-डॉ साकेत सहाय, भारत सरकार से सम्मानित भाषा-संचार विशेषज्ञ
भारतीय संस्कृति में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, बुद्धि और समृद्धि के देवता के रूप में पूजा जाता है। लेकिन यह कम लोग जानते हैं कि जापान में भी गणेशजी की एक विशेष उपासना परंपरा है, जहाँ उन्हें "कांगितेन" के नाम से जाना जाता है। भगवान गणेश का यह स्वरूप सीधे तौर पर जापानी बौद्ध धर्म, विशेषकर शिंगोन संप्रदाय और एज़ोटेरिक (गूढ़) बौद्ध परंपरा से जुड़ा हुआ है। भारत और जापान के बीच सांस्कृतिक संबंधों का यह एक रोचक पक्ष है कि भगवान गणेश की उपासना का एक रूप जापान में भी प्रचलित है। जापान में गणेश को प्रायः कांगितेन या शोतें के नाम से जाना जाता है। यह स्वरूप वज्रयान बौद्ध धर्म के माध्यम से भारत से चीन और फिर जापान पहुँचा। गणेश पूजा का जापान में प्रवेश मुख्यतः चीन के माध्यम से बौद्ध धर्म के प्रसार के दौरान हुआ। संस्कृत में "विनायक" और "गणपति" के रूप में पूजे जाने वाले देवता का परिचय बौद्ध साधकों ने जापानियों को कराया। जापान में यह रूप कांगितेन के रूप में विकसित हुआ, जिसमें स्थानीय संस्कृति और बौद्ध तांत्रिक साधनाओं का प्रभाव दिखाई देता है।
कांगितेन का अर्थ है “आनंद प्रदान करने वाला देवता”। जापानी परंपरा में कांगितेन को प्रायः आलिंगनबद्ध स्त्री-पुरुष युगल के रूप में दर्शाया जाता है, जो भारतीय गणेश की पारंपरिक प्रतिमा से भिन्न है। भारत की तरह जापान में भी उन्हें समृद्धि, व्यापार, सौभाग्य, बाधाओं के निवारण और सफलता के देवता माना जाता है। जापान के अनेक बौद्ध मंदिरों में कांगितेन की पूजा होती है, किंतु उनकी प्रतिमाएँ अक्सर आम लोगों के दर्शन के लिए प्रदर्शित नहीं की जातीं; उन्हें गोपनीय देवता माना जाता है। जापान में व्यापारी और उद्यमी विशेष रूप से कांगितेन की आराधना करते हैं। कांगितेन के कई रूप हैं, लेकिन सबसे लोकप्रिय रूप "शोताकिकांगितेन" है, जिसमें दो शरीर (पुरुष और स्त्री) गले मिलते हुए दर्शाए जाते हैं। आलिंगन का यह स्वरूप संपूर्णता, संतुलन, करुणा और आनंद का प्रतीक माना जाता है। हाथी का सिर और मानव शरीर, जो गणेशजी के मूल स्वरूप से जुड़ी पहचान है, यहाँ भी विद्यमान है। सनातन परंपरा की तरह जापान में भी कांगितेन को सौभाग्य, व्यापार में सफलता और पारिवारिक सुख-शांति के देवता के रूप में पूजा जाता है। इन्हें "आनंद प्रदान करने वाले देव" (देवता ऑफ़ ब्लिस) भी कहा जाता है। जापानी व्यापारी और साधक अक्सर विशेष मंदिरों में गुप्त विधियों से कांगितेन की उपासना करते हैं, क्योंकि इसे अत्यंत पवित्र और निजी पूजा माना जाता है।
जापान में उनसे जुड़े कई प्रसिद्ध मंदिर है – टोक्यो का मात्सुचियामा शोतें, जापान के सबसे प्रसिद्ध कांगितेन मंदिरों में से एक, जहाँ भक्त व्यापारिक सफलता और पारिवारिक सुख के लिए प्रार्थना करते हैं। साथ ही, इकुतेरु शोतें, ओसाका मंदिर व्यापारियों के बीच विशेष रूप से लोकप्रिय है। हालांकि, सांस्कृतिक अनुकूलन के फलस्वरूप कुछ बदलाव भी हुए हैं जो संस्कृति और परंपरा के समन्वयन के साथ स्वाभाविक ही है। यथास्वरूप, भारत में गणेशजी की खुली, सार्वजनिक पूजा होती है, लेकिन जापान में कांगितेन की पूजा अक्सर गुप्त विधियों से की जाती है। गणेश की मूर्तियाँ और चित्र जापान में प्रायः आम जनता के सामने नहीं रखे जाते, बल्कि मंदिर के आंतरिक गर्भगृह में ही पूजे जाते हैं। यह गूढ़ता, जापानी बौद्ध धर्म के तांत्रिक पक्ष से मेल खाती है। जबकि भारत में भगवान गणेश की पूजा दोनों रूपों में प्रचलित है। भारत में गणेशोत्स्व एक सार्वजनिक उत्सव है।
जापान में भागवान गणेश का यह धार्मिक-सांस्कृतिक स्वरूप भारत और जापान के प्राचीन सांस्कृतिक एवं धार्मिक आदान-प्रदान का सशक्त प्रमाण है। कांगितेन का स्वरूप इस बात का भी अद्भुत उदाहरण है कि कैसे एक ही देवता, समय और सांस्कृतिक संदर्भ के साथ नए रूपों और परंपराओं में ढल सकते हैं। विघ्नहर्ता गणेश जब जापान पहुँचे, तो उन्होंने वहां के धार्मिक और सांस्कृतिक परिवेश में एक नया, फिर भी मूल भाव को सुरक्षित रखने वाला रूप पाया। भगवान गणेश की अवधारणा ने जापान में स्थानीय परंपराओं के साथ समन्वय करते हुए जापानी संस्कृति में एक विशिष्ट रूप धारण किया, जबकि उनका मूल स्वरूप—विघ्नों का नाश करने वाले और मंगल के अधिष्ठाता देव—आज भी बना हुआ है। यह भारत-जापान के सांस्कृतिक संबंधों की गहराई और आध्यात्मिक आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण प्रमाण है।
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