Sunday, July 24, 2016

विश्व के आंगन में हिन्दी: शिक्षा का प्रश्न

विश्व के आंगन में हिन्दी: शिक्षा का प्रश्न: शिक्षा का प्रश्न स्वाधीनता संग्राम के दौरान हमारे नेताओं ने देश की शिक्षा नीति के संबंध में जो सपना देखा था।  उससे जुड़ा हुआ प्रमुख ...

शिक्षा का प्रश्न

शिक्षा का प्रश्न
स्वाधीनता संग्राम के दौरान हमारे नेताओं ने देश की शिक्षा नीति के संबंध में जो सपना देखा था।  उससे जुड़ा हुआ प्रमुख तथ्य है भारतीय भाषाओं में शिक्षा।  जिसे काफी समय से उठाया भी जाता रहा है।   लेकिन अब तक किसी ने उसे जमीन पर उतारने की कोशिश भी नही की।  थोड़ा-बहुत प्रयास हुए भी तो प्रारंभिक व माध्यमिक स्तर तक। 
वस्तुत: यह सपना मैकाले की शिक्षा नीति के विरोध में बुना गया था।  वस्तुत: परतंत्र भारत में मैकाले की सिफारिश पर जो शिक्षा प्रणाली भारतवासियों पर लादी गई थी।  उसके मूल उद्देश्यों में निहित था  ‘’ हिंदूस्तान में ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना, जो चमड़ी के रंग से भले ही अंग्रेज न हो मगर विचारों, भावनाओं और व्यवहार में पूरी तरह अंग्रेज हो। ‘’
स्वाधीनता आंदोलन के दौरान हमारे सभी नेताओं ने शिक्षा की इस दृष्टि का विरोध किया।  इनमें उदार दल के गोपाल कृष्ण गोखले, महादेव गोविंद रानाडे से लेकर गरम दल के बाल गंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय जैसे नेता शामिल थे।  इन्हीं वजहों से उन्होंने ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली के समांतर शिक्षा संस्थाएं भी स्थापित की।  इस कड़ी में महाराष्ट्र में जहां दक्कन एजुकेशन सोसायटी ने कई कॉलेज शुरु किए गए, वहीं उत्तर भारत में आर्य समाज जैसे संगठनों ने डीएवी कॉलेजो की श्रृंखला स्थापित कीं और पूर्वी भारत में ब्रह्म समाज, स्वदेशी आंदोलन और रामकृष्ण मिशन ने समांतर शिक्षा संस्थायें गठित की।  रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा शांतिनिकेतन, पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा काशी हिंदू विश्वविद्यालय एवं सर सैयद अहमद खां ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना भी इसी उद्देश्य से हुई।  इन सभी संस्थाओं ने शिक्षा का स्वदेशीकरण किया।  इसके लिए उन्होंने भारतीय भाषाओं को शिक्षा में अधिक से अधिक स्थान देने की कोशिश की, हालांकि अंग्रेजी स्कूल-कॉलेजो से प्रतिस्पर्धा करने के लिए महत्वपूर्ण विषयों के माध्यम के रुप में अंग्रेजी को अपनाया जाता रहा।  आर्य समाज के डीएवी स्कूल (दयानंद एंग्लो वैदिक स्कूल) इस स्वदेशी शिक्षा प्रणाली की मुखर अभिव्यक्ति थी।  मुस्लिम संगठनों ने अपने – अपने स्तर पर इस दिशा में प्रयास शुरु किए।  लेकिन अंग्रेज शासकों ने इस दिशा में एक चाल चली।  और, इस तरह के प्रयास को सांप्रदायिक रंग देना शुरु कर दिया।
भारतीय भाषाओं के महत्व को स्वाधीनता आंदोलन के नेताओं ने बीसवीं सदी के दूसरे दशक में तब घोषित रुप में स्वीकार किया जब कांग्रेस समितियों का निर्माण भाषावार प्रादेशिक विभाजन के आधार पर किया गया।  आगे चल कर स्वाधीन भारत में भाषावार प्रांतों की रचना का काम इसी विचार को लेकर हुआ।
शिक्षा में क्रांति का दूसरा दौर वर्ष 1919 में महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन के समय प्रांरभ हुआ।  महात्मा गांधी ने अंग्रेजी स्कूल-कॉलेजों के बहिष्कार का आह्वान किया और हजारों छात्र अंग्रेजी स्कूल-कॉलेजों को छोड़ स्वाधीनता आंदोलन में शामिल हो गए।  इन छात्रों के लिए समांतर शिक्षण संस्थाएं बनीं।  जैसे,  गुजरात विद्यापीठ, काशी विद्यापीठ, जामिया मिल्लिया इस्लामिया आदि।  इन संस्थाओं में चूँकि अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली का बहिष्कार निहित था।  अत: इनमें भारतीय भाषाओं को उच्च शिक्षा के लिए अपनाया गया।  इसके साथ सारे भारत के लिए एक राष्ट्रभाषा को भी स्वीकार किया गया और इसके लिए महात्मा गांधी और उनके शिष्य राजगोपालाचारी के प्रयासों से दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा और बाद में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा की स्थापना हुई।  बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा दी जाए इस विचार पर लगभग सभी नेता उस समय सहमत थे।  महात्मा गांधी ने तो यहां तक कहा कि '' यदि मेरे पास तानाशाह की शक्ति हो तो मैं तमाम अध्यापकों को आदेश दूंगा कि वे बच्चों को अंग्रेजी के माध्यम से पढ़ाना तुरंत बंद कर दें नहीं तो उन्हें नौकरी से बर्खास्त किया जाएगा।''
महात्मा गांधी की आपत्ति शिक्षा के माध्यम को लेकर ही नही थी, वे इस शिक्षा के पीछे जो मूल दृष्टि थी, उसे भी गलत मानते थे।  यह दृष्टि थी कि बच्चा मिट्टी का लोंदा है जिसे कोई कुम्हार ठोक-पीटकर उपयोगी वस्तु में गढ़ता है या वह खाली बर्तन है जिसे ज्ञान नाम के पदार्थ से भरा जाना है।  उनकी मान्यता थी कि बच्चे में तमाम शक्तियां निहित है और अध्यापक का काम उसकी भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियों को बाहर लाना है।  इस दृष्टि से देखे तो यह कहना गलत नही होगा कि हमारे देश में सबसे पहले महात्मा गांधी ने ही रुसो या जॉन डेवी की तरह शिक्षा पर मौलिक ढ़ंग से विचार किया।  अपने शिक्षा संबंधी विचारों का व्यावहारिक प्रयोग उन्होंने नई तालीम या बुनियादी शिक्षा पद्धति में किया।  उनके प्रयोगों को आगे चल कर तिलांजलि दे दी गई, यह दीगर बात है। 
अलबत्ता स्वाधीन भारत की सत्ता जिन लोगों के हाथों में आई उनके लिए इस शिक्षा पद्धति का कोई मूल्य नही था।  उन्होंने उपनिवेश काल की शिक्षा को ज्यों का त्यों बनाए रखा।  नए भारत के सत्ताधारियों के लिए हर तरफ की उन्नति के आदर्श पश्चिमी देशों खासकर इंग्लैंड और अमेरिका में थे।  बाकी सब दकियानूसीपन था।  हालांकि सन् 1949 में 14 सितंबर को हिंदी को भारत के राजभाषा का दर्जा दिया गया।  तब से प्रत्येक वर्ष इस भाषा के संवर्द्धन के लिए हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह और हिंदी पखवाड़ा तक मनाया जाता है।  आयोजनों में हिंदी के प्रचार-प्रसार और हिंदी में कामकाज का संकल्प लिया जाता है।  लेकिन इन सभी में सामान्यतया: सच्ची निष्ठा का अभाव देखा जाता है।  देखा जाए तो हिंदी या हमारे दूसरे भारतीय भाषाओं की वर्तमान दशा ही देश की बदहाल शिक्षा व्यवस्था का सूचक है।  जबकि संविधान में स्पष्टतया हिंदी व भारतीय भाषाओं के संवर्द्धन की बात कही गई है।  लेकिन इतने स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद अंग्रेजी आज भी पूरे देश में हावी है और भारतीय भाषायें लाचार नजर आती है।
इसके लिए भले ही हम लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति को दोष देते रहें, पर सच तो यह है कि इतने शिक्षा शास्त्रियों के इस देश में अभी तक ऐसी शिक्षा नीति नहीं बन पाई, जिससे देश के नागरिकों को अपनी भाषा में पढ़ने की छूट मिल सके।  दूसरी ओर विदेशों में हिंदी-संस्कृत जैसी भाषाओं की लोकप्रियता बढ़ रही है।   लेकिन आज भी हमारे यहां शिक्षा का मतलब बाबू तैयार करना या ज्यादा से ज्यादा कुछ डॉक्टर इंजीनियर अथवा तकनीकीविद तैयार करना ही बना रहा और चूंकि सारी व्यवस्था को पहले की तरह ही चलाया जाना था, इसलिए शिक्षा के माध्यम के रुप में अंग्रेजी को बनाए रखने का फैसला किया गया।  कुछ राज्यों में भारतीय भाषाओं में शिक्षा देने के प्रयोग शुरु तो हुए लेकिन चूंकि सारी व्यवस्था को अंग्रेजी में चलाने का फैसला किया गया इसलिए उन बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो गया जिनकी शिक्षा भारतीय भाषाओं में हो रही थी।  अंग्रेजी समाज के सीमित वर्गों को लाभ पहुंचा रही थी और ये वर्ग सारी व्यवस्था को चला रहे थे।  अत: देश में ऐसा माहौल बना दिया गया कि अंग्रेजी के बिना देश अनपढ़ रह जाएगा और देश की एकता भी खंडित हो जाएगी।  इस मानसिकता के खिलाफ राममनोहर लोहिया ने ' अंग्रेजी हटाओं ' आंदोलन चलाया।  इसका दक्षिण के अहिंदी भाषी राज्यों में बड़ा विरोध हुआ।  उन्हें लगा कि अंग्रेजी को हटाने का मतलब यह हुआ कि हिंदी का साम्राज्य उन पर लादा जाएगा।  यह निहित स्वार्थी तत्वों का कुप्रचार था क्योंकि लोहिया अंग्रेजी के स्थान पर सभी भारतीय भाषाओं को प्रतिष्ठित करना चाहते थे।
लोहिया का असंतोष सिर्फ शिक्षा के माध्यम से नही था, वे शिक्षा की उन बुराइयों से भी क्षुब्ध थे जो अंग्रेजी माध्यम के कारण इसमें आ गई थी।  ये बुराईयां थीं तोते की तरह तथ्यों को रटना और परीक्षा के समय उगल देना।  नकल की प्रवृति, सत्य और ज्ञान की खोज के प्रति उदासीनता, मौलिक सोच का अभाव, शिक्षा को आनंद की वस्तु बनाने के बजाय यातना का स्रोत बनाना।  जिज्ञासा का क्षय आदि।  उन्होंने उच्च शिक्षा संस्थानों में हो रहे अनुसंधान कार्यों पर भी असंतोष प्रकट किया क्योंकि यहां भी उन्हें नकल की प्रवृत्ति और जिज्ञासा का अभाव ही दिखा।
साठ के दशक में शिक्षा प्रणाली के सुधार के लिए कोठारी आयोग गठित हुआ।  इस आयोग ने बहुत अच्छी सिफारिशें की जिनमें भारतीय भाषाओं में शिक्षा को प्रोत्साहन देने और पड़ोस के स्कूलों की सिफारिशें खास महत्वपूर्ण थी।  गरीब-अमीर सभी तबकों के बच्चों को समता के वातावरण में एक साथ शिक्षित करने की इस सिफारिश को      कार्यान्वित ही नही होने दिया गया शिक्षा पुराने ढ़र्रे पर ही चलती रही।  अब तो स्वास्थ्य आदि अन्य सार्वजनिक सेवाओं की तरह शिक्षा का भी खास और आम में पूर्ण विभाजन हो गया है। कुछ विद्वानों ने इसे इंडिया और भारत के दो राष्ट्रों में विभाजन कहा है।  कोठारी आयोग के बीस साल बाद नई शिक्षा नीति बनाई गई।  इसमें नवोदय विद्यालयों के नाम पर विशेष वर्गों की शिक्षा सुविधाओं का ही विस्तार हुआ क्योंकि अभिजात वर्गों के लिए केंद्रीय विद्यालय और पब्लिक स्कूल कम पड़ रहे थे।  शिक्षा के माध्यम और पाठ्यक्रम के ढ़ांचे में कोई परिवर्तन नही हुआ।
प्राथमिक स्तर की शिक्षा में सुधार के लिए ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड नाम से योजना चलाई गई जिस पर काफी धन खर्च किया गया।  इसका उद्देश्य था सरकार और स्थानीय निकायों द्वारा चलाए जा रहे प्राथमिक स्कूलों में भवन, मेज-कुर्सियां, पुस्तकें आदि मूल सुविधाओं की व्यवस्था करना।  लेकिन कुल मिला कर देखने में आया कि इन स्कूलों का सुधार नही हुआ और अंग्रेजी माध्यम के निजी स्कूलों की लोकप्रियता बढ़ती गई।  प्राथमिक स्तर की शिक्षा की सार्वजनिक व्यवस्था बदनाम होती गई और उनका स्थान खर्चीली निजी व्यवस्था लेती गई।  निजीकरण के दौर का पहला शिकार प्राथमिक शिक्षा ही हुई।  निर्धन वर्गों के बच्चों के लिए शिक्षा के अवसर सीमित होते गए और अंग्रेजी माध्यम के कारण बीच में स्कूल छोड़ देने वाले बच्चों की तादाद बढ़ती गई।

सरकारों द्वारा शिक्षा को मूलभूत अधिकार बनाने के लिए संविधान में संशोधन किए गए।  इसे एक क्रांतिकारी कदम कहा गया।  लेकिन इसका मूल उद्देश्य था सरकार को प्राथमिक शिक्षा की जिम्मेवारी से मुक्त करना।  इस प्रावधान के बाद बच्चों को स्कूल भेजने की जिम्मेवारी सरकार की नही माता पिता की है। 
कुल मिलाकर इतने वर्षों की आजादी के बाद हमारी शिक्षा की हालत वही है जो आजादी मिलने के समय थी।  करीब पैंतीस फीसदी बच्चे आज भी स्कूलों का मुँह नही देखते और स्कूल जाने वाले बच्चों में सत्तर-पचहत्तर प्रतिशत हाई स्कूल से पहले ही स्कूल छोड़ देते है।  शेष में पचास प्रतिशत बच्चे हाई स्कूल पार करते है और दो-ढ़ाई प्रतिशत ही कॉलेज स्तर की शिक्षा हासिल कर पाते है।  इस दुरवस्था का सबसे बड़ा कारण अजनबी भाषा में दी जाने वाली शिक्षा है।  लेकिन इसकी तरफ न सरकारें ध्यान देती हैं और न प्रबुद्ध समाज।  इस सवाल को उठाने वाले को मूर्ख समझा जाता है।  उन अभिभावकों को प्रशंसा की निगाह से देखा जाता है जो अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाते है।  इन संस्थाओं में भारत की संघ सरकार भी है जो अपने केंद्रीय विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा जारी रखे हुए है।  निचले स्तर की शिक्षा घरेलू व्यवस्था में काम आने वाले दिहाड़ी मजदूर पैदा करती है और ऊंचे स्तर की शिक्षा विदेशों के लिए गिरमिटिया तैयार करती है।  आज उच्च शिक्षा संस्थानों से निकलने वाले वैज्ञानिक परीक्षाएं पास करने से पहले ही पासपोर्ट बनवा लेते हैं और पहला मौका मिलते ही विदेश चले जाते है। 
हालांकि वर्तमान सरकार शिक्षा व्यवस्था में बदलाव लाने की बात कहती है।  यशपाल समिति ने भी शिक्षा को आनंदप्रद बनाने की बात कही है। समिति ने  अपनी रिपोर्ट में बच्चों को पुस्तकों के बोझ तथा परीक्षा के तनावों से मुक्त करने की बात कही है।  तथ्यों को रटने की बजाय समझ को विकसित करने की जरुरत पर भी बल देने की बात कही है।  वास्तव में जरुरत इस बात की है कि शिक्षा व्यवस्था में बच्चे को स्वतंत्र व्यक्ति माना जाए।  उसकी स्वतंत्रता, समता और बंधुता की मूलभूत आकांक्षाओं के प्रति सम्मान रखा जाए।  लेकिन असहज भाषा में शिक्षा देकर इन लक्ष्यों को हासिल करना असंभव होगा।  और, शिक्षा के माध्यम को बदलने के लिए समूची व्यवस्था को बदलना पड़ेगा।  यह किसी क्रांति के बिना संभव नही है।    
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संदर्भ स्रोत :  1. आधुनिक भारतीय इतिहास व संस्कृति : सुमित सरकार
मैं, यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना मौलिक व अप्रकाशित है।
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