Sunday, July 27, 2014

भाषा, भावुकता और यथार्थ के बीच में पिसती हिंदी


भाषा का मामला भावुकता का नहीं ठोस यथार्थ का है।  जब यथार्थ दरवाजे के रास्ते आक्रमण करता है, तो भावुकता खिड़की के रास्ते भाग निकलती है।  लेकिन ऐसा करने वाली भावुकता को निहायत ही सतही मानना चाहिए।  अगर वह सचमुच भावुकता है तो ऐसा नही करेगी। वह यथार्थ से मुकाबला करेगी और उसे मार गिरायेगी।  यह कोई मुश्किल काम नही है।  भावुकता की वजह से ही देश भर में खादी चल पड़ी थी। यह भावुकता ही है जो भारतीयों को उन अनिवासी भारतीयों से जोड़ती है जो लक्ष्मी की आराधना करने के लिए विदेश चले गए।  फिर वही बस भी गए।  देशभक्ति भी एक भावुकता है जो राष्ट्रीय संकट के समय सभी भारतीयों को ऐक्यबद्ध करती है।  इसलिए भावुकता की ताकत को कम करके नही आंकना चाहिए। भावुकता की वजह से हम उन आईआईटी इंजीनियरों को अपना मानते है जो हमारी सब्सिडी के बल पर पढ़ाई कर डालर की सेवा कर रहे है।  और हमारा देश आज भी तकनीक के मामले में पिछ्ड़ा है।  बस हम खुश होते है कि नोकिया का सीईओ भारतीय है। 

दरअसल भावुकता भी एक यथार्थ है।  इसलिए यथार्थ और भावुकता की टकराहट को एक यथार्थ बनाम दूसरे यथार्थ की टकराहट के रुप में देखना चाहिए ।  इस टकराहट में वह यथार्थ जीत जाता है जो मजबूत होता है।  यानी जो हारता है, वह भावुकता नही उसका छदम है।  हिंदी भाषी या दूसरी भारतीय भाषाओं के साथ अंग्रेजी भाषा का द्वंद भी कुछ-कुछ भावुकता बनाम यथार्थ का है।  यानि कि भावुकता में हम भले ही कह ले कि हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाएं किसी भी मामले में अंग्रेजी से कमतर नहीं।  लेकिन हम सभी भली-भांति जानते है भावुकता या दूसरे, जो हिंदी भाषी स्वंय हिंदी न जानते हुए भी या हिंदी (यहां हिंदी का प्रयोग सभी भारतीय भाषाओं के प्रतीक के रुप किया जा रहा है) से रखते हुए भी अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में भेजते है।  उनमें अपनी मातृभाषा के प्रति प्रतिबद्धता नहीं होती ऐसी बात नहीं है।  तीसरी बात यह है कि अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाना काफी खर्चीला होता है, फिर भी क्लर्क, चपरासी, दरबान, धोबी, बढ़ई, नाई और सफाई कर्मचारी भी अपना और अपने परिवार वालों का पेट काट कर, अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में भेजना चाहते हैं और भेज रहे है तो इसका कुछ मतलब होना चाहिए।


हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया है कि देश भर में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में प्रवेश लेने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।  हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में पढ़ने वालों की कुल संख्या अब भी बहुत अधिक है।  लेकिन यह कोई गर्व की बात नही है।  तसल्ली की भी बात नही है क्योंकि सफल और संपन्न वर्ग के ऐसे व्यक्ति विरल ही होंगे जो अपने बच्चों की पढ़ाई जिदपूर्वक अंग्रेजी में नहीं करवा रहे है।

कोई बच्चा हिंदी स्कूल में पढ़ा रहा है, तो इसका मतलब है कि उसके माता-पिता गरीब या अविकसित है।  जैसे-जैसे मध्य वर्ग या निम्न मध्य वर्ग में आने वाले लोगों की संख्या बढ़ेगी, भारतीय भाषाएं बुरे दिनों में साथ न देने वाले मित्रों की तरह गायब होने लगेंगी।  जब पूरा भारत संपन्न हो जाएगा, तब देश की सड़कों और बाजारों में सिर्फ अंग्रेजी बोली जाएगी।  अब भी ऐसे वाणिज्यिक स्थान हैं जहाँ हिंदी की अपेक्षा अंग्रेजी कई गुना ज्यादा बोली जाती है।  और ये कोई मिशनरी संस्थाओं द्वारा संचालित नही की जाती है। 

अक्सर हिंदी प्रेमी लेखको और पत्रकारों पर यह आरोप लगाया जाता है कि वे खुद तो हिंदी के पक्ष में अभियान चलाते है लेकिन अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाते हैं।  मेरी समझ से, यह तथ्य है आरोप नहीं।  इसलिए कि इस तथ्य के पीछे मौजूद विडंबना को समझने की कोशिश नहीं  की जाती।  जब ऐसी कोशिश होगी, तब सहज ही यह समझ आ जाएगा कि भाषा सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है, यह एक जीवन व्यवस्था भी है।  जब तक उस जीवन व्यवस्था पर निर्णायक प्रहार नही किया जाता जिसमें अंग्रेजी को फूलने-फलने का खतरनाक अवसर मिलता है, तब तक भारतीय भाषाओं के चिरायु होने की आशा नहीं की जा सकती।  वे अगर बचेंगी तो इसीलिए कि उनका प्रयोग करने वालों तक विकास नाम की पश्चिमी चिड़िया अब तक नही पहुँची है।

भाषा के मुद्दे को जब तक राजनीतिक, आर्थिक, प्रशासनिक, व औद्योगिक व्यवस्था से नही जोड़ा जाएगा, तब तक इस परिवर्तन आंदोलन का राष्ट्रव्यापी युद्ध औंधे मुँह गिरने को बाध्य है।  इसकी एक अच्छी मिसाल है तमाम हिंदी भाषी राज्यों की स्थिति।  हिंदी के लिए जरुरत है सामाजिक व्यवस्था को बदलने की।  अंग्रेजी हटाने के एक प्रयोग ने लाखों बच्चों का भविष्य अंधकारमय कर दिया।  भारत में अंग्रेजी कल हट सकती है बशर्ते एक ऐसी राष्ट्रीय हुंकार भरी जाए जो इस एलिट उन्मुख व्यवस्था पर चौतरफा धावा बोल दे।  हिंदी की जमीन सामान्य जन से जुड़ी है, तो अंग्रेजी का संबंध भारत में शोषण और संग्रह की प्रक्रिया से है।  इस प्रक्रिया में प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से शामिल हुए बगैर आप संपन्नता की मध्यवर्गिता की सीढ़िया नही चढ़ सकते।  हमारा राजनीतिक प्रतिष्ठान शोषण और संग्रह की इस प्रकिया दलाल बन चुका है।  इसमें हमारी सारी राजनैतिक धारायें शामिल है।  यह गांधीजी का ही कलेजा था कि उन्होंने अपने बच्चों को स्कूली शिक्षा से दूर रखा।  इसके लिए उन्होंने पत्नी से, एक बेटे से और अन्य अनेक लोगों से अपनी कटु आलोचना भी सही।  
अंत में मैं, यह कहना चाहूंगा कि केवल सीसैट का प्रश्न नहीं है दरअसल अब वक्त सभी जगह भारतीय भाषाओं को पुर्नस्थापित करने की।  तभी संविधान के अनुच्छेद 351 की भावना के साथ न्याय होगा।     

Tuesday, February 19, 2013

हर क्षेत्र में एकसमान विकास जरुरी


आंकड़ों में दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में गिने जाने वाले भारतवर्ष के समग्र विकास के लिए यह आवश्यक है कि वह अर्थव्यवस्था से जुड़े महत्त्वपूर्ण तत्त्वों जैसे विनिर्माण, कृषि, शेयर बाजार, सेवा क्षेत्र, ऑटोमोबाइल और खुदरा जैसे क्षेत्रों में आगामी पांच वर्षों में महत्त्वपूर्ण प्रगति दर्शाए।

कृषि-
वैदिक काल से ही हमारी अर्थव्यवस्था मूल रूप से कृषि और पशुपालन पर आधारित रही है। लेकिन उदारीकरण के बाद से यह देखा गया है कि हम कृषि से ज्यादा दूसरी चीजों पर ध्यान दे रहे हैं। जबकि देश के समावेशी विकास के लिए यह आवश्यक है कि कृषि क्षेत्र का त्वरित विकास किया जाए। भारतीय उद्योग परिसंघ ने कृषि क्षेत्र के विकास के लिए एक बीस सूत्रीय कार्यक्रम की सिफारिश की है। जिसमें एक मॉडल लैंड लीजिंग अधिनियम, बीज विधेयक को पारित करना और उसे लागू करना, एक कीट निगरानी प्रणाली बनाना, मनरेगा के तहत वॉटरशेड प्रबंधन और खेती का मशीनीकरण शामिल है। सिंचाई की सुविधा ज्यादा से ज्यादा कृषि योग्य भूमि तक पहुंचाई जानी चाहिए। फिलहाल यह सुविधा 40 फीसदी खेती योग्य जमीन तक ही उपलब्ध है। उपरोक्त प्रस्तावों पर यदि सरकार त्वरित कार्रवाई करे तो हमारी अर्थव्यवस्था की तस्वीर आगामी पांच वर्षों में निश्चय ही बदल जाएगी।
रिटेल- रिटेल क्षेत्र हमारी अर्थव्यवस्था की जान है। इसने देश के युवाओं को रोजगार दिलाने में बड़ी भूमिका अदा की है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आने के बाद यह सेक्टर देश में प्रगति के नए दरवाजे खोलेगा। एफडीआई आने से खुदरा क्षेत्र में बड़े निवेश से किसानों को उत्पादकता और आय बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। इससे किसान मार्ट खुलेंगे, जहां किसान अपने सब्जियों की अनिवार्य रुप से बिक्री कर पाएंगे। विनिर्माण - हमारे देश में विकास की सबसे बड़ी बाधा है देश का असमान विकास। शहरों और गांवों के बीच बढ़ती खाई। ग्रामीण इलाकों के बुनियादी ढांचे को एक अभियान के तहत मजबूत बनाने की जरूरत है। इसके लिए देश में सड़कों का व्यापक जाल बिछाए जाने की जरूरत है। राजग सरकार के समय में शुरू की गई परियोजना स्वर्णिम चतुर्भुज योजना के विस्तार पर फिर से जोर दिया जाए। परिवहन देश की अर्थव्यवस्था की जान होता है। इसलिए सरकार को आगामी पांच वर्षों में देश में अर्थव्यवस्था के मजबूत विकास के लिए रेल, सड़क, पानी, हवाई यातायात इत्यादि परिवहन साधनों के विकास पर जोर देना चाहिए।

सेवा- भारतीय लोग अपने सेवा - सत्कार के लिए विश्व भर में जाने जाते है। हमारे देश में अतिथि देवो भव कहावत प्रचलित है। भारत अपने गौरवमयी ऐतिहासिक धरोहर, महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहर, सांस्कृतिक विविधता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इसलिए दुनिया भर के पर्यटक भारत की तरफ आंखें फैलाए रहते हैं। ऐसे में सेवा क्षेत्र का बेहतर विकास समय की मांग है। ताकि पर्यटन अर्थव्यवस्था का विकास हो। वर्ष 2020 में विकसित भारत के स्वप्न को साकार करने के लिए यह आवश्यक है कि हम आगामी पांच वर्षों में अर्थव्यवस्था से जुड़े इन सभी बिंदुओं पर अपना ध्यान केंद्रित करें। सरकार उद्योग जगत के साथ मिलकर इन सभी बिंदुओं को अमलीजामा पहनाए तो निश्चय ही हमारी अर्थव्यवस्था की बेहतर तस्वीर उभरेगी।

Friday, January 11, 2013

आप सभी को विश्व हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनायें   !!!!


आईए हम सभी इस अवसर पर शपथ लें कि भारत देश की आन, बान और शान राष्ट्रभाषा हिंदी की ध्वजपताका को संयुक्त राष्ट्र संघ तक लहरायेंगें और अपने मन कर्म, वचन में राष्ट्रभाषा हिंदी को प्रतिष्ठित करने का प्रयास करेंगें।

इस संकल्प के साथ,

'' यदि आपके इरादे नेक है, ढृढ़ है, तो कोई भी कठिनाई आपको विचलित नहीं कर सकती, आप अपने प्रयासों में नि:संदेह सफलता हासिल करेंगें।''

इन्हीं शुभकामनाओं के साथ पुन: विश्व हिंदी दिवस की शुभकामनायें !!!

 

Tuesday, November 20, 2012

खरगोश तथा कछुए की कहानी – नए रुप में

हम सभी ने खरगोश तथा कछुए की कहानी सुनी होगी। हम सभी इस कहानी को सुन-सुनकर बड़े हुए है। हमने इससे सबक भी लिया होगा कि धीरे मगर लगातार कार्य करने वाला इंसान सफलता जरुर प्राप्त करता है। समय के साथ इस कहानी में नए संदर्भ जुड़े है। हम इस कहानी के नए रुप से आपको परिचित करायेंगें।


होता क्या है कि जब खरगोश जीती हुई बाजी अपने अति आत्मविश्वास की हार गया ; तो उसने इस हार पर काफी चिंतन – मनन किया। काफी सोचने के बाद उसने महसूस किया कि उसे यह हार उसके अति आत्मविश्वास, असावधानी तथा आलस के चलते मिली। यदि वह चीजों को अपने लिए तय मानकर नहीं चलता तो उसे निश्चित ही जीत मिलती। तो उसने पुन: कछुए को दूसरे दौड़ के लिए आमंत्रित किया। कछूए भी इससे सहमत नजर आया। इस बार खरगोश ने प्रतियोगिता में बिना रुके दौड़ लगाई तथा विजय हासिल की। इस कहानी से हम सभी को यह सबक मिलता है कि तेज तथा सतत परिश्रम करने वाला व्यक्ति निश्चय ही विजय पथ पर अग्रसर होता है।

लेकिन फिर से इस कहानी का अंत यही नहीं होता।

हार के बाद कछूआ काफी उदास हुआ। उसने भी अपनी हार पर काफी सोच – विचार किया। काफी सोच – विचार के बाद उसके दिमाग में यह बात आई कि वर्तमान रास्ते पर चलकर यह संभव नहीं कि खरगोश से दौड़ में जीत हासिल की जा सके। अत: उसने काफी विचार के बाद खरगोश से इस मार्ग से अलग दूसरे मार्ग से दौड़ लगाने की शर्त रखी। खरगोश भी इससे सहमत दिखा। फिर से एक नए दौड़ की शुरुआत हुई। इस बार चूँकि प्रतियोगिता नए मार्ग द्वारा तय की गई थी। इसलिए खरगोश ने भी प्रारंभ से ही तेज गति से दौड़ लगाई। लेकिन इस मार्ग में एक नदी पड़ती थी। जिससे पार करना खरगोश के लिए काफी मुश्किल था। लेकिन कछूए ने नदी को आसानी से पार कर लिया। और इस बार प्रतियोगिता में जीत हासिल कर ली।

इस कहानी से खरगोश को यह सबक मिला कि किसी भी कार्य में कूदने से पहले अपनी योग्यता को पहचानो और योग्यतानुसार ही कार्य में सफल होने के लिए लक्ष्य तय करो।

इस बार भी कहानी का यही अंत नही हुआ ।

समय के साथ खरगोश और कछूए में काफी मित्रता हो गई। दोनों ने पुरानी घटनाओं से सबक लेकर मिल – जुलकर कार्य करना तय किया। दोनों ने यह विचार किया कि दोनों के बीच हुई अंतिम दौड़ यदि दोनों मिलकर दौड़ते तो परिणाम कुछ अलग होता। अत: दोनों ने मिलकर यह निर्णय किया कि इस बार भी दोनों दौड़ लगायेंगें । लेकिन इस बार एक टीम के रुप में। और इस बार नदी के किनारे पहुँचने पर खरगोश ने कछूए की पीठ पर बैठकर नदी पार किया। इस बार दोनों के अंदर जबरदस्त आत्मसंतुष्टि का भाव उभरा जैसा कि इससे पहले कभी नहीं उभरा था।

प्रस्तुत तीनों उद्धरणों से यह शिक्षा मिलती है कि आप भले ही अपने स्तर पर तेज – तर्रार है। तथा कार्य को सफलतापूर्वक अंजाम दे रहे है। लेकिन यदि कोई कार्य आपने टीम के रुप में अंजाम तक पहुँचाया है तो इसका महत्व अलग होता है। इसके अलावा भी इस कहानी से कई सबक मिलते है।

ना कभी खरगोश और ना कभी कछूए ने हार मानी।

अपने कार्य में तेज तथा सदा निरत लगा रहने वाला व्यक्ति निश्चय ही लगातार मगर बेहद धीरे तरीके से कार्य करने वाले व्यक्ति से हमेशा जीत हासिल करता है।











Sunday, November 18, 2012

दीपावली की शुभकामनायें

नमस्कार बंधुवर,


चूँकि काफी दिनों  बाद  लेखन के माध्यम से आप सभी से रुबरु हूँ।  इसीलिए क्षमाप्रार्थी हूँ।  लेखन की सबसे बड़ी विशेषता है नियमित लेखन और पाठकों से जुड़ाव ।  सबसे पहले दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें




दीपावली है दीपों का त्योहार
हम सभी मनाते है भगवान राम के जमाने से यह त्योहार
लेकिन क्या कभी हमने सोचा है कि
क्या यह त्योहार केवल दीपों की अबलियां सजाने का नाम
कुछ पटाखों - फुलझड़ियों का नाम
तो फिर यह तो किसी भी दिन हो सकता है
फिर क्यूँ एक दिन है नियत

हम क्यों सभी चीजों में  हो जाते  है प्रतीकात्मक
क्या कभी हमने सोचा है दीपावली केवल
सजाने का नाम नहीं
है अंधेरे मन को उजाले विचारों से भरने का नाम
तभी तो विजयादशमी के बाद आता  है।


केवल जीतने से विजय नहीं मिलती
जीत तो मिलती है मन को जीतने से।
इसलिए आईए
हम सभी मिलकर दीपावली मनाए


हर कोई अपने मन के अंधियाये को रौशन करें
जहाँ हो रौशनी का टिमटिमाता दिया
उसे कर से रौशन जगमगाते दिए से।

Monday, August 27, 2012

अलविदा इमाम साहब

अलविदा इमाम साहब

खुदी को कर बुलंद इतना कि खुदा बंदे से पूछे कि बता तेरी रजा क्या है?


चरित्र अभिनेता के रूप में सर्वाधिक चर्चा पाने वाले कलाकार थे ए के हंगल। उन्होंने अपने पूरे फिल्मी करियर में वैसे तो लगभग सवा दो सौ फिल्मों में अभिनय किया, जिनमें से कुछ भूमिकाएं तो पूरी फिल्म में छाई हुई थीं, लेकिन फिल्म शोले में निभाई उनकी नेत्रहीन इमाम साहब की छोटी भूमिका ने लोगों में उनकी बहुत बड़ी पहचान बनाई। यह भी कह सकते हैं कि उन्हें इस फिल्म के रोल ने अमर बना दिया, जो शायद ही किसी चरित्र अभिनेता को नसीब हो।
कंपकंपाती-थरथराती सी उनकी आवाज और भावनाओं को व्यक्त करने का उनका अंदाज, जब फिल्म शोले में रामगढ़ के वासियों के मध्य उनका इकलौता बेटा अहमद (सचिन) घोड़े पर लाश की शक्ल में आता है, गांव वाले खामोश हैं, कोई कुछ नहीं बोलता..। सभी सन्न हैं..। ऐसे में इमाम साहब की आवाज आती है, इतना सन्नाटा क्यों है भाई..? उन्हें वीरू यानी धर्मेद्र पकड़कर अहमद के पास लाता है। वे अहमद को छूते हैं और नाम लेकर रो पड़ते हैं। इस बात से गांव वालों और ठाकुर यानी संजीव कुमार में कहासुनी होती है और जय यानी अमिताभ बच्चन और वीरू को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हैं कि ये दोनों जब तक इस गांव में रहेंगे, लोग एक-एक कर मारे जाएंगे।
गब्बर सिंह की चिट्ठी पढ़ने के बाद, जिसमें लिखा है कि जय-वीरू को गांव वाले उनके हवाले कर दें, नहीं तो खैर नही है, लोग कहते हैं, हम इस बोझ, यानी जय-वीरू, को नहीं उठा सकते। इन बातों को सुनने के बाद रोते हुए इमाम साहब उठ खड़े होते हैं, कौन यह बोझ नहीं उठा सकता है भाई..? जानते हो दुनिया का सबसे बड़ा बोझ क्या होता है? बाप के कंधों पर बेटे का जनाजा.., इससे भारी बोझ कोई नहीं है। मैं बूढ़ा यह बोझ उठा सकता हूं, तुम एक मुसीबत का बोझ नहीं उठा सकते..? भाई, मैं तो एक ही बात जानता हूं कि इज्जत की मौत जिल्लत की जिंदगी से कहीं अच्छी है..। बेटा मैंने बेटा खोया है मैंने.., फिर भी मैं चाहूंगा कि ये दोनों इसी गांव में रहें। आगे आपकी मर्जी..। तभी अजान की आवाज सुनाई देती है, तो इमाम साहब कहते हैं, मेरे नमाज का वक्त हो गया है। आज पूछूंगा खुदा से.., मुझे दो-चार बेटे और क्यों नहीं दिए गांव पर शहीद होने के लिए..? ये संवाद आज भी दर्शकों को सिहरा देते हैं। उस समय दर्शक खल चरित्र गब्बर सिंह के प्रति आक्रोश से भर जाते हैं। फिल्म में ऐसा माहौल ए के हंगल ने अपने संवादों और अनोखे अंदाज के जरिये बनाया था। तमाम फिल्मों में अपने सहज अभिनय से लोगों के दिल में बसने वाले शोले के इमाम साहब यानी ए के हंगल ने लंबे समय तक बीमारी से लड़ने के बाद कल दुनिया को अलविदा कह दिया..।
शोले के अलावा तमाम ऐसी फिल्में हैं, जिनमें ए के हंगल ने कमाल का या यह कहें कि यादगार अभिनय किया। उनकी शौकीन की भूमिका, जो रंगीन तबीयत के उम्रदराज इंदर सेन की थी, जिसे फिल्म में उसके दोस्त बने अशोक कुमार और उत्पल दत्त एंडरसन कहते हैं, को भला कौन भुला सकता है। इसमें तीनों एक युवा लड़की से दिल लगा बैठते हैं। फिर चितचोर के पितांबर चौधरी, खलनायक के शौकत भाई, मेरी जंग के वकील गुप्ता, राम तेरी गंगा मैली के बृजकिशोर, कमला के काका साब, अवतार के रशीद अहमद, खुद्दार के रहीम चाचा, नरम गरम के मास्टरजी, हम पांच के पंडित, जुदाई के नारायण सिंह, सत्यम शिवम सुंदरम के बंसी चाचा, बिदाई के रामशरण, कोरा कागज के प्रिंसिपल गुप्ता, मेरे अपने और जवानी दीवानी के प्रिंसिपल, नमक हराम के बिपिन लाल पांडे, अभिमान के सदानंद, हीरा पन्ना के दीवान करण सिंह, बावर्ची के रामनाथ शर्मा, गुड्डी में गुड्डी के पिता की भूमिका को लोग कैसे भुला सकते हैं?
देखें तो ए के हंगल ने फिल्मों में जो भी भूमिकाएं कीं, वे उन चरित्रों में पूरी तरह ढल गए थे। वे जिन निर्माताओं की पसंद रहे वे थे ऋषिकेश मुखर्जी, गुलजार, बासु चटर्जी, देव आनंद और अनिल गांगुली। इन सब की फिल्मों में उन्होंने ज्यादा काम किया। उन्होंने कुछ हिंदी और अंग्रेजी सीरियलों में भी काम किया।
ए के हंगल का पूरा नाम था अवतार किशन हंगल। वे मूल रूप से कश्मीरी थे। उनका जन्म अविभाजित भारत के पेशावर, जहां उनके पूर्वज बस गए थे, में 1917 को हुआ था। दादा शंभुनाथ पंडित अंग्रेजों के शासनकाल में कलकत्ता हाईकोर्ट में पहले भारतीय जज बने। उस समय बिहार और बंगाल का बंटवारा नहीं हुआ था। पटना म्यूजियम में हाल तक क्वीन विक्टोरिया के साथ शंभूनाथ जी की एक पोट्रेट लगी हुई थी। कोलकाता में उनके नाम पर रोड और अस्पताल हैं। हंगल के पिता भी ब्रिटिश शासन के दौरान प्रतिष्ठित पद पर थे।
हंगल बचपन में बेहद चंचल थे। पढ़ाई में मन नहीं लगता था, किसी तरह मैट्रिक किया। जब युवा हुए तो कुछ करना है, यह सोचकर उन्होंने टेलरिंग शुरू की। इन्हीं दिनों उनका रुझान रंगमंच की ओर भी हुआ, फिर वे इसी में सक्रिय हो गए। उसी समय उनके परिजनों को कराची शिफ्ट होना पड़ा। यहीं उनकी शादी हुई। उस समय स्वतंत्रता आंदोलन तेजी पर था। वे उसमें शामिल हो गए और कई बार जेल भी गए। वाम विचारधारा से ताल्लुक रखने के कारण हंगल भारत-पाकिस्तान बंटवारे के दौरान भी जेल में रहे। जेल से वे इस शर्त पर छूटे कि आगे इस शहर में नहीं रहेंगे। वे 1949 में मुंबई आ गए। यहां आने के बाद उन्होंने एक टेलरिंग शॉप, जो दक्षिण मुंबई में थी, आनंद जेंट्स टेलर में काम करना शुरू किया। कुछ पैसे आए, तो बाद में क्रॉफर्ड मार्केट, जिसमें दिलीप कुमार की भी फल की दुकान थी, में अपनी दुकान खोल ली। हंगल अच्छी पेंटिंग भी किया करते थे। उनका रुझान रंगमंच में तो था ही। फिर वे कैफी आजमी और बलराज साहनी के करीब आए और उनके सुझाव पर इप्टा की स्थापना में जुट गए। उन्होंने नाटकों में अभिनय के साथ निर्देशन भी किया। कई नाटक लिखे। उन्हें मराठी नाटक देखना काफी पसंद था। वे मानते थे, उन दिनों मराठी नाटकों के विषय न केवल गंभीर होते, बल्कि कलाकार भी काफी टैलेंटेड थे। हंगल डॉ. श्रीराम लागू के जबर्दस्त फैन थे। हालांकि उन्होंने खुद कभी मराठी नाटकों में अभिनय नहीं किया। हां, उन्हें इन नाटकों के गाने इतने पसंद आए कि उन्होंने उस्ताद से संगीत सीखना शुरू कर दिया। उन्हें फिल्मों में काम करने के कई अवसर मिले, जिसे ठुकरा दिया, लेकिन बाद में जब समझ आया कि यह भी अभिव्यक्ति का एक अहम माध्यम है, तो काम करने के लिए तैयार हो गए।
हंगल साहब का अभिनय सफर फिल्म हमसे है जहां (2008) तक जरूर चला, लेकिन उन्होंने फिल्मों में नियमित रूप से काम करना 2000 में ही बंद कर दिया था। इस बीच उनकी लगान, हरिओम, पहेली आदि फिल्में आई। फिर वे अधिक बीमार रहने लगे। वे लंबे समय से फेफड़े में सूजन की समस्या से पीडि़त थे। अधिक उम्र होने की वजह से उन्हें दूसरी स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां भी थीं। अपने अंतिम दिनों में वे किसी व्यक्ति का साथ पाने के लिए लालायित रहते थे। पिछले 16 वर्षो से वे बेटे विजय हंगल, जो प्रोफेशनल फोटोग्राफर हैं, के साथ मुंबई के सांताक्रुज इलाके में किराये के घर में रह रहे थे। विजय ने उनकी तबियत खराब रहने के बाद से यानी 2000 में काम करना छोड़ दिया था। वे अपने पिता की सेवा में ठीक वैसे ही जुटे रहे, जैसे तमाम फिल्मों में हंगल साहब अपने काम में, अपने चाहने वालों के लिए जुटे रहते थे। ईमानदारी के साथ..।(दैनिक जागरण से साभार )

परीक्षा सुधार समिति

 परीक्षा विवाद के बीच सरकार द्वारा श्री नंदन नीलेकणी को दी गई बड़ी जिम्मेदारी!  नीट परीक्षा व्यवस्था पर उठे सवालों के बीच केंद्र सरकार ने आज...