Sunday, November 20, 2016

नोटबंदी

नोटबंदी : काला धन निवारण व नकदी रह्ति अर्थव्यवस्था
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने बीते 8 नवंबर को राष्ट्र के नाम अपने पहले टेलीविजन संबोधन के माध्यम से भ्रष्टाचार, आतंकवाद, कालाधन, जाली नोटों के गोरखधंधे के विरूद्ध निर्णायक लड़ाई की घोषणा की।  अर्थात् बीते मंगलवार की आधी रात से 500 और 1000 रुपये का नोट कानूनी नहीं रह जाएंगे तथा एक प्रकार से जाली हो जाएंगे। तकनीकि शब्दों में अब ये वैध मुद्रा नहीं रह जाएंगे।  सरकार के मुताबिक अब 500 और 1000 के नोट अमान्य हो जाएंगे।  अन्य सभी मुद्राएं मान्य बनी रहेंगी।  मंगलवार रात मध्यरात्रि से 500 रुपये और 1000 रुपये के नोटों के प्रचलन को समाप्त करने का प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का निर्णय बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक है।
सरकार के इस फैसले से महज 4 घंटे में ही देश की 87% यानी 15 लाख करोड़ रुपए की करेंसी अर्थव्यवथा से बाहर हो गई।  साथ ही विशेष फीचर वाले 2000 रुपए का नोट लाने का फैसला भी पहली बार किया गया है। हालांकि उच्च मूल्य वर्ग के नोटों को अचानक बंद करने का यह कोई पहला फैसला नहीं है। इससे पहले भी वर्ष 1946 और 1978 में ऐसे फैसले किए गए थे। अब तक सबसे ज्यादा मूल्य के 10 हजार रुपए का नोट पहले 1938 में, फिर 1954 में छापा गया था। लेकिन इस नोट को जनवरी 1946 और फिर दोबारा लगभग 38 साल पहले, जनवरी 1978 में बंद कर दिया गया था। आंकड़ों के मुताबिक, देश में अभी 500 रुपए के 1650 करोड़ के नोट चलन में हैं। यानी 8.25 लाख करोड़ रुपए। इसी तरह 1000 रुपए के 670 करोड़ नोट चलन में हैं। यानी 6.70 लाख करोड़ रुपए। कुल मिलाकर देश की अर्थव्यवस्था से कुल 15 लाख करोड़ की करेंसी बाहर हो गई।  इन दोनों तरह के नोटों की देश में चल रही करेंसी में कुल हिस्सेदारी 87% है। यानि सरकार के इस निर्णय से अगले कुछ दिन भारतीय अर्थव्यवस्था 13% करेंसी से ही चलेगी।
इस महत्वपूर्ण निर्णय से आम जनता को कुछ समस्याओं का भी सामना करना पड़ रहा है।  जिसे जनता के नाम अपने संबोधन के जरिए प्रधानमंत्री ने बताया भी।  प्रधानमंत्री श्री मोदी के अनुसार ‘’ इस निर्णय से कुछ दिनों की कठिनाई आएगी, मगर कालाधन, भ्रष्टाचार और आतंक से लड़ने के लिए लोग इतना सहन कर सकेंगे।  सभी राजनीतिक दल, मीडिया, समाज के सभी वर्ग इस महान कार्य में सरकार से भी ज्यादा बढ़-चढ़ कर भाग लेंगे और सकारात्मक भूमिका अदा करेंगे।‘’
सरकार ने इस ऐतिहासिक निर्णय के सफलतापूर्वक क्रियान्वयन हेतु नागरिकों से धैर्य बनाए रखने का अनुरोध किया गया है तथा इस हेतु 50 दिन का समय दिया गया है।  इस अवधि के दौरान यानि 10 नवंबर से लेकर 3 दिसंबर तक बैंकों एवं डाकघरों में आसानी से आप 500 और 1000 के नोट बैंक मे जमा कर उसके बदले में दूसरे नोट ले सकते हैं। कुछ कारणों से जो लोग 1000 रुपये और 500 रुपये के नोट 30 दिसंबर तक जमा नहीं करा सकेंगे, वे लोग पहचान पत्र दिखाकर 31 मार्च 2017 तक नोट बदलवा सकेंगे। 
सरकार के मुताबिक 500 रुपये और 1000 रुपये वाले नोट का हिस्सा 80 से 90 प्रतिशत तक पहुंच गया है। देश में नकदी के अधिकतम सर्कुलेशन का सीधा संबंध भ्रष्टाचार से है। भ्रष्टाचार से अर्जित नगदी के कारण महंगाई पर असर पड़ता है। जिसके कारण गरीब और मध्यम वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं और मूल्य में इस वजह से कृत्रिम वृद्धि भी होती है।  भ्रष्टाचार से अर्जित धन या कालाधन से बेनामी हवाला धन को भी बढ़ावा मिलता है। यह भी तथ्य है कि हवाला धन का इस्तेमाल आतंकी हथियारों की खरीद के लिए करते हैं, इसके साथ ही हवाला धन का चुनाव में भी इस्तेमाल पाया गया है। ऐसे में देश और समाज को दीमक की तरह से खोखला कर रहे भ्रष्टाचार से निपटने में यह कदम सहायक होगा।
वित्तीय सेवा कंपनी मॉर्गन स्टेनले की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में ऊंचे मूल्य के नोट के चलन पर पाबंदी से दीर्घकाल में देश में वित्तीय बचतों को बढ़ावा मिलेगा क्योंकि लोग सोना और अचल संपत्ति में निवेश कम करेंगे। देश की आर्थिक गतिविधियों पर थोड़े समय तक बुरा असर हो सकता है लेकिन इसके फायदे कहीं अधिक होंगे तथा मध्यम अवधि में पारदर्शिता और नियमानुकूल आचरण सुधरेगा।
विगत कुछ वर्षों से हमारा देश अनेक आर्थिक, राजनैतिक एवं सामाजिक समस्याओं से गुजर रहा है, क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था के समानांतर एक और अर्थव्यवस्था खड़ी हो गई हैयह व्यवस्था काले धन की है। जिसका उपयोग मादक पदार्थों के अवैध व्यापार और आतंकवाद जैसी ध्वंसकारी गतिविधियों में किया जा रहा है।  जिससे कि देश की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को घातक नुकसान हो रहा है।  काले धन की अर्थव्यवथा सरकार की आय में रूकावट पैदा करती है तथा देश के सीमित वित्तीय साधनों को अवांछित दिशाओं की ओर मोड़ती है। 
काले धन या समानांतर अर्थव्यवस्था की समस्या; सामान्य समस्याओं से अलग प्रकार की समस्या है क्योंकि जब हम सामान्य आर्थिक समस्याओं, यथा गरीबी, मुद्रास्फीति या बेरोजगारी के संबंध में विचार करते हैं तब हमारा ध्यान गरीब, निर्धन एवं बेरोजगार लोगों के समूह पर स्वत: केंद्रित हो जाता है।  परंतु, जब काले धन या समानांतर अर्थव्यवस्था पर दृष्टिपात करते हैं तब एक नकारात्मक विशेषता दृष्टिगत होती है, क्योंकि इसमें वह व्यक्ति या व्यक्ति समूह प्रभावित नहीं होता, जो इस काले धन को रखता है बल्कि इससे वे व्यक्ति प्रभावित होते हैं, जो इससे वंचित रह गए हैं और साथ-ही-साथ इस देश की सरकार भी।  यही तथ्य काले धन की समस्या को ध्वंसकारी साबित करती है।  
आमतौर पर काले धनका प्रयोग बिना हिसाब-किताबवाले या छिपाई हुई आय अथवा अप्रकट धन या उस धन के लिए किया जाता है, जो पूर्णतया अथवा अंशतया प्रतिबंधित सौदों में लगा हुआ है। काला धन काली आय अथवा काली संपदा के रूप में भी हो सकता है। काली आय से तात्पर्य उन समस्त अवैध प्राप्तियों और लाभों से है जो करों की चोरी, गुप्त कोषों तथा अवैध कार्यो के करने से एक वर्ष में प्राप्त हुई हों।
इसी प्रकार काली संपदा से तात्पर्य वह काली आय, जो वर्तमान में खर्च की जाती है और बचा ली जाती है या विनियोजित कर दी जाती है अर्थात् अपनी काली आय को व्यक्ति सोना-चाँदी, हीरे-जवाहरातों, बहुमूल्य पत्थरों, भूमि, मकान, व्यापारिक परिसंपत्तियों आदि के रूप में रखता है। इस काले धन को आयकर-अधिकारियों या सरकार की करारोपण दृष्टि से बचाकर रखने में उपर्युक्त प्रक्रिया प्रयोग में लाई जाती है।
इस प्रकार, ‘काले धनशब्द से आशय केवल उस धन से नहीं होता, जो कानूनी धाराओं, यहाँ तक कि सामाजिक ईमानदारी का उल्लंघन करके कमाया गया हो अपितु काले धन में वह धन भी सम्मिलित किया जाता है, जो छुपाकर रखा गया हो और जिसका कोई हिसाब-किताब न हो ।
काले धन के अंतर्गत अवैध साधनों के प्रयोग द्वारा काले धन की प्राप्ति, यथा-तस्करी, फ्लैटों और दुकानों के आवंटन में ली जानेवाली पगड़ी की राशि, माल के कोटों तथा लाइसेंसों को गैर-कानूनी रूप में बेचना, गुप्त कमीशन या घूसखोरी, विदेशी विनिमय की चोरी से प्राप्त धन तथा सरकारी नियंत्रण में बिक्री की कुछ वस्तुओं को काले बाजार में बेचने से अर्जित धन, आदि तथा इसी प्रकार अर्जन का स्रोत न्यायपूर्ण तथा वैध होते हुए भी आय पर कर अदा न करने से भी काले धन की उत्पत्ति होती है।
विगत कुछ वर्षो से प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष, दोनों प्रकार के करों के संबंध में चोरी की प्रवृत्ति बढ़ रही है जिससे काला धन बढ़ता ही जा रहा है। हालांकि वर्तमान या पिछली सरकारों द्वारा इस पर कई प्रतिबंध लगाए गए है।  वर्तमान सरकार द्वारा काला धन निकालने हेतु कई उपाय किए गए है। 
1. काले धनधारियों से यह अपेक्षा करना कि वे स्वत: तथा स्वेच्छापूर्वक अपने काले धन को प्रकट कर दें।  आईडीएस जैसी योजनायें इसी कड़ी में है। 
2. सरकार करदाताओं के साथ समझौता की अपेक्षा करना कि जिसमें यह आश्वास्ति हो कि समझौते न्यायपूर्ण, शीघ्र तथा स्वतंत्र रूप में होंगे। 
3. सरकार द्वारा दीर्घकालीन बॉण्ड जारी किया जाना।    
4. सरकार द्वारा विमुद्रीकरण योजना के अंतर्गत ही अर्थव्यवस्था में अधिक मूल्य के करेंसी नोटों को रद्‌द किया गया है क्योंकि काला धन आमतौर पर इन्हीं नोटों के माध्यम से संचालित होता है।
अन्य उपाय जो किए गए है, कर की अधिकतम सीमांत दर में कमी, तस्करी की रोकथाम, रोकथाम एवं गुप्तचर शाखा को सुदृढ़ बनाना, विदेशी विनिमय अधिनियम के प्रावधानों को कड़ाई से लागू करना, आर्थिक और कानूनी उपाय तथा पड़ोसी राष्ट्रों से द्विपक्षीय समझौते इत्यादि शामिल है।  यदि इन उपायों को सतर्कता, ईमानदारी तथा वैज्ञानिक ढंग से लागू किया जाए तो परिणाम उत्साहवर्धक होंगे।
पांच सौ और एक हजार रुपये के नोटों का प्रचलन बंद करने के मोदी सरकार के अप्रत्याशित फैसले ने देश के हर अमीर-गरीब व्यक्ति पर असर डाला है। यह असर सरकार के फैसले को लेकर प्रतिक्रिया के रूप में भी है और परेशानी-संतुष्टि के रूप में भी। इसमें दो राय नहीं कि सरकार का फैसला साहसिक है, लेकिन जिस तरह आम लोगों को परेशानी हो रही है उससे यह भी स्पष्ट है कि सरकार के नीति-नियंताओं ने पूरी तैयारी नहीं की अथवा वे यह अनुमान नहीं लगा सके कि इस फैसले का तात्कालिक असर क्या होगा? अगर इस बड़े फैसले को लागू करने के पहले उसके असर का आकलन करके उपयुक्त जमीन तैयार कर ली गई होती तो आज जो आपाधापी मची है और खुदरा कारोबार के साथ बड़े कारोबार भी ठहरते हुए दिख रहे हैं और इस सबके चलते फौरी तौर पर ही सही, अर्थव्यवस्था की गति बाधित होने का अंदेशा उभर आया है उससे बचा जा सकता था। इसी के साथ विरोधी दलों की अनावश्यक चीख-पुकार से भी बचा जा सकता था। नोटबंदी के फैसले के बाद सरकार यह भी कह रही है कि वह कैशलेस सोसायटी बनाना चाहती है, लेकिन उसे पता होना चाहिए था कि यह काम रातोंरात नहीं हो सकता और वह भी ऐसे देश में और भी नहीं जहां बड़े पैमाने पर नकद लेन-देन होता है। आखिर यह एक तथ्य है क्रेडिट-डेबिट कार्ड का इस्तेमाल और मोबाइल ट्रांजैक्शन तो अभी प्रारंभिक अवस्था में ही है।
जहां तक नोटबंदी के फैसले की बात है, प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी का यह फैसला साहसिक है और उस पर हैरानी इसलिए नहीं, क्योंकि गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में वह ऐसे फैसले लेते रहे हैं। काले धन के कारोबार की कमर तोड़ने के लिए बड़े नोट बंद करने का फैसला गोपनीयता की मांग करता था और वह पूरा होना मोदी सरकार की सक्षम कार्यशैली का प्रमाण है। यह फैसला असरकारी साबित हुआ तो इसीलिए कि वह अप्रत्याशित तौर पर सामने आया। बीते मंगलवार की रात आठ बजे प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संबोधन के पहले किसी को ऐसे फैसले की भनक नहीं थी। उनका संबोधन समाप्त होते-होते साढ़े आठ बजे चुके थे और तब तक अधिकांश बाजार बंद हो चुके थे और दो नंबर का धन रखने वालों को उसे अन्यत्र खपाने का अवसर नहीं मिला। प्रधानमंत्री ने इस फैसले के दो कारण बताए। एक, सीमा पार से नकली नोटों का फैलाव और दूसरा, देश की अर्थव्यवस्था में कालेधन की भूमिका बढ़ जाना। इस फैसले से नकली नोट तो रद्दी के ढेर में तब्दील ही हुए, अवैध तरीके से अर्जित और बिना हिसाब-किताब वाला काला धन भी एक झटके से चलन से बाहर हो गया। चूंकि देश में एक बड़ी संख्या में कारोबारी दो नंबर के पैसे के जरिये कारोबार करने के आदी हैं इसलिए अभी तो वे सदमे में हैं, लेकिन यह अंदेशा है कि कुछ समय बाद वे नए नोटों के जरिये फिर से काला धन जमा करने में सफल हो सकते हैं।
यह ठीक है कि सरकार की ओर से यह कहा गया है कि संदिग्ध नकद लेन-देन पर अंकुश लगाने के लिए कुछ और फैसले किए जाएंगे, लेकिन यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि अभी तक इस दिशा में जो एकाध कदम उठाए जा चुके हैं वे कारगर साबित होने शेष हैं। सरकार इससे भी अच्छी तरह परिचित है कि राजनीति में काले धन की एक बड़ी भूमिका है। अभी राजनीति में काले धन के प्रवेश और प्रवाह को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं और इस संदर्भ में चुनाव आयोग की ओर से जो पहल हुई उसकी अनदेखी ही अधिक हुई है। अभी राजनीतिक दलों के चंदे के लेन-देन को भी पूरी तरह पारदर्शी नहीं बनाया गया है। क्या यह अच्छा नहीं होता कि नोटबंदी के फैसले के पहले राजनीति में काले धन के इस्तेमाल को रोकने का फैसला कर लिया जाता? कम से कम अब तो ऐसे कदम उठाए ही जाने चाहिए जिससे काला धन राजनीति के संचालन में सहायक न हो सके। राजनीतिक दल काले धन को खपाने में इसीलिए सक्षम हैं, क्योंकि उन्हें 20 हजार से कम राशि के चंदे का हिसाब नहीं देना पड़ता। अच्छा हो कि यह मांग खुद भाजपा की ओर से उठे कि राजनीति में काले धन की भूमिका समाप्त करने की ठोस पहल हो। इससे ही नोट बंदी के मोदी सरकार के साहसिक फैसले की महत्ता बढ़ेगी।
चूंकि बड़े नोटों पर पाबंदी के फैसले के लिए पूरी तैयारी का अभाव दिखा इसलिए अब अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में फौरी और कई क्षेत्रों में दीर्घकालिक असर पड़ने का अंदेशा है। यदि नकदी का संकट लंबा खिंचा तो अर्थव्यवस्था में कुछ नकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। ऐसा न होने पाए, इसके लिए सरकार को सचेत रहना होगा। नोटबंदी का साहसिक फैसला काले धन के कारोबार की कमर तोड़ने वाला है तो कई क्षेत्रों में तत्काल प्रभाव से सकारात्मक असर डालने वाला भी है जैसे कि रियल इस्टेट। यह सबके हित में है कि इस क्षेत्र की स्थिति सुधरे, क्योंकि यह रोजगार उपलब्ध कराने वाला एक प्रमुख क्षेत्र है। जहां नोटबंदी के सकारात्मक प्रभाव स्पष्ट हैं वहीं नकारात्मक प्रभावों के बारे में अभी अस्पष्टता है। सरकार की कोशिश होनी चाहिए नकारात्मक प्रभाव उभरे ही नहीं।
अब जब आम जनता काले धन के खिलाफ सरकार की सख्ती का कष्ट सहकर भी सहयोग कर रही है तब उसकी जिम्मेदारी बनती है कि वह काले धन के खिलाफ अपनी मुहिम को अंजाम तक पहुंचाए और कैशलेश सोसायटी का निर्माण करने में अपने स्तर पर आवश्यक फैसले करने में और देर न करे। केंद्र सरकार को उम्मीद है कि नोटबंदी के फैसले से ऐसा माहौल बनेगा कि लोग नकदी का प्रयोग कम कर देंगे। अच्छा होता कि इसके लिए पहले ही कुछ जरूरी कदम उठा लिए जाते। एक कदम तो बैंकिंग सेवाओं को सुदढ़ करने का होना चाहिए था, क्योंकि देश का एक बड़ा इलाका बैंकिंग सेवाओं के मामले में पिछड़ा हुआ है। इसका प्रमाण नोटबंदी के फैसले के बाद मची अफरातफरी से भी मिलता है। बैंकिंग सेवाओं को बेहतर बनाने के साथ सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए थी जिससे असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को भी उनकी मजदूरी बैंक खातों के जरिये मिलती। हर स्तर पर उद्यमियों-व्यापारियों की ओर से नकद लेन-देन के चलन को हतोत्साहित करने की भी जरूरत थी। अगर यह काम कर लिया गया होता तो नोटबंदी के फैसले से श्रमिकों को कहीं कम परेशानी होती और कारोबार की रफ्तार भी सुस्त नहीं पड़ती। अभी तो छोटे दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों को भी अपना धंधा जारी रखना मुश्किल हो रहा है। यदि हर तरह के कारोबारियों और यहां तक कि छोटी-छोटी दुकानों, रेस्त्रां और धन का लेन-देन करने वाले समस्त सरकारी-गैर सरकारी विभागों आदि में कैशलेस तंत्र विकसित करने का प्रभावी अभियान चला होता तो आज हालात दूसरे दिखते और पर्याप्त नकदी के अभाव में सब कुछ ठप होता नहीं दिखता। सरकार को पता होना चाहिए था कि केवल इतना ही पर्याप्त नहीं कि करीब-करीब हर किसी का बैंक खाता हो। इसी के साथ यह भी जरूरी था कि अधिक से अधिक लोग ऐसी स्थिति में होते कि उन्हें नकदी का न्यूनतम प्रयोग करना पड़ता। उम्मीद है कि सरकार ने जरूरी सबक सीख लिए होंगे और अब उसकी ओर से काले धन के कारोबार को फिर से न पनपने देने के लिए हर संभव कदम उठाने के साथ ही कैशलेस सोसायटी का निर्माण करने वाले उपाय भी किए जाएंगे। इससे ही नोटबंदी का फैसला देश की तस्वीर बदलने वाला साबित होगा।
हम सभी इस तथ्य से परिचित है कि विकसित अर्थव्यवस्था की पहली पहचान है नकदी विहीन अर्थव्यवस्था, क्योंकि यह काले धन के प्रवाह को रोकता है।  देश की कर व्यवस्था को मजबूती प्रदान करता है। जैसे-जैसे भारतीय अर्थव्यवस्था भी विकासशील से विकसित होने की ओर अग्रसर हो रही है यहां नकदी विहीन अर्थव्यवस्था पर जोर दिया जा रहा है।  भुगतान व्यवस्था को एकीकृत करने पर जोर दिया जा रहा है।  भारतीय अर्थव्यवस्था में भी प्लास्टिक मुद्रा यानि डेबिट /क्रेडिट कार्ड के प्रयोग पर जोर दिया जा रहा है।  आज का युवा वर्ग प्लास्टिक मनी के इस्तेमाल में अधिक सुविधा का अनुभव करता है।  सच भी है कि नकद के बजाय कार्ड द्वारा लेन देन अधिक सुगम है।  इसी का नतीजा है कि आज सभी बैंक ग्राहकों को डेबिट कार्ड और क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल पर जोर दे रहे है।  नकदी के बिना किए जाने वाले लेन देन के लिए भी इन कार्डों का उपयोग लगातार बढ़ता जा रहा है। इन सभी का सार यही है कि इलेक्ट्रॉनिक /प्लास्टिक मुद्रा वास्तविक मुद्रा का एक मजबूत विकल्प बनते जा रहे हैं।  जहां कार्ड लेन देन  का एक सुविधाजनक माध्यम बन चुका है वही बढ़ रही हैं इनसे संबंधित समस्याएं।  इन कार्डों के बढ़ते प्रयोग के साथ-साथ इससे जुड़े जोखिम भी बढ़ते जा रहे है।  इन जोखिमों में शामिल है - क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड के प्रयोग से संबंधित धोखाधड़ी।
देश में 1000 और 500 रूपए के नोट बंद होने पर हर तरफ मचे हड़कंप से निपटने में प्लास्टिक मुद्रा एक बेहतर विकल्प साबित हो रहा है।  सरकार भी भ्रष्टाचार, कालाधन और जमाखोरी जैसी समस्याओं से छुटकारा पाने हेतु इस विकल्प भी ज्यादा जोर दे रही है।  लेकिन इस काम में कई बड़ी चुनौतियां है।  बड़े शहरों में तो प्लास्टिक मुद्रा का चलन है लेकिन छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में लोग अभी भी इसके इस्तेमाल से कतराते हैं।  सरकार ने बैंकिंग से जुड़ी कई महत्वाकांक्षी योजनाओं की शुरूआत की है, जिससे आम जनता को बैंकिंग की मुख्यधारा से जोड़ा जा सके।  इसके बावजूद भारत में प्लास्टिक मुद्रा को जन-जन तक पहुंचाने के लिए अभी कई बड़ी चुनौतियां है।  साइबर क्षेत्र के विशेषज्ञों की मुताबिक प्लास्टिक मुद्रा हो या फिर डिजिटल लॉकर। इन सभी में सूचना की सुरक्षा सबसे पहले जरूरी है। 
नोटबंदी का एक और और बड़ा फायदा देश को नकदी रहित अर्थव्यवस्था बनाने में सहायक हो सकता है।  आंकड़ों के मुताबिक, देश में 500 और 1000 रूपये के पुराने नोट बंद होने के बाद पिछले तीन दिन में देश में नकदीरहित भुगतान(ई-भुगतान) औसतन तीन गुना बढ़ा है।  हालाकि पहले दिन इसमें दो हजार फीसदी तक की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। पेटीएम, फ्रीचार्ज, और ओला मनी के साथ बैंकों के ई-वॉलेट में इस मौके को भुनाने की होड़ लग गई है।  नोटबंदी के बाद इन ऐपों को डाउनलोड करने में तीन गुना बढ़ोत्तरी हुई है।  अखबारों के मुताबिक, ई-वॉलेट कंपनी मोबीक्विक के मुताबिक उसके एप में राशि डालने की रफ्तार दो हजार फीसदी तक बढ़ी है।  जबकि एप डाउनलोड इस अवधि में 40 फीसदी बढ़ा है और इसका उपयोग 200 फीसदी तक बढ़ा है।  पेटीएम के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी विजय शेखर शर्मा का कहना है कि पहली बार मोबाइल वॉलेट आम आदमी के हाथ में पहुंचा हैं। 
दुकानों और खुदरा आउटलेट्स के पॉइंट ऑफ सेल (पीओएस) टर्मिनलों पर रूपे कार्ड के इस्तेमाल में भी दोगुना तेजी आई है।  नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) के मुताबिक 9 और 10 नवंबर को पीओएस या ई-कॉमर्स के लिए आठ लाख लेनदेन में रूपे का इस्तेमाल किया गया।  जबकि पूर्व में इसका दैनिक औसत चार लाख रहता था।
नोटबंदी देश में मोबाइल ट्रांजेक्शन को भी बढ़ावा दे रही है। देश में मोबाइल भुगतान की संख्या पिछले वित्त वर्ष के तीन अरब से बढ़कर वर्ष 2022 तक 90 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ते हुए 153 अरब पर पहुंच जाएगी।  उद्योग संगठन एसोचैम ने आरएनसीओएस के साथ मिलकर किए गए अध्ययन में कहा कि इस दौरान मोबाइल भुगतान में कीमत के आधार पर भी सालाना 150 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होगी।
नोटबंदी से उपजे नकद संकट से निपटने के लिए सरकार ने देश भर में बड़े पैमाने पर माइक्रो एटीएम लगाने का फैसला किया है।  कार्ड स्वाइप मशीन के आकार के माइक्रो-एटीएम प्रत्येक बैंक के ग्राहकों को बिना किसी शुल्क के पैसे निकालने और जमा करने की सुविधा देते हैं।  माइक्रो एटीएम जीपीआरएस नेटवर्क के जरिए बैंकों के केंद्रीय कंप्यूटर से जुड़े होते हैं।  अलग-अलग बैंकों के माइक्रो एटीएम अलग-अलग माध्यमों से पैसे निकालने और जमा करने की सुविधा देते हैं।  इसका सबसे बड़ा फायदा दूर-दराज के इलाके और पहाड़ी क्षेत्र जहां एटीएम नहीं पहुंच सके हैं, वहां नकद निकासी की सुविधा देने में मददगार है।  माइक्रो-एटीएम कभी भी, कहीं भी स्थापित किए जा सकते हैं।  लेकिन माइक्रो एटीएम से चौबीसों घंटे नकद निकासी संभव नहीं, पैसे निकालने – जमा करने के लिए बैंक कर्मी या दुकानदार का होना जरूरी है।  साथ ही चोरी या लूटपाट के डर से माइक्रो –एटीएम रखने में आनाकानी करते है।         
काला धन मुख्यत: विलासिता तथा फिजूलखर्ची में व्यय होता है, जो कि अनुत्पादक कार्य है।   यह व्यय प्रथम तो देश की बचत को कम करता है; दूसरे, देश के उत्पादन पर भी यह प्रतिकूल प्रभाव डालता है।  ऐसे में यह कदम बेहद स्वागत योग्य है।  फिर भी, सरकार को कर देयता प्रणाली को अधिक चुस्त तथा निपुण बनाना होगा।  इस दिशा में जीएसटी लागू किया जाना एक अच्छा प्रयास है।  साथ ही, आर्थिक नियंत्रण, परमिट, कोटा, लाइसेंस आदि को सीमित तथा जरूरी होने पर ही लागू करना तथा चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा प्राप्त किए जाने वाले चंदे पर रोक लगाना भी एक प्रमुख उपाय है।  इसके अतिरिक्त, प्रशासनिक कार्यक्षमता में वृद्धि करना तथा सभी कर-विभागों में उचित समन्वय होना भी जरूरी है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, देश में 500 और 1000 रुपए के नोट बंद करने के सरकारी फैसले से देश के अलग-अलग वर्ग को तमाम चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। जिससे सबसे ज्यादा नुकसान आम आदमी को उठाना पड़ सकता है।  आम आदमी को सबसे ज्यादा दिक्कत खुदरा खरीद में होगी। ऐसे इलाकों में, जहां आज भी लोग बैंकिंग सुविधा से वंचित है वहां लोगों को ज्यादा दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। छोटे कस्बे और गांवो में रहने वाले ऐसे लोग जिन्होने शादी जैसे बड़े काम के लिए घर में पैसा रखा था उनके समक्ष भी समस्याएं खड़ी हो सकती हैं। न तो इस पैसे से वे खरीदारी कर सकते हैं और न ही आसानी से बैंकों में इसको जमा कर सकते हैं। गौरतलब है कि भारत की करीब 60 फीसदी जनता बैकिंग सुविधाओं से वंचित भी है।
भारी नकदी वाले व्यवसायियों को भी नई करेंसी के बाजार में आने तक दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा।  सबसे ज्यादा दिक्कत रोजाना बड़ी मात्रा में नकदी का लेनदेन करने वाले व्यवसायियों के सामने यह चुनौतीपूर्ण होगा।
इसके अतिरिक्त, दुनियाभर के कई देशों में अब भारतीय करेंसी स्वीकार की जाती है। उदाहरण के तौर पर, यदि आप नेपाल में जाकर भारतीय करेंसी में खरीदारी करते हैं तो आसानी से दुकानदार आपकी करेंसी को स्वीकार करते हैं। इस फैसले के बाद ऐसी करेंसी को सिस्टम में वापस लाना एक बड़ी चुनौती हो सकती है।
जाली करेंसी और कालेधन पर लगाम लगाने हेतु सरकार द्वारा उठाए गए इस कदम से आने वाले दिनों में आम जनता, व्यापारी और को बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही सरकार के लिए भी इन चुनौतियों से निपटना आसान नहीं होगा।  फिर भी देशहित में इन सभी समस्याओं का सामना करना ही होगा। 
वास्तव में, भारत में काला धन खूब फल-फूल रहा है। बड़े लोगों के विरुद्ध जैसी कार्रवाई होनी चाहिए नहीं हो पाती। इसका मूल कारण हमारे नैतिक स्तर और सामाजिक मूल्यों में आई गिरावट है। अत: नैतिकता का प्रशिक्षण और व्यवहार प्रत्येक स्तर पर अपेक्षित है।  इस दृष्टि में सरकार का यह कदम ऐतिहासिक है।  प्रधानमंत्री श्री मोदी ने इसे शुद्धिकरण का नाम दिया है।  निश्चय ही सरकार का यह कदम भ्रष्ट राजनैतिक, सामाजिक और प्रशासनिक जीवन में निर्णायक साबित होगा।

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