विश्वास का अंत-छल और हत्या
-डॉ साकेत सहाय
सिया द्वारा अपने होने वाले पति केतन की हत्या किये जाने का मामला एक गंभीर सामाजिक समस्या का संकेतक है । हाल के वर्षों में इस प्रकार की कई असामाजिक, हिंसक घटनाएं घटित हुई हैं जो हमारी परिवारिक व्यवस्था के कमजोर पड़ने का सूचक है । भारत जैसे परिवार प्रधान देश में इस प्रकार की घटनाओं से जुड़े सामाजिक संकेतों पर हमें जरूर विचार करना चाहिए ।
केतन की मृत्यु केवल एक युवा जीवन की हिंसक समाप्ति भर नही है। यह केतन का अपनी होने वाली पत्नी के ऊपर किए गए विश्वास का अंत है। उसके माता-पिता के विश्वास और सपनों की हत्या है । यह रिश्तों की हत्या है । यदि जांच में हत्या की साजिश सिद्ध होती है, तो दोषियों को कानून के अनुसार कठोर से कठोर दंड मिलना चाहिए; और यदि जांच में कोई अन्य तथ्य सामने आते हैं, तो उन्हें भी निष्पक्ष रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए। वर्तमान में सबसे महत्वपूर्ण बात निष्पक्ष जांच और न्याय सुनिश्चित करना है।
सिया द्वारा केतन की हत्या को केवल बिना इच्छा के उसकी शादी से जोड़ना सबसे बड़ा पाप है । मानव जीवन का अंतिम पड़ाव मृत्यु है । फिर केवल इस बात के लिए किसी के पुत्र, भाई, दोस्त की हत्या करना कि शादी उसकी मर्ज़ी के विरुद्ध हो रही थी इस तर्क के सहारे किसी की हत्या का बचाव करने वाला सबसे बड़ा पापी है ।
सिया द्वारा केतन की हत्या करना किसी से जीने का अधिकार छीन लेने के बराबर है । क्या हम ख़ुद के स्वार्थ और नकारात्मकता की आड़ में समाज में राक्षसी पैदा कर रहे हैं। सिया नाम जो भारतीय संस्कृति में नैतिकता, धर्मपरायणता और दयालुता की प्रतीक मानी जाती है। यह उस प्रतीक की भी हत्या है । क्या उसके माता-पिता ने इसी जघन्यता के लिए यह नाम रखा होगा? किसी की भी हत्या मानवीय जघन्यता का सबसे बड़ा घृणित कृत्य है। सिया द्वारा अपनी अनचाही शादी को रोकने के लिए यह रास्ता अपनाना एक आपराधिक और कुत्सित मानसिकता है । सिया का यह राक्षसीपना, किसी निर्दोष की हत्या करने का साहस मानवीय करुणा, वात्सल्य की सबसे बड़ी शक्ति स्त्रियों के लिए भी एक कलंक है । स्त्री तो इतनी कठोर, निर्दयी कभी नहीं होती?
हमें अपने परिवार, समाज को बचाने के लिए इस प्रकार के जघन्य कृत्यों पर थोड़ा ठहरकर सोचने की जरूरत है । विचार करें कि आज के भोगवादी, भौतिकवादी समाज में लोग कितने अमानवीय होते जा रहे हैं? पशुता से मनुष्यता की ओर आने में मनुष्य ने करोड़ों वर्षों का सफ़र तय किया, तब हम संवेदनशील हुए। मानवीय भाव की रक्षा के लिए हमने नचिकेता, ध्रुव पैदा किए तो जीवन रक्षार्थ भागीरथ। मनुष्यता का सबसे बड़ा गुण ही दया, संवेदनशीलता और सहिष्णुता है । फिर इतनी असंवेदनशीलता और स्वार्थपरकता का क्या कारण है? अतिशय भोग और भौतिकता ने हमारी दुनिया को सिकुड़-सा दिया है । हम अत्यंत संकुचित होते जा रहे है । इस सीमित होती जा रही दुनिया में हम स्वयं को ही केंद्र बनाते जा रहे हैं। नहीं तो क्या एक महानगर की लड़की सिया द्वारा ख़ुद के स्वार्थ में अपने ही भावी घर के चिराग की हत्या करना संभव होता? किसी माँ की गोद सूनी करना एक पूरी पीढ़ी की हत्या है। केवल शादी करने या न करने के अनिर्णय की स्थिति में हत्या को अंजाम देना कोई भी सभ्य समाज उचित नहीं ठहरा सकता ।
इस संवेदनाशून्यता की जड़ें बहुत गहरी हैं। इसके मूल में अति भौतिकवाद है। अति भौतिकता ने हमें स्वार्थी और अवसरवादी बना दिया है। हम अपने अतिरिक्त कुछ और सोच ही नहीं पा रहे हैं। पहले संयुक्त परिवारों का चलन था, फिर एकल परिवारों का दौर आया, और अब एकल परिवारों में बच्चे लगभग अकेले पड़ गए हैं। माता-पिता के लिए एकमात्र लक्ष्य है- पैसा कमाना । अब हम केवल वर्तमान में जी रहे हैं । पहले हमने अपना गांव छोड़ा, फिर अपने मूल समाज से कटते गए । सब कुछ भोग और लिप्सा है । वर्तमान की सबसे बड़ी समस्या अति व्यावसायिकता भी है। आवश्यकताओं और आकांक्षाओं के बीच हम पीसते जा रहे है। जीवन से सहजता, सरलता का स्थान खोता जा रहा है ।
अंत में यदि हत्या के आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह अत्यंत दुखद और निंदनीय अपराध है। किसी भी रिश्ते में असहमति, प्रेम-संबंध या विवाह से असंतोष का समाधान हिंसा नहीं हो सकता। कानून और संवाद के विकल्प हमेशा मौजूद होते हैं। यह व्यावहारिक पक्ष है कि विवाह में सहमति का महत्व आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति विवाह के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं है, तो उसे स्पष्ट रूप से अपनी असहमति व्यक्त करने और परिवारों को निर्णय पर पुनर्विचार करने का अवसर मिलना चाहिए। दबाव में बने संबंध कई बार गंभीर परिणाम उत्पन्न कर सकते हैं। फिर भी इस कारण से किसी की हत्या को अंजाम देना तो क्रूरता का निकृष्ट कृत्य है ।
इस घटना के साथ मीडिया और समाज के लिए भी यह जरूरी है कि न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान किया जाए। पुलिस ने आरोप लगाए हैं और गिरफ्तारियां हुई हैं, किंतु अंतिम सत्य न्यायालय के निर्णय से ही स्थापित होगा। अत: किसी भी आरोपी को न्यायालय के निर्णय से पहले दोषी मान लेना उचित नहीं है।
परंतु इस प्रकार की क्रूरता हमारी पारिवारिक व्यवस्था के लिए एक चेतावनी अवश्य है। यह कहा जा सकता है कि रिश्तों में पारदर्शिता, संवाद और स्वतंत्र सहमति का अभाव कभी-कभी गंभीर सामाजिक त्रासदियों का कारण बन सकता है, जिसकी भरपाई असंभव है । सिया द्वारा केतन की हत्या आज के माता-पिता के लिए भी एक सबक है और समाज के सामने खड़ा यह प्रश्न कि क्या संवाद की जगह अब मौन ने ले ली है? क्या अनजाने विश्वास का अंत छल है ? किसी के जीवन का छल के साथ अंत कर देना, मानवता की सबसे बड़ी पराजय है। किसी व्यक्ति के जीवन का अंत केवल उसका अंत नहीं होता बल्कि उससे जुड़े परिजनों की आशाओं, उमंगों का भी अंत होता है।
चित्र-साभार
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