Tuesday, October 18, 2011



कहते है बिना विश्वास के कुछ नहीं होता, और इसी विश्वास पर दुनिया कायम है, मैंने इसी विश्वास पर चंद पंक्तियां लिखी है, आशा है आप सभी को पसंद आएगी...... 

विश्वास ..............

आज भी मौजू़द है दुनिया में
नमक की तरह ,
अब भी
पेड़ों के भरोसे पक्षी
सब कुछ छोड़ जाते हैं,
बसंत के भरोसे  वृक्ष
बिलकुल रीत जाते हैं,
पतवारों के भरोसे नाव
समुद्र लांघ जाती  हैं,
बरसात के भरोसे बीज
धरती में समा जाते हैं,
अंजाने पुरुष के पीछे
सदा के लिये स्त्री चल देती हैं।
मां ममता के पीछे
अपना सर्वस्व न्योछावर कर देती है।
मातृभूमि के लिए वीर
अपनी आहूति देते है।
यदि विश्वास नही होता तो
ये जमीं नही होती, ये आस्मां नही होता।
ये लोक का विश्वास है कि परलोक के सहारे
ये अपना भविष्य सुधारती है।
फिर क्यूं लोग पूछते है विश्वास क्या है,
लेकिन मैं तो कहता हूँ विश्वास ही सब कुछ है,
क्यूंकि विश्वास में आस है
और इसी आस में हम और आप है
हमारे रिश्तों की बुनियाद है।

                                       - साकेत सहाय

 जब अधिकारी के कहने पर नेहरुजी ने संदेश हिंदी में पढ़ा ......
वर्ष 1962 की बात है, भारत-चीन युद्ध चल रहा था। चीन ने पंचशील समझौते का उल्लंघन कर भारत पर अचानक आक्रमण कर दिया था। युद्ध को लेकर भारत की कोई तैयारी नहीं थी। अत: भारत कमजोर पड़ता जा रहा था। चारों ओर निराशा का माहौल था।   प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने देशवासियों को निराशा से उबारने के लिए आकाशवाणी से राष्ट्र के नाम संदेश  देना तय किया। उस समय आकाशवाणी के प्रभारी अधिकारी मोहन सिंह सेंगर थे। वे प्रधानमंत्री के आवास पर रिकॉर्डिग के लिए गए।  कार्यक्रम के अनुसार प्रधानमंत्री को संदेश का मूल पहले अंग्रेजी में पढ़ना था, फिर उसका हिंदी अनुवाद पढ़ना था। सेंगर साहब को यह नहीं जंचा कि अंग्रेजी को अहमियत देकर उसे मूल पाठ के रूप में पढ़ा जाए और राष्ट्रभाषा हिंदी को अनुवाद की भाषा बनाकर उसके साथ सौतेला व्यवहार किया जाए।  वे नेहरूजी से बोले- सर! आपातकाल के इस समय में भारत का प्रधानमंत्री हिंदी संदेश अनुवाद के रूप में पढ़े, यह ठीक नहीं लगता। ऐसे समय में आप यदि मूल हिंदी में ही बोलें तो प्रभावी रहेगा। नेहरूजी ने तत्काल कहा- हां! तुम ठीक कहते हो। मूल हिंदी में संबोधित करना ज्यादा ठीक रहेगा और नेहरूजी ने संदेश का मूल पाठ हिंदी में ही किया। वस्तुत: हमारी विचाराभिव्यक्ति में सर्वोपरि स्थान राष्ट्रभाषा का होना चाहिए। अन्य भाषाओं का ज्ञान रखकर उनका उपयोग करना बुरा नहीं है, किंतु महत्व सदा अपनी भाषा को देना चाहिए।


- साकेत सहाय 

Friday, April 8, 2011

शेरशाह सूरी : एक महान राष्ट्र निर्माता

इतिहास प्रारंभ से ही मेरी रुचि का विषय रहा है और जब हाल में भूतपूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के जन्म शताब्दी अवसर पर टाइम पत्रिका ने विश्व इतिहास के 100 प्रभावशाली राजनैतिक व्यक्तियों की सूची निकाली जिसमें भारत के तीन महान व्यक्तियों सम्राट अशोक, अकबर एवं महात्मा गांधी का नाम था तो सहसा भारतीय इतिहास के महान सम्राट शेरशाह सूरी पर ध्यान चला गया। इसमें कही से कोई शक नही है कि ये तीनों ही व्यक्ति भारत राष्ट्र की महान धरोहर है जिनका राष्ट्र के निर्माण में अमूल्य योगदान रहा है। मगर इस सूची में अगर मध्यकालीन भारत के महान सम्राट शेरशाह सूरी का अगर जिक्र हुआ रहता तो भारतीय परिप्रेक्ष्य में सही मायनों में यह सूची परिपूर्ण कहलाती।

कभी-कभी इतिहास कुछेक महान व्यक्तियों के प्रति निर्दयी-सा हो जाता है। शायद इनमें से एक शेरशाह सूरी माने जा सकते है। अगर इतिहास अकबर को महानतम धर्मनिरपेक्ष सम्राट की श्रेणी में रखता है तो उस अकबर के ऐतिहासिक प्रेरणास्रोत शेरशाह सूरी (1486 – 1545) माने जा सकते है। शेरशाह सूरी एक ऐसा व्यक्ति था, जो जमीनी स्तर से उठ कर शंहशाह बना। जमीनी स्तर का यह शंहशाह अपने अल्प शासनकाल के दौरान ही जनता से जुड़े अधिकांश मुद्दो को हल करने का प्रयास किया। हालांकि शेरशाह सूरी का यह दुर्भाग्य रहा कि उसे भारतवर्ष पर काफी कम समय शासन करने का अवसर मिला। इसके बावजूद उसने राजस्व, प्रशासन, कृषि, परिवहन, संचार व्यवस्था के लिए जो काम किया, जिसका अनुसरण आज का शासक वर्ग भी करता है।

अगर हम मध्यकालीन इतिहास में शेरशाह सूरी के पन्ने पलटे तो हममें से अधिकांश को शेरशाह सूरी एक शानदार रणनीतिकार, आधुनिक भारतवर्ष के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला महान शासक के रुप में नजर आएगा। जिसने अपने संक्षिप्त शासनकाल में शानदार शासन व्यवस्था का उदाहरण प्रस्तुत किया। शेरशाह सूरी ने भारतवर्ष में ऐसे समय में सुढृढ नागरिक एवं सैन्य व्यवस्था स्थापित की जब गुप्त काल के बाद से ही एक मजबूत राजनैतिक व्यवस्था एवं शासक का अभाव-सा हो गया था। शेरशाह सूरी ने ही सर्वप्रथम अपने शासन काल में आज के भारतीय मुद्रा रुपया को जारी किया। इसीलिए इतिहासकार शेरशाह सूरी को आधुनिक रुपया व्यवस्था का अग्रदूत भी मानते है। मौर्यों के पतन के बाद पटना पुनः प्रान्तीय राजधानी बनी, अतः आधुनिक पटना को शेरशाह द्वारा बसाया माना जाता है।
शासन सुधार के क्षेत्र में भी शेरशाह ने एक जनहितकारी व्यवस्था की स्थापना की। जिससे काफी कुछ अकबर ने भी सीखा था। शासन के सुविधाजनक प्रबन्ध के लिए उसने सारे साम्राज्य को 47 भागों में बाँटा था, जिसे प्रान्त कहा जाता है। प्रत्येक प्रान्त सरकार, परगने तथा गाँव परगने में बँटे थे। काफी कुछ यह व्यवस्था आज की प्रशासनिक व्यवस्था से मिलती है। शेरशाह के शासन काल की भूमि व्यवस्था अत्यन्त ही उत्कृष्ट थी। उसके शासनकाल में महान भू-विशेषज्ञ टोडरमल खत्री था। जिसने आगे चलकर अकबर के साथ भी कार्य किया। शेरशाह ने भूमि सुधार के अनेक कार्य किए। उसने भूमि की नाप कराई, भूमि को बीघों में बाँटा, उपज का 3/1 भाग भूमिकर के लिए निर्धारित किया। उसने भूमिकर को अनाज एवं नकद दोनों रू में लेने की प्रणाली विकसित कराई। पट्टे पर मालगुजारी लिखने की व्यवस्था की गई। किसानों को यह सुविधा दी गई कि वे अपना भूमिकर स्वयं राजकोष में जमा कर सकते थे। अकबर के शासनकाल की भूमि व्यवस्था काफी कुछ इसी पर आधारित थी। बाद में अंग्रेजों ने भी इसे ही चालू रखा।
शेरशाह की न्याय व्यवस्था अत्यन्त सुव्यवस्थित थी। शेरशाह के शासनकाल में फौजदारी और दीवानी के स्थानीय मामले की सुनवाई के लिए दौरा करने वाले मुंसिफ नियुक्त किये गये। प्रधान नगरों के काजियों के अलावा सरकार में एक प्रधान मुंसिफ भी रहता था जिसे अपील सुनने तथा मुंसिफों के कार्यों के निरीक्षण करने का अधिकार था। शेरशाह ने पुलिस एवं खुफिया विभाग की भी स्थापना की थी।

शेरशाह के समय में साहित्य, कला, एवं सांस्कृतिक प्रगति भी उच्च स्तर पर थी। शेरशाह के शासनकाल में मलिक मोहम्मद जायसी ने पद्‍मावत की रचना की। इनके शासन में फारसी तथा हिन्दी का पूर्ण विकास हुआ।
शेरशाह सूरी के शासनकाल की सबसे पहली विशेषता उसकी परिवहन व्यवस्था है। सड़क किसी भी राष्ट्र के विकास व्यवस्था की धूरी मानी जाती है। शेरशाह सूरी ने इस धूरी के महत्व को जाना और अपने समय से आगे की सोचकर इतिहास में अमर हो गए। शेरशाह सूरी ने बंगाल के सोनागाँव से सिंध नदी तक दो हज़ार मील लंबी पक्की सड़क बनवाई थी, ताकि यातायात की उत्तम व्यवस्था हो सके। साथ ही उसने यात्रियों एवं व्यापारियों की सुरक्षा का भी संतोषजनक प्रबंध किया। ग्रांड ट्रंक रोड का निर्माण करवाना शेरशाह सूरी के विलक्षण सोच का प्रतीक है। यह सड़क सदियों से विकास में अहम भूमिका निभा रही है। उसने सड़कों पर मील के पत्थर लगवाए। उसने डाक व्यवस्था को दुरुस्त किया एवं घुड़सवारों द्वारा डाक को लाने−ले−जाने की व्यवस्था की। उसके फरमान फारसी के साथ नागरी अक्षरों में भी होते थे।
उसने अनेक भवनों जिसमें रोहतासगढ़ का किला, अपना खुद का मकबरा, दिल्ली का पुराना किला का निर्माण कराया। उसने सड़कों के किनारे छायादार एवं फल वाले वृक्ष लगाये गये थे, और जगह-जगह पर सराय, मस्जिद और कुओं का निर्माण कराया। दिल्ली में उसने शहर पनाह बनवाया था, जो आज वहाँ का 'लाल दरवाजा' है। दिल्ली का 'पुराना क़िला' भी उसी के द्वारा बनवाया माना जाता है।

शेरशाह सूरी के योगदान को देखते हुए अंग्रेज़ों ने उनके मक़बरे का संरक्षण शुरु किया। उपरोक्त तथ्यों द्वारा हम यह आसानी से कह सकते है कि शेरशाह सूरी महान राष्ट्र निर्माता थे। उनके द्वारा किए गए कार्य उनके अग्रगामी सोच की निशानी है विशेष रुप से परिवहन, डाक, शासन व्यवस्था के क्षेत्र में। हालांकि शेरशाह ने दिल्ली की गद्दी पर बैठने से पूर्व विभिन्न स्थानों पर अपनी सुविधा और फायदे को ध्यान में रखकर कई लड़ाईयों में विश्वासघात द्वारा भी जीत हासिल की थी। जो उसके व्यक्तित्व के स्याह पक्ष माने जा सकते है। फिर भी, शेरशाह के व्यक्तित्व एवं कृतित्व व राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इतिहास ने उनके साथ न्याय नही किया एवं जो जगह उन्हें मिलनी चाहिए थी वो उन्हें नही मिल सका।

Tuesday, January 25, 2011

राष्ट्रीय मतदाता दिवस





भारतीय निर्वाचन आयोग के स्थापना की 60 वीं वर्षगांठ के अवसर पर इस वर्ष 25 जनवरी को पहली बार राष्ट्रीय मतदाता दिवस के रुप में मनाया जा रहा है। 26 जनवरी से पहले इस दिवस की प्रासंगिकता बेहद सटीक बैठती है। क्योंकि किसी भी गणतांत्रिक देश की पहली पहचान मतदान का अधिकार है। ताकि वो अपने सही प्रतिनिधि का चुनाव कर सके।


हमारे देश में अशिक्षित लोगों की बहुत बड़ी आबादी निवास करती है। जिससे यहां लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति लोगों को जागरुक करना एक कठिन कार्य है। इसी उद्देश्य से मतदाताओं को और अधिक जागरुक बनाने और उन्हें मतदान करने के लिए प्रोत्साहित करने के मकसद के साथ मतदाता दिवस की शुरुआत गई है। इस अवसर पर नए मतदाताओं को एक बैज (बिल्ला) भी दिया जाएगा, जिसमें लोगो (प्रतीक चिह्न) के साथ नारा अंकित होगा- मतदाता बनने पर गर्व है, मतदान को तैयार हैं। मतदाता दिवस आयोजन के तहत देशभर में मतदान केंद्र वाले क्षेत्रों में 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र के नए मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में दर्ज किए जाएंगे। गौरतलब है कि 1988 में संविधान (61वां संशोधन) अधिनियम द्वारा मतदान की उम्र 21 वर्ष से 18 वर्ष की गयी थी। लेकिन इसके बावजूद भी 18 वर्ष की आयु पार करने वाले मात्र 20 से 25 प्रतिशत युवाओं के नाम ही मतदाता सूची में दर्ज हो पाते हैं। पर मतदाता दिवस को मनाने के साथ अब चुनाव आयोग देशभर में फैले अपने 8.5 लाख मतदान केन्द्रों से हर साल एक जनवरी को 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवाओं की पहचान कर उन्हें मतदाता सूची में शामिल करेगा और 25 जनवरी को उन्हें विशेष बैज के साथ फोटो पहचान पत्र जारी किया जाएगा।
देश में पिछले कई सालों से युवाओं में मतदान के प्रति घटती लोकप्रियता और कम जागरुकता की वजह से परेशान चुनाव आयोग को पूरी उम्मीद है कि इस तरह के कार्यक्रम से देश में मतदान के प्रति युवाओं में जागरुकता फैलेगी और बाकी के लोग भी अपने मतदाता अधिकार का सही से उपयोग कर सकेंगे। आईए हम यह संकल्प करें -

       '' लोकतंत्र में मतदान करना हम सभी का नैतिक दायित्व है। ''









Friday, November 19, 2010

हिन्दी का प्रश्न

हिन्दी का प्रश्न


                   बार-बार मन में यह प्रश्न कौंधता है कि देश की भाषा समस्या का कारण क्या है ? क्या यह समस्या एक विशेष भाषा से राजनैतिक दुराव की देन है या अंग्रेजीवादी मानसिकतावादी से एक अतिरिक्त लगाव की उपज। दोनों ही विचार मन में आते है। लेकिन इस स्थिति का जिम्मेवार कौन है। जबकि संविधान सभा ने सर्वसम्मति से हिन्दी को राजभाषा घोषित किया था। हमारे जन प्रतिनि‍धियों ने भी हिन्दी की महत्ता एवं गुणों को स्वीकारते हुए वर्ष 1947 में ही इसे संघ की राजभाषा के रुप में स्वीकार किया था। शायद राजभाषा हिन्दी भी भारत सरकार के दूसरे चिन्हों एवं प्रतीकों की तरह ही प्रतीकवाद की शिकार हो गई। दोष तो हम आसानी से राजनैतिक दलों या सरकार को दे सकते है। लेकिन क्या कभी हमने अपने अंदर झाँकने की कोशिश की है? कि हम इसके लिए कितने जिम्मेवार है। कारण कि हिन्दी केवल एक भाषा नही है हमारे राष्ट्रवाद की प्रतीक भी है। हिन्दी के साथ-साथ दूसरी भारतीय भाषाएं भी इसी मानसिकता की शिकार हो रही है।

हिन्दी में वह सब वह गुण है जो किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने की पात्रता है। भारत की दूसरी अन्य भाषाओं की तरह हिन्दी का जन्म भी संस्कृत से हुआ है तो वही यह भाषा उर्दू के भी काफी करीब है। यानि देश की गंगा-जमुनी तहजीब की भाषा हिन्दी ही है। पूरे राष्ट्र में एक साथ बोली व समझी जाने वाली एकमात्र भाषा हिन्दी ही है। सांस्कृतिक, वैचारिक, आध्यात्मिक रुप से देश को जोड़ने वाली भाषा और सबसे प्रमुख जिससे आजकल की पीढ़ी काफी कम परिचित है वह है स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों एवं राष्ट्र को एकीकृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली भाषा हिन्दी ही है। फिर भी, कारण चाहे जो हो, इसे देश का दुर्भाग्य कहिए कि इतना कुछ होते हुए भी हिन्दी अपनी कोई पुख्ता पहचान नही बना पाई। आज भी इसे लोग अंग्रेजी से कमतर आंकते है। देश के महान विचारक इसके पीछे जहाँ देश की अन्य भाषाओं का हिन्दी के कारण अपनी पहचान खोने का डर बताते है तो कुछ वैचारिक गुलामी को। मतलब भले ही हम अपना कार्य एक विदेशी भाषा में करें लेकिन हिन्दी में न करें। यह तर्क भाषायी गुलामी का परिचायक नही तो क्या है। भले ही इस भाषायी गुलामी के पक्ष में विद्वतजन हजार तर्क देते है। कुछ हद तक यह ठीक है कि जितनी ज्यादा भाषा का ज्ञान हो उतना ही अच्छा है। यह तर्क अच्छा भी है। लेकिन यह तर्क वही तक ठीक है जहाँ तक यह ज्ञान से संबंद्ध रखता है। इसका मतलब हम अपनी भाषा को दरिद्र मानते है। हिन्दी दरिद्र भाषा नही बल्कि जरुरत इसमें छुपे ज्ञान को खंगालने की है। हिन्दी जहाँ एक तरफ समृद्ध भाषा है वही यह राष्ट्रीय पहचान की भी भाषा है। क्या अंग्रेजी में यह सब गुण है ? संविधान ने हिन्दी को वह सब कुछ दिया जिसकी वह अधिकारिणी थी। दोष नीति का नही हमारी नीयत का है। संवि‍धान लागू होने के बाद पंद्रह साल का समय भाषा परिवर्तन के लिए रखा गया था और वह समय केवल केंद्र सरकार की भाषा के लिए ही नहीं बल्कि भारत संघ के सभी राज्यों के लिए था ताकि उस अवधि में सभी राज्य सरकारें अपने-अपने राज्यों में अपनी राजभाषा निर्धारित कर लेंगी एवं उन्हें ऐसी सशक्त बना लेंगी कि उनके माध्यम से समस्त सरकारी काम काज किए जा सकेंगें। राज्य में स्थित शिक्षण संस्थाएं अपनी राजकीय भाषा के माध्यम से ही शिक्षा देंगी। यह निर्णय वर्ष 1949 में ही किया गया था। राज्यों ने अपनी-अपनी राजभाषा नीति जरुर बनाई। परंतु इस निर्णय को उतनी मुस्तैदी से लागू करने का प्रयास नहीं किया जितना कि आवश्यक था। उन्होंने तत्कालीन समस्‍याओं के आगे भाषा के महत्व को नहीं समझा। कालांतर में, राज्यों ने राजभाषा में उचित कार्यकलाप के लिए अपने यहां भाषा विभाग की स्‍थापना की और कार्यालयी भाषा की शिक्षा देनी प्रारंभ की। राज्‍य सरकारों ने अपनी भाषाओं को संवर्धित तो जरुर किया लेकिन उस अनुपात में नहीं जिस अनुपात में करना था। जिस कारण राज्य के भाषाओं की वर्तमान स्थिति राज्य के अंदर वही है जो केंद्र में हिन्दी की वर्तमान स्थिति है या यूँ कहें कि उससे भी बुरी है। अंग्रेजी न चाहते हुए उचित नीयत के अभाव में चलती रही। इस कारण हिन्दी न तो पूरी तरह से राजभाषा बन पाई और न राज्यों के बीच की संपर्क भाषा ही। हालांकि थोड़े-बहुत प्रतीकात्मक बदलाव जरुर नज़र आते है।

हिंदी के प्रश्न को संविधान में अनंत काल तक के लिए टालने का फ़ैसला न तो जनता द्वारा किया गया है और न ही किसी समिति द्वारा सुझाया गया था। आज तक जितनी भी समितियां, आयोग गठित की गई है किसी ने भी हिंदी के प्रश्न को समय सीमा (पंद्रह साल) से परे रखने की सिफ़ारि‍श नहीं की है। राजभाषा आयोग, विश्‍व विद्यालय अनुदान आयोग, केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड, सभी ने हिंदी व क्षेत्रीय भाषाओं में ही शिक्षा-दीक्षा देने की सिफ़ारिश की है। फिर संविधान में हिंदी को अनिश्चित काल के लिए टालने की बात कहां से आई?

यदि हिंदी को वास्तविक रूप में कामकाज की भाषा बनाना है तो देश में राजभाषा कार्यान्वयन को कड़ाई से लागू करना होगा। और यह कार्य केवल एक व्यक्ति या एक खास संगठन का नही बल्कि सभी का है। उच्च शिक्षा में हिन्दी को अपनाने का प्रयास करना होगा। साथ में, पुन: त्रिभाषा नीति के कार्यान्वयन पर जोर देना होगा। त्रिभाषा सूत्र के कार्यान्वयन की कठिनाइयों पर शिक्षा आयोग (1964-66) ने विस्‍तार से विचार किया है। जिसमें आयोग ने कार्यान्वयन की कठिनाइयों का उल्लेख करते हुए कहा था गलत योजना बनाने और आधे दिल से सूत्र को कार्यान्वित करने से स्थिति और बिगड़ गई है। हालांकि वर्तमान मानव संसाधन विकास मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने हिन्दी ज्ञानोत्पादक भाषा बनाने के लिए तथा संपूर्ण देश में अनुपालन की बात कही है। हालांकि मुख्य जरुरत प्रयास जनस्तर पर करने की है।

अंग्रेजी को अनिश्चित काल तक, भारत की सहचरी राजभाषा के रूप में स्‍वीकार किए जाने के कारण यह बात अब और आवश्‍यक हो गई है। ऐसी परिस्थिति में कार्यालयों में हिंदी को प्रचलित करने तथा स्‍टाफ़ सदस्‍यों को सक्षम बनाने के लिए सतत कार्यनिष्‍ठा के साथ शिक्षण प्रशिक्षण का हर संभव प्रयास करना होगा। दोष न राजभाषा नीति में है और न संविधान में बल्कि खोट तो हमारे नीयत में है। आइए हिन्दी के प्रचार-प्रसार के कार्य के लिए राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रबल समर्थक गुरु रविन्द्र नाथ टैगोर की इन पंक्तियों का स्मरण करते हुए कार्य करें-

सांध्‍य रवि बोला कि लेगा काम अब यह कौन,

सुन निरुत्तर छबि लिखित सा रह गया जग मौन,

मृत्तिका दीप बोला तब झुका कर माथ,

शक्ति मुझमें है जहां तक मैं करूंगा नाथ।। 
                                                                             -गुरु रवींद्र नाथ टैगोर

पाठकों से प्रश्न इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और हिंदी के संबंधों पर

                                                             

Sunday, September 19, 2010

एक अपील : राजभाषा हिंदी से संबंधित

मैं ब्लॉगर, साकेत कुमार सहाय, संप्रति हिन्दी विषय में शोधरत हूँ। मेरे शोध प्रबंध का विषय है भारतवर्ष में इलेक्ट्रानिक मीडिया और हिन्दी :1990 के दशक के बाद। मान्यवर मेरा शोध प्रबंध हिन्दी से जुड़ा हुआ है जो कि केवल राजभाषा ही नहीं बल्कि हमारी राष्ट्रभाषा व संपर्क भाषा भी है। हिन्दी सदियों से इस विशाल देश को सांस्कृतिक, राजनैतिक, सामाजिक, भाषायी व धार्मिक रुप से जोड़ती आई है। इसने देशवासियों को राष्ट्रभाषा के अभाव की कमी से मुक्ति प्रदान की है। जिस प्रकार आजादी की लड़ाई में हिन्दी ने संपूर्ण देश के स्वतंत्रता सेनानियों को एक-दूसरे से जोड़ा और आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसी प्रकार आधुनिक राष्ट्र के निर्माण में भी हिन्दी ने देश वासियों को कश्मीर से कन्याकुमारी तक तथा पोरबंदर से लेकर सिल्चर तक जोड़ा है।

मित्रों, हिन्दी को लोकप्रिय बनाने तथा जन-जन तक इसे पहुँचाने में इलेक्ट्रानिक मीडिया की भूमिका से शायद ही किसी को इंकार हो। विशेषकर 1990 के दशक के बाद। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चैनलों ने हिन्दी भाषा व संस्कृति को व्यापक रुप से प्रभावित किया है। इन्ही तथ्यों को दृष्टिगत रखते हुए मैंने इस विषय को चुना। इस महत्ती कार्य में आप सभी के सहयोग एवं सान्निध्य की आवश्यकता है। इसके लिए मैंने एक प्रश्नावली तैयार की है जो कि मेरे ब्लॉग पोस्ट पाठकों से प्रश्न पर उपलब्ध है। जो मुख्यत: शोध प्रबंध पर केंद्रित है। आप सभी से मेरा अनुरोध है कि आप सभी इस महत्वपूर्ण विषय पर अपनी टिप्पणियां अवश्य दें। आप सभी की बहुमूल्य टिप्पणियां न केवल मेरे शोध प्रबंध बल्कि राष्ट्रभाषा के संवर्धन में भी योगदान देंगी। मैं आप सभी के सहयोग हेतु सदैव आभारी रहूँगा।

सादर अभिवादन
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सौमिल का जन्मदिन और केक के बहाने हिंदी की बात-

सौमिल का जन्मदिन और केक के बहाने हिंदी की बात- 🎂 एक केक, एक नाम और एक छोटी-सी जिद… ❤️ कल बड़े बेटे सौमिल का जन्मदिन था। हर बार की तरह इस बा...