हिन्दी माना जाता है। तो, मारीशस में ‘मैं बुटिक जा रहा हूँ (मैं दुकान जा रहा हूँ)’ जैसा प्रयोग सहज स्वाभाविक है। हिन्दी के बोलचाल के सैकड़ो शब्द मॉरीशस की भाषा क्रियोल में आ गये है। फीजी की मुख्य भाषा भी फीजी बात(फीजी हिन्दी) है। जिसका प्रयोग वहां की संसद में भी होता है। लेकिन फीजी बात से परिचित कोई भी व्यक्ति यह जानता है कि वह किस प्रकार के आंचलिक प्रयोगों से युक्त हिन्दी है। अमेरिका, कनाडा जैसे देशों में आप्रवासियों की बड़ी आबादी कुछ दूसरे प्रकार की हिन्दी बोलती है। यह भी आधुनिक हिन्दी का ही विस्तार है। अमेरिका तथा ब्रिटेन के हिन्दी रेडियो कार्यक्रमों में भारतीय रेडियो कार्यक्रमों से ज्यादा गुणवत्ता नज़र आती है।
हिन्दी भाषा के बदलते स्वरुप को हम मीडिया के बहाने भी देख सकते है। मीडिया ने भी हिन्दी के इस नए रुप को गढ़ने में पर्याप्त सहयोग किया है। कारण कि भाषाएं संस्कृति की वाहक होती है और इन दिनों इलेक्ट्रानिक मीडिया पर प्रसारित हो रहे कार्यक्रमों से समाज के बदलते सच को हिन्दी के बहाने ही उजागर किया जा रहा है। ऐसे कार्यक्रमों में राखी का स्वंयवर, बालिका वधू, इस जंगल से मुझे बचाओं, सच का सामना, अगले जन्म मोहे बिटिया ही कीजो, आदि के नाम गिना सकते है। इन कार्यक्रमों की लोकप्रियता से भी हिन्दी भाषा की बढ़ती स्वीकार्यता का अंदाजा लगा सकते है। हिन्दी मीडिया भी दिनों-दिन प्रगति की ओर बढ़ रही है। देश के मीडिया उद्योग का भी एक बड़ा हिस्सा हिन्दी मीडिया उद्योग का है।
प्रश्न यह है कि हिन्दी के इस विराट स्वरुप को तकनीकी व व्याकरणिक स्वीकृति कैसे मिले ? हिन्दी का यह स्वरुप अपने-अपने क्षेत्रीय संदर्भ में हिन्दी को आत्मीय बनाता है। जिसके कारण हिन्दी का प्रयोगकर्त्ता एक खास तरह का भाषिक अपनापन अनुभव करता है। लेकिन, हिन्दी का यह स्वरुप हिन्दी को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेकानेक बोलियों में बदल रही है। यह तथ्य कई शुद्धतावादियों को आपत्तिजनक भी लगती है।
किंतु, जैसा कि डॉ. रामविलास शर्मा ने कहा है- “ बोलियां ही हिन्दी की सबसे बड़ी शक्ति है। एक हिन्दी वह है जो अपने मानक रुप में अपनी सरलता और नियमबद्धता के कारण राष्ट्रीय और क्षेत्रीय से लेकर अंतर्राष्ट्रीय भाषा तक है। दूसरी हिन्दी वह है जो आंचलिक और क्षेत्रीय प्रकार की है। यह हिन्दी मानक हिन्दी के लिए शब्दों और प्रयोगों का अक्षय भंडार है। मानक हिन्दी का वहीं अंश गृहीत होता है जो इसके राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बोधगम्य होने में बाधक नहीं है। नमनीयता और अनुशासनबद्धता ऐसे परस्पर विरोधी ध्रुव है जिनके बीच दुनियाभर के बीच बड़ी भाषाएं काम करती है। हिन्दी का सच भी यही है। “
ऐसे में यह अत्यावश्यक है कि हिन्दी के इस नए स्वरुप को मानकीकृत किया जाए। सरकार को भी चाहिए कि वह सभी प्रमुख भाषाविदों से विचार-विमर्श करके हिन्दी का एक ऐसा मानक शब्दकोश तैयार करें जिसमें वर्तमान में प्रयोग किए जा रहे सभी शब्दों का समावेश हो तथा इस शब्दकोश में आम बोलचाल में स्वीकृत दूसरी भाषा के शब्दों को आसानी से जगह मिले। जिस प्रकार अंग्रेजी भाषा अपनी लोचता के कारण अंतर्राष्ट्रीय भाषा बन गई है तथा प्रत्येक वर्ष ऑक्सफोर्ड शब्दकोष में अंग्रेजी भाषा में स्वीकार्य शब्दों को अपनी शब्दावली में आसानी से जगह देता है ; उसी प्रकार हिन्दी शब्दकोष में भी दूसरी भाषा के शब्दों को आसानी से जगह मिले। तभी, हिन्दी को ज्यादा अंतर्राष्ट्रीय स्वीकार्यता मिलेगी। साथ ही हिन्दी की इस स्वीकार्यता से हमारी भाषायी अस्मिता को भी सम्मान मिलेगा और हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने का हमारा दावा पुख्ता होगा।