हिंदी चाहिए… हिंदी का सम्मान नहीं!
जब बाजार चाहिए—हिंदी याद आती है।
जब वोट चाहिए—हिंदी याद आती है।
जब जनता तक पहुँचना हो—हिंदी याद आती है। जब विज्ञापन बेचना हो—हिंदी याद आती है। लेकिन जब प्रतिष्ठा देने की बात आती है—हिंदी अचानक पिछड़ी हो जाती है!
यही तो हमारी भाषायी विडंबना है।
अंग्रेज़ी के समर्थक हिंदी के करोड़ों लोगों तक पहुँचने के लिए हिंदी का सहारा लेते हैं। हिंदी की ताकत से अपना बाजार बनाते हैं और फिर उसी हिंदी को ज्ञान, रोजगार, प्रशासन और प्रतिष्ठा के प्रश्न पर पीछे खड़ा कर देते हैं। उनके लिए ‘हिंदी का दोहन स्वीकार्य है,
हिंदी का सम्मान असुविधाजनक है!
आजादी के बाद नेताओं ने हिंदी के नाम पर भाषण दिए, हिंदी के नाम पर राजनीति की, अभिनेताओं ने हिंदी के बाजार से प्रसिद्धि पाई, पत्रकारों ने हिंदी के पाठकों से अपना कारोबार खड़ा किया और प्रशासकों ने हिंदी के नाम पर योजनाएँ बनाईं। लेकिन जब हिंदी को वास्तविक अधिकार, अवसर और प्रतिष्ठा देने की बात आई तो बहाने भी आए और विशेषण भी—कभी हिंदी पिछड़ी बताई गई, कभी विभाजनकारी, कभी ‘खिचड़ी’, तो कभी केवल आम आदमी और सेवकों की भाषा!
कमाल यह है कि हिंदी की कमाई सबको चाहिए, लेकिन हिंदी की गरिमा सबको नहीं चाहिए। उत्तर हो या दक्षिण, पूरब हो या पश्चिम—हिंदी के विशाल बाजार से लाभ उठाने में किसी को संकोच नहीं। मगर हिंदी को बराबरी का सम्मान देने की बारी आते ही भाषा का प्रश्न राजनीति, क्षेत्र और पहचान की दीवारों में उलझा दिया जाता है।
यहाँ एक बात स्पष्ट कर देना जरूरी है—
मैं अंग्रेज़ी का विरोधी नहीं हूँ।
मैं किसी भी भारतीय भाषा का विरोधी नहीं हूँ। मैं हिंदी को किसी भाषा के ऊपर बैठाने की माँग भी नहीं कर रहा। मैं केवल इतना पूछ रहा हूँ— जिस हिंदी से आपको बाजार मिलता है, क्या उसी हिंदी को सम्मान नहीं मिलना चाहिए? जिस हिंदी से आप करोड़ों लोगों तक पहुँचते हैं, क्या उसी हिंदी में ज्ञान और प्रशासन नहीं पहुँच सकता?
जिस हिंदी से आप अपना संदेश बेचते हैं, क्या उसी हिंदी में भारत का भविष्य गढ़ने का विश्वास नहीं है? समस्या अंग्रेज़ी नहीं है। समस्या अंग्रेज़ी की गुलामी वाली मानसिकता है। दुनिया की कोई भी विकसित सभ्यता अपनी भाषा को बाजार में बेचकर और व्यवस्था में ठुकराकर महान नहीं बनी। हमें अंग्रेज़ी सीखनी चाहिए—जरूर सीखनी चाहिए। दुनिया से जुड़ना चाहिए—पूरी शक्ति से जुड़ना चाहिए।
लेकिन अपनी भाषाओं को हीन समझकर नहीं। बहुभाषिकता भारत की शक्ति तभी बनेगी, जब भारतीय भाषाएँ एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी नहीं, सहयात्री बनेंगी।
हिंदी को तमिल से लड़ाने की जरूरत नहीं।
हिंदी को तेलुगु से लड़ाने की जरूरत नहीं।
हिंदी को बंगला, मराठी, कन्नड़, मलयालम, असमिया या किसी अन्य भारतीय भाषा के विरुद्ध खड़ा करने की जरूरत नहीं।
भारतीय भाषाओं के बीच संघर्ष नहीं, अंग्रेज़ी-प्रधान मानसिकता से मुक्ति का संवाद चाहिए। और अंत में उन लोगों से एक विनम्र प्रश्न— हिंदी का इस्तेमाल करना बंद मत कीजिए। बस उसका इस्तेमाल करने के बाद उसे भूलिए मत।
क्योंकि हिंदी केवल विज्ञापन का बाजार नहीं है। केवल चुनाव का भाषण नहीं है और केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है।
हिंदी भारत के करोड़ों लोगों की आवाज़ है।
और आवाज़ का इस्तेमाल नहीं किया जाता—आवाज़ का सम्मान किया जाता है।
ईश्वर हमें इतनी सद्बुद्धि दे कि हम अपनी भाषाओं को उपयोग की वस्तु नहीं, राष्ट्र की जीवंत शक्ति समझ सकें।
फिर भी मुझे कोई चिंता नहीं।
जब तक भारत है, जब तक भारत की मिट्टी है,
जब तक इस मिट्टी में लोकजीवन की साँस है—
हिंदी कण-कण में विद्यमान रहेगी।
जय हिंद।
जय हिंदी। 🇮🇳
#साकेत_विचार
डॉ. साकेत सहाय
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